मैं वही एक अदना सा प्लम्बिंग एवं सैनेट्री का छोटा सा व्यापारी जो कि दिन भर मजदूरी करके अपने परिवार का पेट पाल रहा है |अन्य दिनों की तरह ही कल भी मैं दोपहर का भोजन करके अपनी कुर्सी पर ऊंघ रहा था | तभी कुछ दूर स्थित एक मस्जिद के मौलवी साहब का दुकान आना हुआ | मैं उनके आदर में उठ खड़ा हुआ और उनका हाथ जोड़कर अभिवादन किया जिसका उनकी तरफ से कोई उत्तर नहीं दिया गया | ख़ैर, मैंने उनको कुर्सी पर बैठाकर अपनी कुर्सी संभाली और उनकी खैरियत पूछी और उन्हे चाय कॉफी पूछी जिसका भी उन्होने कोई प्रत्युत्तर नहीं दिया | उन्होंने अपने आने का प्रयोजन साफ करते हुए कहा " मियाँ, हमने सुना है कि भट्टा बस्ती इलाके में आपका एक मकान है 650 गज में जो कि आप निकलना चाहते हैं |" मैंने कहा "आप ने बिल्कुल सही सुना है लेकिन उस मकान की सही कीमत नहीं मिल रही है |" मौलवी साहब बोले " मियाँ, जो मिल रहा है ले लो क्यूँकि आसपास के सारे मकान मुसलमानों के हो चुके हैं और आपका मकान भी अब कोई मुसलमान ही खरीदेगा |"
मैं थोड़ा सकुचाते हुए बोला " जनाब गुस्ताखी माफ लेकिन मैं और आप एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं और कोई भी पंथ का व्यक्ति मेरा मकान खरीदने के लिए आ सकता है |" मौलवी साहब हंसते हुए बोले "बर्खुरदार, ये सब बराबरी वाली बातें आप पर फबती हैं, हम लोग तो वहीं रहना पसंद करते हैं जहां हमारे लोग रहना पसंद करते हैं | आप अगर ये सोचते हैं कि आपकी कौम का कोई आदमी वह मकान 3 करोड़ में खरीद लेगा तो कयामत तक इंतज़ार करके देख लीजिएगा | आपको हमारे लोगों को ही अपना माल बेचना होगा| जैसे जैसे कॉलोनी के दूसरे मकान हम खरीदते जाएंगे, वैसे-वैसे आपके मकान की कीमत गिरती जाएगी |मैं आपके पास 2 करोड़ की पेशकश लाया हूँ | आधा कैश अभी तुरंत और आधा डिमांड ड्राफ्ट रजिस्ट्री के वक़्त | बोलिए |" मैंने कहा " आप तो बिल्कुल ग़ैरवाजिब कीमत लगा रहे हैं | 3 करोड़ से नीचे तो कीमत ही नहीं है उस मकान की |" मौलवी साहब बोले "जनाब आप मौके की नज़ाकत को नहीं समझ पा रहे हैं |आज मैं खुद आपके पास चलकर आया हूँ इसलिए 2 करोड़ दे रहा हूं | खुदा ना खास्ता आप आज ना कर देते हैं तो कल कम से कम 2 करोड़ तो नहीं मिलेंगे और दलाली देनी पड़ेगी सो अलग |" मैंने कहा" ये तो सरासर दादागिरी है, मेरी मर्ज़ी मैं कितने में भी बेचूं और मैं चाहूंगा तो ये कभी बिकेगा ही नहीं |" मौलवी साहब बोले" ये तो और भी अच्छा है|" मैं सकते में आ गया और बोला" आपकी कौम पहले जहां कम संख्या में होती है वहां तो अच्छा बन कर रहते हो और जहाँ तादात बढ़ जाती है वहाँ दादागिरी करने लगते हो |"
मौलवी साहब उठ खड़े हुए और बोले "हम तो रसूल के बंदे हैं, उसी की सुनते हैं और उसी के हिसाब से चलते हैं |आज यूँ ही हमारी उम्माह इतनी बड़ी नहीं हुई है | तुम्हारे मकान को तुड़वा कर वहाँ इलाके की सबसे बड़ी मस्जिद बनाएंगे और तुम नहीं बेचोगे ज़मीन तो भी मस्जिद तो वहीं बनेगी | इसलिए बेच कर पैसा ले लो वर्ना वो भी हाथ से निकल जाएगा | हम अल्लाह से डरते हैं इसलिए तुम्हें तुम्हारा हक़ दे रहे हैं लेकिन इन्तेहां होने पर तुम कुछ भी नहीं बचा पाओगे |"
इतना कह कर मौलवी साहब चले गए और मुझे उलझन में डाल गए |3 करोड़ का मकान 2 करोड़ में कैसे बेच दूँ लेकिन उनकी बात भी गौर करने लायक है क्यूँकि जो सबसे पहले मकान बिका था 700 गज का 15 साल पहले उसके 3 करोड़ रुपये की कीमत लगी थी, यानी कि 42,000/- प्रति वर्ग गज, जो कि एक मुसलमान ने खरीदा था | उसके बाद जो 500 गज का प्लॉट बिका था 40,000/- वर्ग गज के भाव से 2 करोड़ में और उसके बाद भाव नीचे ही गए हैं | पर ये सब तो मंदी के कारण भी तो हो सकता है | लेकिन मौलवी साहब इतने विश्वास से लबरेज थे कि अगर मैं मकान नहीं बेचता हूँ तो वो कब्ज़ा ही कर लेंगे | उफ्फ | ये सब चीजें मेरे साथ ही क्यों होती हैं |पता ही नहीं अब मैं क्या करूंगा | इतने में एक ग्राहक आता दिखाई दिया और मैं तैयार हो गया कुछ बेचने के लिए||
तो मित्रों, ये था मेरे एक साथी के साथ हुई एक घटना जिसके बाद मैं भी सोचने लगा कि क्या इस्लाम के पंथ में उम्माह का बड़ा होना ही एकमात्र लक्ष्य है और अगर है तो फिर सनातन धर्म के अनुयायी क्यूँ वसुधैव कुटुम्बकम का ढोल बजाते फिरते हैं जबकि एक पंथ साथ आने को तैयार ही नहीं है||ख़ैर, आज काफी समय लिया है आपका इसलिए आपको नमस्कार करते हुए आप से विदा लेता हूँ और फिर मिलने के वादे के साथ अपको अपनी कलम को विश्राम देता हूं | प्रणाम |