Saturday, March 13, 2021

वृत्तांत 6 - उम्माह

नमस्कार साथियों | आज फिर मैं आपके समक्ष प्रस्तुत हूँ एक बिल्कुल अलग वृत्तांत लेकर जो आज के सामाजिक ताने बाने को दर्शाता है | यह वृत्तांत मुझे मेरे मित्र ने सुनाया जो कि अक्षरक्षः निम्नलिखित है :-
 
मैं वही एक अदना सा प्लम्बिंग एवं सैनेट्री का छोटा सा व्यापारी जो कि दिन भर मजदूरी करके अपने परिवार का पेट पाल रहा है |अन्य दिनों की तरह ही कल भी मैं दोपहर का भोजन करके अपनी कुर्सी पर ऊंघ रहा था | तभी कुछ दूर स्थित एक मस्जिद के मौलवी साहब का दुकान आना हुआ | मैं उनके आदर में उठ खड़ा हुआ और उनका हाथ जोड़कर अभिवादन किया जिसका उनकी तरफ से कोई उत्तर नहीं दिया गया | ख़ैर, मैंने उनको कुर्सी पर बैठाकर अपनी कुर्सी संभाली और उनकी खैरियत पूछी और उन्हे चाय कॉफी पूछी जिसका भी उन्होने कोई प्रत्युत्तर नहीं दिया | उन्होंने अपने आने का प्रयोजन साफ करते हुए कहा " मियाँ, हमने सुना है कि भट्टा बस्ती इलाके में आपका एक मकान है 650 गज में जो कि आप निकलना चाहते हैं |" मैंने कहा "आप ने बिल्कुल सही सुना है लेकिन उस मकान की सही कीमत नहीं मिल रही है |" मौलवी साहब बोले " मियाँ, जो मिल रहा है ले लो क्यूँकि आसपास के सारे मकान मुसलमानों के हो चुके हैं और आपका मकान भी अब कोई मुसलमान ही खरीदेगा |"

मैं थोड़ा सकुचाते हुए बोला " जनाब गुस्ताखी माफ लेकिन मैं और आप एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं और कोई भी पंथ का व्यक्ति मेरा मकान खरीदने के लिए आ सकता है |" मौलवी साहब हंसते हुए बोले "बर्खुरदार, ये सब बराबरी वाली बातें आप पर फबती हैं, हम लोग तो वहीं रहना पसंद करते हैं जहां हमारे लोग रहना पसंद करते हैं | आप अगर ये सोचते हैं कि आपकी कौम का कोई आदमी वह मकान 3 करोड़ में खरीद लेगा तो कयामत तक इंतज़ार करके देख लीजिएगा | आपको हमारे लोगों को ही अपना माल बेचना होगा| जैसे जैसे कॉलोनी के दूसरे मकान हम खरीदते जाएंगे, वैसे-वैसे आपके मकान की कीमत गिरती जाएगी |मैं आपके पास 2 करोड़ की पेशकश लाया हूँ | आधा कैश अभी तुरंत और आधा डिमांड ड्राफ्ट रजिस्ट्री के वक़्त | बोलिए |" मैंने कहा " आप तो बिल्कुल ग़ैरवाजिब कीमत लगा रहे हैं | 3 करोड़ से नीचे तो कीमत ही नहीं है उस मकान की |" मौलवी साहब बोले "जनाब आप मौके की नज़ाकत को नहीं समझ पा रहे हैं |आज मैं खुद आपके पास चलकर आया हूँ इसलिए 2 करोड़ दे रहा हूं | खुदा ना खास्ता आप आज ना कर देते हैं तो कल कम से कम 2 करोड़ तो नहीं मिलेंगे और दलाली देनी पड़ेगी सो अलग |" मैंने कहा" ये तो सरासर दादागिरी है, मेरी मर्ज़ी मैं कितने में भी बेचूं और मैं चाहूंगा तो ये कभी बिकेगा ही नहीं |" मौलवी साहब बोले" ये तो और भी अच्छा है|" मैं सकते में आ गया और बोला" आपकी कौम पहले जहां कम संख्या में होती है वहां तो अच्छा बन कर रहते हो और जहाँ तादात बढ़ जाती है वहाँ दादागिरी करने लगते हो |"

मौलवी साहब उठ खड़े हुए और बोले "हम तो रसूल के बंदे हैं, उसी की सुनते हैं और उसी के हिसाब से चलते हैं |आज यूँ ही हमारी उम्माह इतनी बड़ी नहीं हुई है | तुम्हारे मकान को तुड़वा कर वहाँ इलाके की सबसे बड़ी मस्जिद बनाएंगे और तुम नहीं बेचोगे ज़मीन तो भी मस्जिद तो वहीं बनेगी | इसलिए बेच कर पैसा ले लो वर्ना वो भी हाथ से निकल जाएगा | हम अल्लाह से डरते हैं इसलिए तुम्हें तुम्हारा हक़ दे रहे हैं लेकिन इन्तेहां होने पर तुम कुछ भी नहीं बचा पाओगे |"

इतना कह कर मौलवी साहब चले गए और मुझे उलझन में डाल गए |3 करोड़ का मकान 2 करोड़ में कैसे बेच दूँ लेकिन उनकी बात भी गौर करने लायक है क्यूँकि जो सबसे पहले मकान बिका था 700 गज का 15 साल पहले उसके 3 करोड़ रुपये की कीमत लगी थी, यानी कि 42,000/- प्रति वर्ग गज, जो कि एक मुसलमान ने खरीदा था | उसके बाद जो 500 गज का प्लॉट बिका था 40,000/- वर्ग गज के भाव से 2 करोड़ में और उसके बाद भाव नीचे ही गए हैं | पर ये सब तो मंदी के कारण भी तो हो सकता है | लेकिन मौलवी साहब इतने विश्वास से लबरेज थे कि अगर मैं मकान नहीं बेचता हूँ तो वो कब्ज़ा ही कर लेंगे | उफ्फ | ये सब चीजें मेरे साथ ही क्यों होती हैं |पता ही नहीं अब मैं क्या करूंगा | इतने में एक ग्राहक आता दिखाई दिया और मैं तैयार हो गया कुछ बेचने के लिए||

तो मित्रों, ये था मेरे एक साथी के साथ हुई एक घटना जिसके बाद मैं भी सोचने लगा कि क्या इस्लाम के पंथ में उम्माह का बड़ा होना ही एकमात्र लक्ष्य है और अगर है तो फिर सनातन धर्म के अनुयायी क्यूँ वसुधैव कुटुम्बकम का ढोल बजाते फिरते हैं जबकि एक पंथ साथ आने को तैयार ही नहीं है||ख़ैर, आज काफी समय लिया है आपका इसलिए आपको नमस्कार करते हुए आप से विदा लेता हूँ और फिर मिलने के वादे के साथ अपको अपनी कलम को विश्राम देता हूं | प्रणाम |

वृत्तांत 5 - जीवन चक्र

आप सभी बन्धु जनों को मेरा हार्दिक प्रणाम | आज बड़े दिनों बाद आपके सामने प्रस्तुत हूँ एक बिल्कुल अलग वृत्तांत लेकर जिसे मेरे एक सैनेट्री एवं प्लंबिग का काम करने वाले मित्र ने सुनाई जो कि अक्षरक्षः निम्नलिखित है :-
मैं वही अदना सा प्लम्बिंग एवं सैनेट्री का एक छोटा व्यापारी जो छोटा मोटा कुछ बेच कर अपना तथा अपने परिवार का पेट पाल रहा है | अन्य दिनों की तरह कल भी मैं समय पर अपनी दुकान मंगल कर रहा था के तभी मेरे पास स्थित एक हार्डवेयर वाले दुकानदार की पत्नी एक अन्य व्यक्ति के साथ मोटरसाइकिल पर सवार होकर कहीं जाती दिखी | मैंने सोचा कि "होगा कोई जानकार, अपने को क्या मतलब|" यह सोच कर मैं दुकान मंगल करके अपने घर को चल दिया |
घर पहुँच कर मैं हाथ - मुंह धोकर खाने की मेज पर बैठ गया | मेरी पत्नी के साथ मैं खाना खाने लगा | अयन अपने कमरे में परीक्षा की तैयारी कर रहा था क्योंकि विद्यालय आदि तो अभी भी बंद थे सो घर पर बैठ कर ही परीक्षा की तैयारी करनी पड़ रही है| खाना खाते समय भी मेरे मन में प्रतीक जी की पत्नी के किसी अन्य व्यक्ति के साथ देख कर अजीब सी उलझन हो रही थी | सो, मैंने अपनी पत्नी से सारी बात कह दी जिसे सुनकर मेरी पत्नी हंसने लगी |
मेरा अचरज भरा भाव देख कर वो खुद ही बोल पड़ी "आप तो ध्यान ही मत दिया किजिये | जो टेम्पो वाला आपके लिए माल ले कर जाता है, कुछ दिन पहले तो ये उसी टेम्पो वाले के साथ कहीं जा रही थी जब मैं तरकारी खरीदने गयी हुई थी दोपहर में| प्रतीक जी के यहां बहू ही ग़लत आ गयी है | पिछले दस वर्षों में ना जाने कितने लोगों के साथ घूमने के लिए निकल चुकी है और ना जाने कितने ही घर आ चुके हैं | आपको ध्यान है जब एक बार महेश जी का अपनी बीवी से झगड़ा हो गया था तो उनकी बीवी इसी के घर के बाहर जाकर चिल्ला कर आई थी |"
मैं हतप्रभ हो कर सब सुनता रहा | मैंने पूछा कि "महेश जी की अपनी बीवी से लड़ाई क्यूँ हुई थी? ऐसा क्या हो गया था कि वो प्रतीक जी की बीवी पर चिल्लाने चली गई थी? " तब मेरी पत्नी बोली " प्रतीक जी को आप जितना सीधा समझते हो वो अंदर से उतने ही टेढ़े हैं | दरअसल, प्रतीक जी की पत्नी ने महेश जी को अपने जाल में फंसा लिया था और उनके साथ गुलछर्रे उड़ाने लगी थी | प्रतीक जी को विरोध ना करने के एवज में महेश जी की तरफ से मदद के नाम पर पैसे मिल जाते थे और महेश जी अपने जान पहचान के लोगों को उनकी हार्डवेयर की दुकान से माल खरीदने के लिए प्रेरित करते थे | फिर एक दिन महेश जी की पत्नी ने बाज़ार में महेश जी को प्रतीक जी की पत्नी के साथ होटल में जाते देख लिया| बस फिर क्या था, घर पहुँचते ही महेश जी की बीवी सीधे प्रतीक जी के घर पहुंची और चिल्लाने लगी | बड़ा बवाल हुआ था उस दिन तो और ये सारी बात मुझे रंजीता ने बतायी जो उनके पड़ोस में ही रहती है | और आगे क्या बताऊँ आप तो सु कर न पागल ही हो जाओगे |"
मैं सचमुच पागल सा सब सुने जा रहा था | कितना कुछ होता रहा मेरे आसपास और मुझे खबर ही नहीं | मैंने कहा " अब पागल करने जैसा बाकी ही क्या है और |" तब मेरी पत्नी बोली " अब जो मैं बताने जा रही हूँ वो पागल करने जैसा ही है |" मैं ठूंठ बन कर विस्फोट का इंतजार करने लगा | मेरी बीवी बोली " ये लोग पति पत्नी की अदला बदली भी खेलते हैं और प्रतीक जी तो कभी कभी माल के पेमेंट के बदले अपनी बीवी ही पकड़ा आते हैं |"
मेरे कान से रक्त बहना चालू हो चुका था | मेरे नीचे की धरती नहीं दिख रही थी | आंखो के आगे सभी चेहरे तेज़ी से घूमने लगे जैसे कि किसी ने जीवन चक्र को एक बार के लिए रोक दिया हो और दिमाग़ को एकदम सन्न कर दिया हो | आगे और सुनने की क्षमता खत्म हो गई थी | मैं खाना पूरा करने के बाद बाहर आकर कुर्सी पर बैठ गया और जीवन दर्शन पर विचार करने लगा | कैसे एक बच्चा पैदा होकर बोलना सीखता है, चलना सीखता है, स्कूल जाता है, मित्र बनाता है, सामाजिक और व्यवहारिक ज्ञान अर्जित करता है, काम पर लगता है और फिर पैसों की जरूरत को पैसों की कमी बना कर गलती पर ग़लती करने लगता है, अपने बीवी बच्चों के लिए पैसा इकट्ठा कर के दुनिया से विदा ले लेता है और उसके आश्रित उसके पैसों पर मौज उड़ाते हैं | क्या यही जीवन का मर्म है |यही सोचते सोचते मैं कब गहन निद्रा में चला गया, मालूम ही नहीं चला |
तो मित्रों, ये था मेरे साथी द्वारा सुनाया गया एक वृत्तांत जो सच में बहुत गहराई से विचार करने के लिए बाध्य करता है | अभी आप को नमन करते हुए विदा लेता हूँ और फिर आपके समक्ष नए वृत्तांत के साथ प्रस्तुत होने का वादा करता हूं | नमस्कार |