Saturday, March 13, 2021

वृत्तांत 5 - जीवन चक्र

आप सभी बन्धु जनों को मेरा हार्दिक प्रणाम | आज बड़े दिनों बाद आपके सामने प्रस्तुत हूँ एक बिल्कुल अलग वृत्तांत लेकर जिसे मेरे एक सैनेट्री एवं प्लंबिग का काम करने वाले मित्र ने सुनाई जो कि अक्षरक्षः निम्नलिखित है :-
मैं वही अदना सा प्लम्बिंग एवं सैनेट्री का एक छोटा व्यापारी जो छोटा मोटा कुछ बेच कर अपना तथा अपने परिवार का पेट पाल रहा है | अन्य दिनों की तरह कल भी मैं समय पर अपनी दुकान मंगल कर रहा था के तभी मेरे पास स्थित एक हार्डवेयर वाले दुकानदार की पत्नी एक अन्य व्यक्ति के साथ मोटरसाइकिल पर सवार होकर कहीं जाती दिखी | मैंने सोचा कि "होगा कोई जानकार, अपने को क्या मतलब|" यह सोच कर मैं दुकान मंगल करके अपने घर को चल दिया |
घर पहुँच कर मैं हाथ - मुंह धोकर खाने की मेज पर बैठ गया | मेरी पत्नी के साथ मैं खाना खाने लगा | अयन अपने कमरे में परीक्षा की तैयारी कर रहा था क्योंकि विद्यालय आदि तो अभी भी बंद थे सो घर पर बैठ कर ही परीक्षा की तैयारी करनी पड़ रही है| खाना खाते समय भी मेरे मन में प्रतीक जी की पत्नी के किसी अन्य व्यक्ति के साथ देख कर अजीब सी उलझन हो रही थी | सो, मैंने अपनी पत्नी से सारी बात कह दी जिसे सुनकर मेरी पत्नी हंसने लगी |
मेरा अचरज भरा भाव देख कर वो खुद ही बोल पड़ी "आप तो ध्यान ही मत दिया किजिये | जो टेम्पो वाला आपके लिए माल ले कर जाता है, कुछ दिन पहले तो ये उसी टेम्पो वाले के साथ कहीं जा रही थी जब मैं तरकारी खरीदने गयी हुई थी दोपहर में| प्रतीक जी के यहां बहू ही ग़लत आ गयी है | पिछले दस वर्षों में ना जाने कितने लोगों के साथ घूमने के लिए निकल चुकी है और ना जाने कितने ही घर आ चुके हैं | आपको ध्यान है जब एक बार महेश जी का अपनी बीवी से झगड़ा हो गया था तो उनकी बीवी इसी के घर के बाहर जाकर चिल्ला कर आई थी |"
मैं हतप्रभ हो कर सब सुनता रहा | मैंने पूछा कि "महेश जी की अपनी बीवी से लड़ाई क्यूँ हुई थी? ऐसा क्या हो गया था कि वो प्रतीक जी की बीवी पर चिल्लाने चली गई थी? " तब मेरी पत्नी बोली " प्रतीक जी को आप जितना सीधा समझते हो वो अंदर से उतने ही टेढ़े हैं | दरअसल, प्रतीक जी की पत्नी ने महेश जी को अपने जाल में फंसा लिया था और उनके साथ गुलछर्रे उड़ाने लगी थी | प्रतीक जी को विरोध ना करने के एवज में महेश जी की तरफ से मदद के नाम पर पैसे मिल जाते थे और महेश जी अपने जान पहचान के लोगों को उनकी हार्डवेयर की दुकान से माल खरीदने के लिए प्रेरित करते थे | फिर एक दिन महेश जी की पत्नी ने बाज़ार में महेश जी को प्रतीक जी की पत्नी के साथ होटल में जाते देख लिया| बस फिर क्या था, घर पहुँचते ही महेश जी की बीवी सीधे प्रतीक जी के घर पहुंची और चिल्लाने लगी | बड़ा बवाल हुआ था उस दिन तो और ये सारी बात मुझे रंजीता ने बतायी जो उनके पड़ोस में ही रहती है | और आगे क्या बताऊँ आप तो सु कर न पागल ही हो जाओगे |"
मैं सचमुच पागल सा सब सुने जा रहा था | कितना कुछ होता रहा मेरे आसपास और मुझे खबर ही नहीं | मैंने कहा " अब पागल करने जैसा बाकी ही क्या है और |" तब मेरी पत्नी बोली " अब जो मैं बताने जा रही हूँ वो पागल करने जैसा ही है |" मैं ठूंठ बन कर विस्फोट का इंतजार करने लगा | मेरी बीवी बोली " ये लोग पति पत्नी की अदला बदली भी खेलते हैं और प्रतीक जी तो कभी कभी माल के पेमेंट के बदले अपनी बीवी ही पकड़ा आते हैं |"
मेरे कान से रक्त बहना चालू हो चुका था | मेरे नीचे की धरती नहीं दिख रही थी | आंखो के आगे सभी चेहरे तेज़ी से घूमने लगे जैसे कि किसी ने जीवन चक्र को एक बार के लिए रोक दिया हो और दिमाग़ को एकदम सन्न कर दिया हो | आगे और सुनने की क्षमता खत्म हो गई थी | मैं खाना पूरा करने के बाद बाहर आकर कुर्सी पर बैठ गया और जीवन दर्शन पर विचार करने लगा | कैसे एक बच्चा पैदा होकर बोलना सीखता है, चलना सीखता है, स्कूल जाता है, मित्र बनाता है, सामाजिक और व्यवहारिक ज्ञान अर्जित करता है, काम पर लगता है और फिर पैसों की जरूरत को पैसों की कमी बना कर गलती पर ग़लती करने लगता है, अपने बीवी बच्चों के लिए पैसा इकट्ठा कर के दुनिया से विदा ले लेता है और उसके आश्रित उसके पैसों पर मौज उड़ाते हैं | क्या यही जीवन का मर्म है |यही सोचते सोचते मैं कब गहन निद्रा में चला गया, मालूम ही नहीं चला |
तो मित्रों, ये था मेरे साथी द्वारा सुनाया गया एक वृत्तांत जो सच में बहुत गहराई से विचार करने के लिए बाध्य करता है | अभी आप को नमन करते हुए विदा लेता हूँ और फिर आपके समक्ष नए वृत्तांत के साथ प्रस्तुत होने का वादा करता हूं | नमस्कार |

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