Sunday, July 5, 2020

वृत्तांत 4 - दर्शन

साथियों नमस्कार |आज मैं आपके सामने प्रस्तुत हूँ एक बिल्कुल अद्भुत वृत्तांत लेकर जिसे सुनकर मैं बिल्कुल अचंभित रह गया था |यह वृत्तांत मेरे एक मित्र ने आज सुबह दुकान पर बुला कर सुनाया जो कि अक्षरक्षः निम्नलिखित है -

मैं वही एक साधारण सा प्लम्बिंग एवं सैनेट्री की एक छोटी सी दुकान पर बैठा छोटा सा व्यापारी जो कि हर दिन एक नयी आशा के साथ अपने घर से दुकान निकलता है और यह उम्मीद रखता है कि दिन भर में इतना तो कमा ही लेगा के घर की ज़रूरत पूरी कर लेगा और मार्केट के पेमेंट चुकता कर देगा | कल का दिन सुबह से ही खराब था क्यूंकि दुकान खोलते ही एक ग्राहक बचा हुआ माल वापस ले आया और मैंने उसके पैसे वापस दिए |दिन भर ग्राहकों का ग्रहण लगा रहा |सांझ ढल रही थी और बोहनी-बट्टे का नामोनिशान नहीं था | तभी गोधूलि बेला के समय एक बूढ़ा आदमी दुकान में आया और बोला "भगवान् की टाइल है क्या?" मैंने कहा "कौनसे भगवान् की टाइल चाहिए?" बूढ़ा बोला "हनुमान जी की, राम दरबार की और शिव जी की |" मैंने टाइलें निकाल कर वृद्ध को दिखा दी और 50 रुपये प्रति नग के हिसाब से 150/- ले लिए | वृद्ध जब जाने लगे तो मैंने उनसे यूं ही पूछा "आप शैव हैं या वैष्णव?" वृद्ध ने मेरी तरफ देखा और कहा" सड़क की तरफ देख कर बताओ कि तुम्हें क्या दिख रहा है |" मैंने सड़क की ओर देखा और कहा "मुझे तो सड़क पर वाहन और कुछ लोग आते जाते दिखाई दे रहे हैं |" वृद्ध ने कहा "आज सांझ को दुकान थोड़ा देर से बढ़ाना और ज़रा गौर से सड़क को देखना | जब कभी अपना मिलना हो तो बताना कि क्या देखा |" मैंने सोचा कि डोकरा बावला है तो मैंने आगे बात नहीं की और उन्हें जाने दिया | 

वृद्ध के जाने के बाद एक ग्राहक और आया और 10,000/- का सामान लिखवा गया जिसका भुगतान सामान पहुंचने पर टेम्पो वाले को होना था | मैंने टेम्पो से सामान भिजवा दिया और पेमेंट का इंतज़ार करने लगा | अंधेरा हो गया था तो मैं दुकान बढ़ा कर सीढ़ियों पर ही बैठ गया और टेम्पो वाले का इंतज़ार करने लगा जो कि पेमेंट लाने वाला था | सड़क सुनसान थी और सरकारी लैम्प उजाला करने की कोशिश में व्यस्त था | मैं अपने खयालों में मगन था तभी एक सफेद आकृति सड़क पर बैठी हुई दिखी | गौर से देखने पर मालूम हुआ कि ये तो और कोई नहीं स्वयं हनुमानजी हैं | मुझे विश्वास नहीं हुआ तो जब मैंने पलक झपकी तो वह आकृति गायब हो गयी थी | अब मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे और मुझे चक्कर से आने लगे थे | मेरे आगे अंधेरा हो गया था और कुछ नहीं दिख रहा था | तभी आसपास कुछ हलचल ने मेरा ध्यान आकर्षित किया | जब मैंने अपना होश संभाला तो मैं पागल सा हो गया जब मैंने देखा कि हनुमानजी मेरे पास खड़े हैं और मुझे पूछ रहे हैं "वत्स, मैं शैव हूँ या वैष्णव?" मैं मूर्छित हो कर गिर पड़ा |

जब मुझे होश आया तो मैं अपने घर पर था और आसपास मेरी पत्नी और 6 साल के बच्चे अयन के साथ-साथ 2 पड़ोसी दुकानदार भी थे | उन्होंने बताया कि टेम्पो चालक जब पेमेंट देने आया था तो उसने मुझे मूर्छित पाया और पास की दुकानों पर लिखे नंबरों पर फोन करके उन्हें बुलाया और घर लेकर आए | मैं कुछ बोल पाता इससे पहले ही मेरे साथी दुकानदार बोले "भाईसाहब, धंधे की इतनी फ़िक्र ना किया करो, अभी तो सबकी हालत पतली हो रखी है |ये तो अच्छा हुआ कि टेम्पो वाला वहां आ गया था समय पर वर्ना तो कोई भी आपका सामान और पैसा लेकर भाग जाता |" मेरी धर्मपत्नी भी बोलने लगी कि मैं सारा दिन तो धंधे का सोचता ही हूँ साथ में घर आने के बाद भी धंधे की ही बात करता रहता हूँ | मैं सब एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल रहा था क्यूंकि आज जो मैंने अनुभव किया था वो किसी को भी नहीं बता सकता था |

आह! वह असाधारण अद्वितीय अनुभूति जो इहलोक में शायद ही बिरले लोगों को होती होगी | क्या बताऊँ आपको | वह चंद्रमा सा शरीर जिस पर मोतियों और सीपीयों का हार सुसज्जित था|एक कंधे पर नाग विराजमान तो दूसरे पर कमल के फूल की माला |एक हाथ में कमण्डल तो दूसरे हाथ में शंख | एक पैर में लकड़ी की सुंदर कढा़ऊ तो दूसरे पैर में पत्तों का पदत्राण| शरीर के एक ओर राख लगी हुई तो दूसरी तरफ सिंदूर | वस्त्र भी ऐसे की किसी मशीन से ना सिले जा सकें, पूरी तरह से शीशम की छाल ओर पटसन से बना कपड़ा जो कि कोई उम्दा कारीगर ही बना सकता है | क्या था ये सब? क्या था उनके प्रश्न का मतलब? और कौन था वह वृद्ध? अब कैसा रहेगा मेरा आगे का जीवन? यह सब सोचते सोचते मैं कब सो गया मालूम ही नहीं चला |

तो साथियों, ये था वो वृत्तांत जो मेरे मित्र ने आज 
सुबह मुझे सुनाया और मैंने अपको |मैं नहीं जानता कि ये सब क्या था और क्यूं लेकिन मैं इतना जानता हूँ कि कितना कुछ हम दैनिक जीवन में अनुभव करते हैं जो कि हम किसी से साझा नहीं कर पाते हैं क्योंकि हमें मालूम है कि लोग विश्वास नहीं करेंगे| ख़ैर साथियों,अभी आपसे विदा लेता हूँ  इस वचन के साथ कि जल्द ही आपके सामने एक और नये वृत्तांत के साथ प्रस्तुत होऊंगा | मेरा प्रणाम स्वीकार करें |

Monday, May 25, 2020

Just another thought

Social measures to overcome the guilt of being the prime accused in cases of women suffrage has led men to 'look' more liberal and sensitive than to be actually one which leads to some innocents being publicly crucified so as to calm the drooling half-grown social champions of female rights while women still being treated as second grade humans in 'not so sexist' world of a Man God.

वृत्तांत 3 - कैसे कैसे लोग

साथियों, आज आपके सामने प्रस्तुत करने जा रहा हूँ एक ऐसा वृत्तांत जिसको सुनकर मैं सोच में पड़ गया कि मानव जाति में रिश्ते किस प्रकार से अपने चरम तक पहुंच कर खत्म कर दिए जाते हैं | यह वृत्तांत मुझे आज दोपहर में सुनने को मिला जो कि अक्षरक्षः तीसरी कड़ी के रूप में आपके सामने प्रस्तुत हो रही है -
मैं वही अदना सा प्लम्बिंग एवं सैनेट्री का एक छोटा व्यापारी अपनी दुकान पर बैठा हिसाब में लीन था | तभी आसपास की दुकान से लड़ाई झगड़े का शोर सुनाई दिया तो मेरा ध्यान टूटा और अपनी कुर्सी से उठ कर बाहर आया | मैंने देखा कि कुछ दूरी पर स्थित मेरे ही जैसे एक प्लम्बिंग और सैनेट्री के यहां से शोर उठ रहा था लेकिन कुछ साफ सुनाई नहीं दे रहा था | तभी वहां पर मौजूद एक पुराने मित्र को मैंने देखा तो इशारे से उन्हें बुला लिया | वो भी वहां से निकलने ही वाले थे तो मेरे यहाँ आए और उनका अभिवादन कर उन्हें अंदर ले आया | आराम से बैठकर एक दूसरे का हाल चाल पूछ कर हम उस शोर के बारे में बात करने लगे |
मैंने पूछा "वो दुकानदार तो बड़ा अच्छा व्यक्ति है फिर क्यों उसके वहां शोर मचा हुआ था?" वे बोले "अजी दिल्ली से नलों का सप्लायर आया हुआ था अपने आदमीयों के साथ पैसों की उगाही के लिए |" मैं सुनकर हतप्रभ रह गया क्यूँकि जिस दुकानदार की मैं बात कर रहा था वो तो साहूकार आदमी था जो किसी का पैसा नहीं रोकता था| मेरे मित्र आगे बोले "दरअसल इन्होने अपने लड़के के भरोसे हर चीज़ छोड़ दी थी तो उसने मस्ती काट ली | माल मंगवा कर घाटे में बेच देता था और खाते में उधार की देनदारी दिखा देता था तो पिताजी को लगता था कि उधार तो निकाल लेंगे पर निकलने के लिए किसी को उधार भी तो दे रखी होनी चाहिए|"
मैं सोचने लगा कि कोई भी व्यक्ति माल घाटे में क्यूँ बेचेगा? खरीद की दर के आसपास दाम करके ही बेच सकता था लेकिन नुकसान खाने की क्या जरूरत थी? मेरे मित्र मेरा सवाल भांप कर बोले "अजी चक्कर ये था कि उसके शौक बड़े थे| अपने पिता को भले ही कुछ नहीं दिया हो पर अपनी गर्लफ्रेंड और उसके भाई को महंगे उपहार जैसे कि हीरे की अंगूठीयां और बालियाँ, लाल आई-फोन देना, महंगे रिज़ॉर्ट में रंगरेलियां करता था, दोस्तों को महंगे होटलों में शराब पिलाता था, सट्टे में भी पैसा लगाने लगा था और भी ना जाने क्या क्या | मेरे बैंक का मैनेजर बता रहा था कि ये लड़का नीमच के एक खाते में हर शुक्रवार काफी पैसा डलवाता था जो कि किसी बृज बिहारी माहोर के नाम से है | ये बात मैंने पिछले महीने सेठ जी से कही तो वो पागल हो उठे थे | वो नीमच वाला खाता दरअसल किसी और का नहीं बल्कि लड़के के असली पिता का था|"
यह सब सुनकर मैं सन्न रह गया क्यूंकि मैं तो सेठ जी को ही उसका पिता समझता आया था | मैं पानी का घूँट पीकर फिर से तैयार था आगे की बात जानने के लिए |मेरे मित्र बोले "जब सेठ जी की आर्थिक हालत खराब थी तो उनके ससुराल से मदद आई थी जिससे उन्होंने वापस अपना साम्राज्य खड़ा किया | मदद के साथ-साथ सेठ जी को उनके घर के एक सदस्य को गोद भी लेने को कहा गया जिसकी माँ कुछ समय पहले परलोक सिधार गयी थी और पिता, जो कि एक निचली जाती से थे, लड़के को अपने ससुराल छोड़ गये थे |सेठ जी उस लड़के को गोद लेने को राज़ी हो गये | लड़का यहां आ गया और इनके साथ रह कर काम सीखने लगा | सेठ जी पूरी तरह से उसे अपना लड़का मान चुके थे और काम काज अब उसके भरोसे छोड़ने लगे | उन्होंने उसके सभी कागज़ात में पिता की जगह पर खुद का नाम दिया जिससे लड़के को शहर में ऊंची जाती के लोगों में इज़्ज़त मिलने लगी और उसका नेटवर्क बढ़ने लगा | धीरे धीरे उसके हाथ में सामान खरीदने और बेचने की भी ज़िम्मेदारी आ गयी जिससे पैसा उसके हाथ में रहने लगा | इसी दौरान उसका असली पिता से संपर्क बना रहा और वह धीरे धीरे करके पैसा दूसरी ओर सरकाने लगा | वह ग्राहकों को माल की रेट खरीद से भी कम में बता बेचता था जिससे ग्राहक तुरंत खरीद लेता था नतीजन लड़के के हाथ में अधिक से अधिक पैसा आ जाता और फिर उसी में से पैसा निकाल कर अपने पिता को देता |उदाहरण के लिए समझें कि आज उसने 1 लाख देकर खरीदा हुआ माल 90 हज़ार में ही बेच दिया 10 हज़ार का घाटा खाकर | अब उस 90 हज़ार में से 20 हज़ार और निकाले जो उसके असली पिता को बैंक में डाल दिए या इधर-उधर खर्च कर दिये यानी कुल घाटा हुआ सेठ जी को 30 हज़ार का जिसमें अगर मुनाफ़ा भी जोड़ दूँ तो घाटा और बढ़ जाएगा| अब यही 30 हज़ार की रकम कुछ मुनाफ़ा जोड़ने के बाद अपने दोस्त को उधार माल के पेटे खाते में लिख दिया जिससे यह लगे कि पैसा आना बाकी है लेकिन वो तो आने ही नहीं थे | सेठ जी अच्छा कमाए हुए थे इसलिए उन्हें लंबे समय तक इस घाटे का आभास नहीं हुआ | लड़का तब तक और लापरवाह हो गया था और सप्लायर से महंगी दर पर माल खरीदता क्यूंकि वो लड़के को मस्ती करवाते थे ताकि वो महंगा और डैड माल भी ऊंची दर पर खरीद ले | इसी तरह उसने दिल्ली से नलों का पीटा हुआ माल खरीद लिया 4 महीने की उधारी पर जो कि बिका नहीं और पेमेंट खड़ा हो गया | आज वो ही दिल्ली वाले हंगामा कर रहे थे सेठ जी की दुकान पर और लड़का शायद कहीं गुलछर्रे उड़ा रहा था |"
मेरा मुख खुला ही रह गया था काफी देर से क्यूंकि ऐसा सब कुछ मैंने जीवन में पहले कभी नहीं सुना था | मैंने होश सम्हाल कर पूछा कि अब सेठ जी क्या करेंगे तो मेरे मित्र ने कहा "पैसा चुकता करने के अलावा और कोई भी रास्ता नहीं है | लड़के को अलग कर देंगे और अब अकेले ही सम्हालेंगे सब कुछ|बाकी जो नसीब में लिखा है वही होगा | हो सकता है कि अब अपने पिता को यहीं पर बुला कर नया काम डाल ले क्यूंकि पैसा तो बना ही लिया है लड़के ने |ख़ैर, आप तो ध्यान रखें अपना और हमारे लायक कुछ काम हो तो बताना |अभी मैं इजाज़त चाहूँगा आपकी| " यह कह कर मेरे मित्र उठ गये और अपना ध्यान रखने की कह कर चल दिए |
मैं सोचता रहा कि एक भले इन्सान ने किसी को आसरा दिया, अपना नाम दिया, समाज में इज्ज़त दिलवाई और उसी ने ही उनके साथ ऐसा विश्वासघात किया | अब तो यह बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं है कि अच्छाई का बदला अच्छाई से ही मिले भले ही हम रिश्ते को कितना ही प्रगाढ़ समझते हों |
तो साथियों, आज का वृत्तांत आप को पसंद आया हो इसी कामना के साथ आपसे विदा लेता हूँ |अगली बार चौथी कड़ी के साथ आपके समक्ष फिर प्रस्तुत होऊंगा |

Sunday, May 24, 2020

वृत्तांत 2 - एक रिक्शे वाली की कहानी

साथियों, आज मैं फ़िर से आपके सामने प्रस्तुत हूँ एक और वृत्तांत लेकर जो आज दोपहर ही मुझे सुनने को मिला और उसे सुनकर मुझे लगा कि यह कहानी मुझे आपसे साझा करनी चाहिए | तो निम्नलिखित है अक्षरक्षः वृत्तांत जो मैंने सुना -
 
मैं एक साधारण सा प्लंबिंग एवँ सैनेट्री का दुकानदार जो कुछ समय पहले ही अपने बच्चे के बुखार के कारण दुनिया के कई रंग देख चुका था जिसके बारे में मैंने पिछली बैठक में आपसे अपना अनुभव साझा किया था, आज आपको एक अलग ही अनुभव बताने वाला हूँ | 

लॉक-डाउन में छूट मिलने के बाद से मैं आम दिनों की तरह ही दुकान आने लगा था सुबह 10 बजे से सांझ के 6 बजे तक | उस दिन समय था दोपहर 3 बजे का और कोई ग्राहक भी नहीं था | बाहर की खाली सड़क पर पड़ती चिलचिलाती धूप को देख कर अनायास ही मृग मरीचिका का ध्यान हो उठता था | मैं अपने खयालों में खोया हुआ था कि तभी एक रिक्शा चलाती महिला दुकान के बाहर आकर रुकी जिसमें पीछे की सीट पर दो छोटे से बच्चे, जिनमें एक लगभग 3 वर्ष की बच्ची तथा एक बच्चा 2 वर्ष का, बैठे हुए थे एक दूसरे का हाथ पकड़कर | वह रिक्शा चालक महिला, जो कि करीब 30 वर्ष की आयु के आसपास की लग रही थी, वह दोनों बच्चों के साथ मेरी दुकान में आई और मुझे नमस्ते करके मेरा अभिवादन किया | मैं बोहनी नहीं होने के कारण थोड़ा निराश सा बैठा था इसलिए मैंने महिला के अभिवादन का जवाब केवल गर्दन हिलाकर दिया और कुछ नहीं बोला|

मैं सोच रहा था कि ये ज़रुर अपने बच्चों के लिए खाने के पैसे मांगेगी क्योंकि ऐसे लोगों को मैं काफी देख चुका था जो कि सामने वाले का मन अपनी गरीबी से पिघला कर उनसे पैसे ऐंठने का प्रयास करते हैं | मेरे मन में ये बात काफ़ी समय पहले घर कर गई थी कि इस तरह के लोगों का संगठन होता है जो गुट बना कर निकलते हैं और अकेले दुकानदार को फांस लेते हैं जिनसे फिर ये पैसा निकलवाने का काम करते हैं इसीलिए मैं सचेत हो गया था | 

मैं उस महिला को बाहर निकलने के लिए कहता इतने में ही वो मेरे काउंटर के पास आई और 4,000/- रुपए रख कर बोली के "आज बाऊजी नहीं बैठे हैं?" मैं अपनी उधेड़बुन से बाहर निकलने के अथक प्रयास के दौरान बोला "कौन बाऊजी? यहां तो केवल मैं ही बैठता हूँ |" महिला ने पूछा "ये अग्रवाल जी की ही दुकान है ना? बाहर भी अग्रवाल ही लिखा है |" मैं अब तक सजग हो गया था | मैंने कहा "हाँ, ये अग्रवालों की ही दुकान है लेकिन आप किनको पूछ रही हैं और ये पैसे किसके हैं?" वह महिला अब थोड़ा रुकी और फिर बोली" भैय्या, मैं गरीबी की मार से परेशान एक विधवा 2 बच्चों की माँ हूँ जो रिक्शा चला कर अपना पेट पालती हूँ | मैं शहर के पुराने सैनैट्री बाज़ार के बाहर रिक्शा खड़ा करती थी तब एक बार एक बाऊजी मेरे रिक्शे से अपने घर तक गए थे |उतर कर उन्होंने जय सियाराम कहा तो मुझे बहुत अच्छा लगा तो मैंने उनसे पूछा के वे क्या काम करते हैं तो उन्होंने कहा कि वे कुंडीयां एवं वॉश-बेसन बेचते हैं| उन्होंने मुझे अपना कार्ड दिया और कहा कि अगर कभी ज़रूरत पड़े तो मेरे नए सैनैट्री बाज़ार स्थित प्रतिष्ठान पर आ जाना | मैंने उनसे कार्ड एवं रिक्शा का किराया लिया और चली गयी |कुछ समय बाद ही मुझे अपने किराए के घर पर कुंडी और कुछ टाइलों की ज़रूरत पड़ी तो मुझे बाऊजी का कार्ड याद आ गया जो मैंने एक आले में रख दिया था | थोड़ा ढूंढने के बाद वह कार्ड मिल गया और मैं पता ढूंढते उनकी नए सैनैट्री बाज़ार स्थित दुकान पहुँच गयी जहां बाऊजी और उनके पुत्र बैठे थे | बाऊजी मुझे देखते ही तुरंत पहचान गए और उन्होंने जय सियाराम से मेरा अभिवादन किया | मैंने उनको अपनी ज़रूरत बतायी तो उन्होंने मुझे एक कुंडी दिखायी और सुंदर सी मछली वाली चित्रकारी की टाइल दिखाई जो मुझे बहुत पसंद आई | जब बिल बना तो 4000/- का जोड़ सुनकर तो मेरी आंखो के आगे अँधेरा छा गया क्यूंकि मैं केवल 500/- रुपये लायी थी और वैसे भी इतना खर्चा मैं नहीं कर सकती थी | मैं वापस जाने लगी तब बाऊजी ने मुझे रोका और कहा" बेटी, तू ये सामान ले जा, अब ये तेरा है और तुझे ही फलेगा |पैसा जब तेरे पास आ जाये तब दे जाना और पैसा देने तब ही आना जब तेरे घर में सब बर्तन धान्य से भरपूर हो जाएँ |" इतना कह कर उन्होंने सामान मेरे रिक्शे में रखवा दिया और मुझे विदा किया |" 

उस महिला की सारी बात मैं बिना पलकें झपकाए सूखे कंठ से सब कुछ सुनता चला गया |महिला बोली "भैय्या, आज एक वर्ष बाद मेरा घर धान्य से भरपूर है और मैं 4000/- रुपए बाऊजी को देने आयी हूँ | उनका कार्ड मुझसे कहीं गिर गया और फिर नहीं मिला लेकिन मुझे इतना ध्यान था कि उनकी दुकान के बाहर अग्रवाल लिखा था और अंदर भगवान् की भी टाइलें रखी हुई थीं |" भगवान् की टाइलें सुनकर मैं समझ गया कि वह कौन सी दुकान की बात कर रही है | मैं उस महिला के सम्मान में खड़ा हुआ, उसके पैसे काउंटर से उठा कर उसे वापस दिए और बाहर जाकर उस दुकान का रास्ता दिखा दिया |वह अपने बच्चों को वापस रिक्शे में बिठाकर उस दुकान की ओर चल पड़ी जहां वह नेक व्यक्ति विराजमान थे |मैं वापस अपने काउंटर की तरफ चल पड़ा और मानव जीवन के विभिन्न रंगों में से सबसे उजले रंग को आज वास्तविकता के अनुभव से अपनी पराकाष्ठा को छूते देखकर भाव विभोर होता रहा |

तो साथियों, यह थी वृत्तांत श्रृंखला की दूसरी कड़ी जो आपने पढ़ी |इसी प्रकार से आगे भी आपको सच्चे अनुभवों पर आधारित कथाएँ आपके समक्ष प्रस्तुत करने के प्रयास के वचन के साथ आपसे विदा लेता हूँ |

Wednesday, May 20, 2020

एक छोटा सा वृत्तांत

साथियों, आज मैं आपके सम्मुख मेरे एक मित्र का वृतांत पेश कर रहा हूं जो कि उसने मुझे आज दोपहर में ही सुनाया था और मैं स्वयं को रोक नहीं पाया आपके सामने प्रस्तुत करने से |अक्षरक्षः वृतांत निम्नलिखित है - 

मैं  प्लम्बिंग एवं सैनेट्री का एक छोटा सा व्यापारी हूँ जो कि 15x25 की दुकान में अपना सामान रखता है और राजी खुशी बेचता है | लॉकडाउन के बाद एक चीज़ जो मार्केट में देखने को मिली के पैसा सब कुछ नहीं है बल्कि व्यवहार ज़्यादा महत्वपूर्ण है| मेरे साथ घटी एक घटना आपको सुनाना चाहूँगा | लॉकडाउन के समय मुझे 3 लोगों को पेमेंट चुकाना था जो कि नहीं चुके क्यूंकि सब कुछ बंद कर दिया गया था |दो मेरे घनिष्ठ से थे और एक से साधारण व्यवहार था |उनमें से साधारण व्यवहार वाले सप्लायर ने 12 अप्रैल को मुझसे संपर्क किया और कहा कि पैसों की सख्त जरूरत है इसलिए पेमेंट करवा दीजिए सो मैंने उनको सुबह जल्दी ही 5 बजे बुलाया और चुकावणा करके रवाना किया | 

जब 14 मई को प्लम्बिंग की दुकान खोल लेने का आदेश आया तो मैंने अपनी भी दुकान खोल ली और सीमित समय के लिए खोलने लगा | अगले दिन सुबह मेरे 6 साल के बच्चे अयन के बुखार आया तो घर में हड़कंप मच गया | हमें कुछ समझ नहीं आ रहा था | मैंने अपने पड़ोसी को बुलाया तो वह आने से मना कर दिए |मेरे परिजन ख़ास दोस्त भी दूर रहने के कारण नहीं आ सकते थे | मुझे कुछ भी नहीं सूझ रहा था तो मैंने अपने 2 सप्लायर्स को फ़ोन लगा दिया जिनको पेमेंट भी करना था | उनमें से एक तुरंत घर के बाहर आ गए और मुझे बाहर बुलाया| मैं गया तो उन्होंने कहा कि पेमेंट चाहिए |मैं हक्का बक्का रह गया | वो मेरा चेहरा पढ़ कर बोले कि सेठ जी जीवन का कोई भरोसा नहीं है और बुरा मत मानना ऊपरवाला ना करे के आपके यहां किसी को भी कोरोना की बीमारी लगे लेकिन अगर हो गयी तो मेरा पेमेंट तो गया, इसलिए आप मेरा चुकावणा करके मुझे मुक्त किजिए | मैं चुपचाप अंदर गया और अलमारी की ओर बढ़ा |मैं जानता था कि मेरे पास इतना ही है कि मैं उसका पेमेंट कर सकूं | मैंने पैसे लिए और उस सप्लायर को सौंप दिए | गिनने के बाद मेरी पर्चियां मुझे सौंप कर स्कूटर चालू करके वो बोला कि सेठ जी अब माल कैश में मिलेगा और वो चल दिया | 

मैं कुछ समझ पाता इतने में मुझे मेरे दूसरे सप्लायर आते दिखे तो मैं सोचने लगा कि इनके लिए तो पेमेंट है ही नहीं और कहीं से व्यवस्था भी नहीं हो सकती है अभी तो | इतना सोचते सोचते वो मेरे नज़दीक आ गये और अपना स्कूटर रोक कर सीधे मुझे अंदर चलने को बोले | मैं उन्हें अंदर ले गया और जब मैं उनसे कहने ही वाला था कि आज पेमेंट नहीं हो पाएगा तो उन्होनें कहा कि अयन कहाँ है? मैं उन्हें अयन के पास ले गया तो उन्होंने व्हाट्सएप पर विडियो कॉल के ज़रिए अपने मित्र डॉक्टर को संपर्क करके यथास्थिति बताई | डॉक्टर ने कहा कि घबराने की जरूरत नहीं है, लक्षण साधारण वायरल फीवर के लग रहे हैं इसलिए आप पास की किसी भी मेडिकल की दुकान पर जाकर मेरी बात करवा दीजिए | हम भागे भागे मुख्य सड़क पर स्थित मेडिकल दुकान पर पहुचे और डॉक्टर से बात करवायी | तब तक डॉक्टर ने दवाइयाँ अपनी अस्पताल की पर्ची पर लिख कर व्हाट्सएप पर भेज दी थी | पर्ची देख कर और डॉक्टर से बात करके केमिस्ट ने दवा दे दी और हम तुरंत घर पहुंच के सीधे अयन के पास गए और उसे दवा दी | 

मेरे सप्लायर बाहर ही थे और मेरा इंतज़ार कर रहे थे | दवा देकर मैं बाहर आया तो मेरे कहने से पहले ही उन्होने कहा कि अगर कोई इमर्जेंसी पड़े तो तुरंत याद करना और ये कहकर उन्होने 50,000/- रुपये निकाल कर मेरे शर्ट की ऊपर की जेब में रख दिये | मैंने कहा कि इसकी ज़रूरत नहीं है, मेरे पास हैं पैसे | उन्होंने कहा कि जब मैं आपके यहां आ रहा था तब वो दूसरा सप्लायर जाते हुए मुझे स्कूटर से ही बोल रहा था कि निकाल लो अपना पैसा, ये तो भागेगा | इतना सुन कर मैं अवाक् रह गया | मेरे सप्लायर बोले "वो आदमी तो मार्केट में आपके बारे ये ही बोलता रहा था हमेशा लेकिन मैंने कभी उसकी बात से स्वयं को प्रभावित नहीं होने दिया | ऐसे लोगों से आप भी मित्रता ना रखें क्यूंकि ये आप की दुकान से जलते हैं और सोचते हैं कि ये माल तो हम से उठाता है और दुनिया के सामने सेठ बन जाता है | ऐसे व्यक्ति का पगफेरा दुकान और घर दोनों के लिए घातक हो सकता है क्यूंकि ये लोग मौका लगने पर आपके घर की भी बुराई करने से नहीं चूकते |अगर मेरी बातें आप को अजीब लग रहीं हैं तो 20 साल रुक जाइये, जब आपका लड़का शादी के लायक हो जाएगा तब ये ही आदमी आपके बच्चे के लिए मार्केट में चुपके से अफ़वाहें फैलाने लगेगा कि लड़का तो ऐबी है, जुआरी है, लड़कीबाज है, शादी करते ही दुकान छोड़ कर भागेगा, 1 करोड़ की डिमांड है, दारूबाज़ है और ना जाने क्या क्या |सेठ जी, मैं ये सब भोग चुका हूं इसलिए आप को सावधान कर रहा हूं| ये लोग अपना काम तो अपने गोदाम पर शांतिपूर्वक निपटा लेते हैं और फिर आपकी दुकान पर बैठ कर आपके काम पर नज़र रखते हैं | आपके सामने मीठी बातें करके आपके राज़ जानने लगते हैं और दूसरों को आपकी बातें बताकर अपने आपको आपका करीबी बताने की चेष्टा करते हैं और कालांतर में आपको नुकसान पहुंचाते हैं |जब मैंने उसे स्कूटर पर जाते देखा तभी मैं ये समझ गया था कि आपने इसको अपना समझ कर फोन कर दिया होगा और ये अपनी छोटी बुद्धि का परिचय देते हुए पेमेंट मांगने आया होगा |सेठ जी, ऐसे लोग इंसान के रूप में नीम के पेड़ के नीचे नाचने वाली भूतनीयों के समान होते हैं जो ना इस धरती की हो पाती हैं और ना ही यमपुरी की | ये श्वानपुत्र दुकान के बाहर ही ठीक होते हैं ना कि दुकान के अंदर | आप इनसे काम तो कर लीजिए लेकिन इनको पेमेंट इनके गोदाम पर ही भिजवा दिया करें और कभी भी कोई निजी बात इनको ना बतायें|अब आप देखियेगा कि 3-4 दिन बाद ये ही व्यक्ति मार्केट में बोलता फिरेगा कि आपके बच्चे को बुखार आया था और वह आपके साथ अस्पताल गया था |" 

इतना सब सुनकर मेरे तो दिमाग को चक्कर आने लगा था लेकिन तभी मेरे सप्लायर का फ़ोन बज उठा जो कि उनके घर से था |उन्हें अब जाना था |आज मेरे अंदर एक नई चेतना का संचार कर उन्होंने एक नया आयाम दिया था मेरे जीवन को | उन्हें विदा करके मैं अंदर अयन के पास आया और उसे चैन से सोता देख अपने खयालों में खो गया |

आज 1 महीने बाद मैं अपनी दुकान पर बैठा हूँ और पूर्णतः कर्जमुक्त हूँ | मेरे सप्लायर के 50,000/- समेत पुराना पेमेंट भी मैं चुका चुका हूं और नीम के पेड़ के नीचे नाचने वाली भूतनियों से आवश्यक दूरी भी बना चुका हूँ | 

तो साथियों, ये था एक छोटा सा वृत्तांत |अभी आज के लिए कहानीयों की श्रृंखला की पहली कड़ी को यहीं पर विराम देता हूँ और नये अनुभवों के साथ फिर आपके समक्ष आने के वादे के साथ आपसे विदा लेता हूँ |

Saturday, March 28, 2020

Oh Dear Camilla

A sour hearted soul, 
a human with bitter tongue, 
swollen brass eyed purple minded
blood sucking saber toothed vampire, 
at the footsteps of whose
bats screech and hyenas laugh, 
and
Only Camilla knows it
Only Camilla wants it
Only Camilla likes it
Only Camilla loves it
Only Camilla spreads it
Only Camilla can cure it
Oh dear Camilla, 
you dark filthy infected soul, 
Why did you come to life?
Why did you play with phlegm?
Why did you made me think I am reborn?
Oh dear Camilla, 
I was good in the well, 
I was good with that stench, 
I was good upside down, 
I did not want to screach, 
I did not want to bite, 
I did not want thy soul, 
but you played the song of devil, 
brought me to the footsteps of him, 
that sour hearted soul, 
he lured me, 
took my teeth, 
extracted the virus in me.
Oh dear Camilla, 
he laughed raucously,
he synthesized it,
remixed it, 
injected into that mellow eyed chef
and she carried it to her hotel,
cooked and served,
infected others.
Oh dear Camilla, 
.... and what a pity that nobody knows
..... and what a pity they have no cure
..... and what a pity that they suffer badly
.....and what a pity that cure is in their kitchen
Oh dear Camilla, 
let their suffering come to a halt,
let them know the values you want them to know,
let your pledge to the vampire complete it session,
but make it quick Camilla, 
I have a burden on me, 
release that from me, 
I am always yours, 
and I will come back again whenever you want, 
but I want you to free the world from it, 
they have had enough, 
put me to sleep my dear Camilla, 
Oh dear camilla, 
put the Saber toothed vampire to sleep, 
Oh dear Camilla, 
Oh dear.... 
Oh... 
...