Monday, December 6, 2021

वृत्तांत -८ भाग -४

तीसरे अंक से आगे.......

पान वाले के पास से स्कूटर उठा कर मैं घर की तरफ़ चल दिया लेकिन घर जाने की इच्छा नहीं थी| मैंने स्कूटर नाहरगढ़ रोड़ की तरफ़ मोड दिया जहाँ मेरा एक दोस्त रहता था| रोड के अंतिम छोर से पहले मंदिर की दीवार के पास स्कूटर लगा कर पहाड़ी के दुर्गम रास्ते के दाँयी तरफ़ बनी एक झोपड़ी की तरफ़ चल दिया| वहाँ दुनिया भर का कचरा पड़ा था और शूकर मुँह मार रहे थे| तीन बकरियाँ भी अपनी किस्मत आज़मा रही थी के खाने को कुछ मिल जाए|मैं छोटे बड़े पत्थर सब लाँघ कर झोपड़ी की तरफ़ पहुंचा|बाहर पड़ी बाल्टी से चुल्लु भर कर हाथ धोया और अंदर गया| वहाँ मेरा कॉलेज का दोस्त रहता है जो कि उत्तर प्रदेश से पढाई करने जयपुर आया था 15 साल पहले और किस्मत ने आज उसे इस झोपड़ी में ला पटका| खैर, इस विषय पर बाद में चर्चा करेंगे पहले मेरे दोस्त से मिल तो लूँ|

 चार दियोँ की रोशनी से टिमतिमा रही फूस की झोपड़ी के अंदर जाने पर मैंने देखा कि ज़मीन पर मेरा दोस्त पत्थर की सिल्ली का सहारा लेकर बैठा था और पास में उसका बेटा चुन्नु सो रहा था| मैंने कहा "पंडित, क्या हाल हैं?" दोस्त झुंझलाकर बोला "अबे ओ सूदखोर बनिये, मरवायेगा क्या? किसी ने सुन लिया तो पकड़ा जाऊंगा| तू रफीक़ बोला कर मुझे| सबको यही नाम बता रखा है|" मैं हँस दिया| पंडित भी नरम पड़ मुस्कुराने लगा| मैंने कहा " यार आज बिल्कुल भी मन नहीं था घर जाने का तो तेरे पास चला आया|आज खाने का इंतज़ाम हुआ या फ़िर फाका कर रहा है?" दोस्त बोला "चुन्नु को खिलाने लायक रोटी तो मिल गयी थी और उस खानदानी तवायफ् ने अचार दे दिया था तो चुन्नु ने खा लिया|" मैंने कहा "और तूने कुछ नहीं खाया? " दोस्त बोला "कल इधर कुछ लड़के पार्टी करके गए थे तो उनके फेंके हुए मांस के टुकड़े और ब्रेड से काम चल गया|कल की कल देखी जायेगी|" मैं बोला "तू कब तक ऐसे जियेगा? दो साल से यहाँ छुपा हुआ है, भाभी भूख सहन नहीं कर पाने के कारण परलोक सिधार चुकी है, चुन्नु कमज़ोर होता जा रहा है, तू पंडित होकर मांस के टुकड़ों पर जी रहा है लेकिन कब तक? " दोस्त रुआंसा होकर बोला "यार, सब मेरी गलतियों से हो रहा है|भूख इतनी बड़ी चीज़ हो जायेगी कभी सोचा ना था| जब भी कुछ खाने को लाता था तो ललिता चुन्नु और मुझे खिला देती थी| बचा हुआ खाना बाद में खाने को कह कर बचा लेती थी और शाम को फ़िर चुन्नु को खिला देती थी लेकिन खुद भूखी रहती थी और मुझे कहती कि खा लिया| मेरे जीते जी मेरी पत्नी भूख से मर गयी और मैं सर पीटता रह गया|किसकी हाय लगी है मुझे|"

 इस गमगीन माहौल मैं अपने आप को सम्हालते हुए बोला "जो हुआ वो किसी के साथ भी ना हो पर अब तू कर भी क्या सकता है क्योंकि जो होना था सो हो गया| अब तू चुन्नु की सोच|सबसे पहले तो ये ख्याल छोड़ दे कि तेरे गाँव से अब कोई तुझे पकड़ने आयेगा यहाँ क्योंकि कोई नहीं जानता कि तू यहाँ है| तूने जिनको जान से मार डाला था उनके घरवाले अब तक थोड़े ही याद रखे होंगे तुझे और वैसे भी तू अपने किये की सज़ा भुगत चुका है इसलिए पुरानी बातें भूल कर नयी शुरुआत कर| मैं कल तुझे और चुन्नु को यहाँ से ले जाऊंगा, तुझे काम दिलवाउंगा और चुन्नु को स्कूल में दाखिला करवाउंगा| और अब कोई ना नुकुर नहीं चलेगी क्योंकि मैं फैसला कर चुका हूँ|" दोस्त चुपचाप सुन रहा था लेकिन कुछ बोला नहीं|मैंने उसके भाव पढ़ लिए थे कि वो मना करने का बहाना ढूंढ रहा था लेकिन मेरी ज़िद के आगे वो चुप हो चुका था| मैंने कहा " चाँददारा- पानदारा (साथ में लघु शंका जाने के लिए न्यौता देने का देसी कोड) "| दोस्त बोला" तू ही हो आ यार, मैं यादों की सवारी पर सवार हूँ| शायद कल यहाँ नहीं रहूँगा|" मैं उसका इशारा समझ गया था औरऔर खुशी से उसको कल दोपहर आने की कह कर अलविदा करके बाहर आ गया| अब मुझे लघुशंका के लिए साफ जगह चाहिए थी जो थोड़ी और उपर जाकर दिखती सो मैं पहाड़ी के उपर चल पड़ा|

आज का मूड ही सुपर चल रहा है| रात के 12 बज चुके हैं लेकिन घर से अब तक कोई फोन नहीं आया| मेरी तो किसी को चिंता ही नहीं है और हो भी क्यों, मेरे मरने पर बीमा का सारा पैसा जो मिलेगा|खैर, मैं ही फ़ोन करके बोल दूँ| मैंने अपना फोन निकाला तो 45 मिस्ड कॉल थे घर से| हरे राम| मैंने तुरंत फोन मिलाया और पत्नी के द्वारा फोन उठाते ही भजन- कीर्तन की जो मांगलिक बेला का आरंभ हुआ वह 10 मिनट तक चला और जल्दी से जल्दी घर पहुँचने के आंशिक मिथ्या वचन के साथ सुखद परिणाति को प्राप्त हुआ|

फोन रख कर मैं जल्द से जल्द घर के लिए रवाना होना चाहता था इसलिए मैंने तुरंत लघुशंका बाधा निवारण के लिए जगह ढूंढी और एक चट्टान पर विसर्जन कर उसे आधी रात को धन्य किया| रात बहुत मनमोहक थी| ग्यारस का चाँद और हल्की सी ठंडी हवा का झोंका जो बिरले ही कभी महसूस करते हों| टिमतिमाते तारे और मखमली आसमान में सफ़ेद लकीर का वो रॉकेट का धुंआ| अनंत आकाश को भेदने वाली वो उल्लू की आवाज़ें और पक्षियों की उबासियां| क्या प्राकृतिक नज़ारा छोड़ कंक्रीट के जंगलो में हमने अपने घोंसले बना लिए| प्रकृति के नयनाभिराम दृश्यों का रसास्वादन करते समय ही अचानक मेरी नज़र दूर एक महल की तरफ़ से कुछ जनानाओं के खिलखिलने की आवाज़ की तरफ़ गयी| मैं ना चाहते हुए भी उस तरफ़ देखने लगा जिस तरफ़ वे महिलाएँ जा रही थी| वे दूसरे रास्ते से नीचे उतर रही थी तो मैं भी झाड़ियों की ओट के सहारे उनके पीछे हो लिया क्योंकि जीवन की उथल पुथल से अलग हर चीज़ मुझे आकर्षित कर रही थी|

उन महिलाओं के वस्त्र पारंपरिक लग रहे थे जो कि महलों में पहना करते थे|रंग तो साफ़ नहीं दिख रहा था लेकिन छोटे छोटे काँच चमक रहे थे उनके घाघरे और चोली के|वे सब नीचे तालाब के रास्ते शहर की तरफ़ जा रही थीं| मेरा स्कूटर तो दूसरी ओर वाले रास्ते पर खड़ा था और अगर मैं जनानियों के पीछे जाता तो स्कूटर तक पहुँचना बहुत मुश्किल होता पर मैंने पीछा करना श्रेयस्कर समझा और मैं भी शहर के रास्ते चल दिया|सड़के बिल्कुल सुन्न थीं और चाँद की रोशनी से गुलाबी रंग जगमगा रहा था|वे महिलाएँ शहर के मुख्य दरवाज़े से अंदर आयीं और उनमें से एक छरहरे बदन वाली युवती ने खिलखिलाते हुए एक घर के दरवाज़े पर दोनों हाथों के पंजो से थपथपया और खिलखिलाते हुए आगे बढ़ गयी|किसी ने भी दरवाज़ा नहीं खोला और फ़िर एक और युवती ने वैसे ही तरीके से दरवाज़ा थपथपाया| इस बार दरवाज़ा खुला और एक अत्यंत बूढ़ा आदमी थाली में कुछ अनारदाने, खट्टी मीठी गोलियां, कुछ सूखे छुआरे और सूखी इमलियाँ बाहर रख कर वापस दरवाज़ा बंद कर अंदर चला गया| महिलाओं ने थाली में से सब उठा लिया और आगे बढ़ गयीं|

अब वे आगे के कई घरों पर थपथपा कर आगे बढ़ जातीं लेकिन रुकती नहीं थीं|कुल 9 महिलाएँ इतना खुल कर सड़क के बीचों बीच चल रही हैं और कोई इक्का-दुक्का आने जाने वाला उन्हें नहीं देख रहा था|कमाल ही है|उसी समय एक पुलिस की गाड़ी पीछे से आयी और उन महिलाओं के आर पार होकर निकल गयीं|ये क्या हुआ? गाड़ी आर पार? कोई चोट नहीं और सब कुछ पहले जैसा? वैसी ही चाल और वैसी ही खिलखिलहट! मेरे तो पैर जम गए|चौपड़ से 100 मीटर दूर मैं खड़ा ही रह गया और वो महिलाएँ चौपड़ के नीचे चली गयीं| तभी मेरे कान में एक जनानी आवाज़ आयी "मीठी गुड़ की डली और कड़वा मेरा पान, खाये जो 100 बरस जिये और फेंके तो दे दे अपनी जान|" मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो एक अत्यंत सुंदर से वस्त्रों में लिपटी कन्या कुमारी अपने मुख में पान का बीड़ा दबाये मुझे पलटी नज़रों से देखते हुए भागी जा रही थी| उसके मादकता भरे चक्षु मुझे मेरा नाम पुकारते लग रहे थे|नहीं! मैं नहीं जाऊँगा उसके पीछे|मेरे पीछे मेरी पत्नी और बच्चा है|नहीं|मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ गया है|मुझे घर जाना है|मुझे सब घूमता हुआ दिखाई दे रहा है|अंततः मैं मूर्छित होकर गिर पड़ा|

आगे जारी है.........

Monday, November 15, 2021

वृत्तांत-८ भाग-३

पिछले भाग से आगे जारी. .....

मैं तेजी से स्कूटर दौड़ाता हुआ जा रहा था कि दो चौराहा आगे मुझे पंडो का एक समूह रेलवे स्टेशन की तरफ़ जाता हुआ दिखा| मैंने अपना स्कूटर धीरे किया और उनकी तरफ़ घुमा दिया| नुक्कड़ पर पान वाले के पास स्कूटर खड़ा करके मैं उनके पीछे हो लिया| मैंने उनसे कोई बात शुरू नही की लेकिन उनकी बातें सुनने लगा| उनमें से एक व्यक्ति बहुत ही उम्रदराज थे और अँग्रेजी-हिंदी मिश्रित बोल रहे थे वहीं दूसरी ओर एक युवक उनसे कुछ पूछ रहे थे जिसका उत्तर वे वृद्ध व्यक्ति दे रहे थे| मेरे हिसाब से वो युवक शायद कोई पत्रकार थे और वो वृद्ध व्यक्ति कोई संत| वृद्ध व्यक्ति कह रहे थे " हिंदू एक भौगोलिक स्थिति को भी दर्शाता है, पंथ-संस्कार को भी दर्शाता है और रक्त सम्मिश्रण को भी| जब इन तीनों अभिलक्षण को मिला दिया जाता है तो हिंदुत्व की उत्पति होती है| जो पंथ-संस्कार को ही मानते हैं वो हिंदू-धर्म को ही मान रहे हैं लेकिन भौगोलिक स्थित एवं रक्त सम्मिश्रण के प्रति उनके विचार अलग हैं इसलिए वो हिंदुत्व का समर्थन नहीं करते हैं और 'हंटर हिंदुइसम्' (Hunter Hinduism) के नाम से संबोधित किया करते हैं|" युवक ने पूछा " क्या हिंदुत्व को 'हंटर हिंदुइसम्' कहा जा रहा है?" वृद्ध व्यक्ति ने कहा " नहीं| हिंदुत्व एक तार्किक मान्यता है जबकि इस मान्यता को चाबुक अथवा कुतर्कि हिंसा के ज़ोर पर मनवाने वाले गैंगवादी लोगों के कुकृत्यों से यह हंटर हिंदुइसम् का रूप धारण कर लेता है|" युवक ने फ़िर पूछा " मुझे क्या मानना चाहिए: हिंदू-धर्म या हिंदुत्व या हंटर हिंदुइसम्? " वृद्ध ने कहा " मान्यता किसी के कहने से मानो तो फ़िर हिंदू होने का लाभ ही क्या हुआ? किसी को ना मानना भी हिंदू-धर्म की सुंदरता को दर्शाता है| वहीं अगर पित्रभूमि और पुण्यभूमि के प्रति भी आसक्ति है तो हिंदुत्व उपलब्ध है लेकिन ध्यान रहे की हिंदुत्व की डगर बहुत संकरी है जिसके एक तरफ़ आत्मबोध है तो दूसरी तरफ़ हंटर-हिंदुइसम्|"

मैं अब पागल होने वाला था|अपना सिर पकड़ कर मैं खिलौनों की दुकान के बाहर बनी सीढ़ी पर बैठ गया| थोड़ा सोच कर उठा और दुकान के अंदर चला गया| इधर उधर खिलौनों पर नज़र दौड़ाई ताकि समय काट सकूँ| ग्राहक देख कर मालिक ने पूछा " बच्चा कितने साल का है? " मैंने अनमने कहा " सात साल का |" दुकान्दार ने फ़िर पूछा " कितने बजट का दिखाऊँ?" मैंने कहा "बजट की तो समस्या नहीं है लेकिन ये सब तो चीनी लग रहे हैं| मेड इन इंडिया दिखाइये|" दुकान्दार ने घूर कर देखा और कहा "भाईसाहब| ये सारा माल चीन से ही आता है और आपको हर जगह ये ही मिलेगा|" मुझे कुछ खरीदना तो था नहीं तो मैंने कहा "मैं एक देशप्रेमी हूँ, चीन का माल नहीं खरीदूँगा|" दुकान्दार खिसियता हुआ अपने गल्ले के पास चला गया और बड़बड़ाने लगा| मैं भी वापस जाने लगा तो एक पोस्टर पर नज़र गयी जिसमें गौ सेवा संस्थान ने दान पुण्य के लिए रेट लिस्ट लगा रखी थी जिसके तहत गुड़ सेवा के 1100/- रुपये, बाजरा सेवा के 2100/- रुपये और तिल्ली तेल के 3100/- रुपये के सहयोग के लिए संकल्प मांगा गया था| मैंने 2100/- का पेटीएम डाल दिया और जाने लगा| दुकान्दार ने रोका और पूछा " भाईसाहब, एक बात पूछनी थी| आपने इस मंदी में भी 2100/- का पेटीएम डाल दिया बिना ये पूछे की ये पैसा वाकई में गौ सेवा में ही लगेगा या नहीं!? " मैंने कहा " आज मेरा मूड खराब था, समय काटने आपकी दुकान में घुस गया और बिना सोचे जाने ही दान भी कर दिया| मनुष्य चरित्र बड़ा विचित्र है| एक तरफ़ तो मैंने देशप्रेम की भावना दिखा कर आपके माल को दरकिनार कर दिया और वहीं दूसरी तरफ़ बिना जाने दान कर डाला|गाय एक बहुत उपयोगी पशु है और हमारे समाज में पूजनीय भी तो मैंने जेब ढीली कर दी| गाय हमारे लिए इतनी पूजनीय है कि उसके मांस और चमड़े के निर्यात के व्यापार पर कब्ज़े के लिए 'हंटर' पागल हो उठे|" दुकान्दार के कुछ समझ नहीं आ रहा था पर वो यह समझ गया था की बहस नहीं करनी है वरना चिल्लम-चिल्ली हो जाएगी| उसने एक चमकने वाला लट्टु और रस्सी दिया मेरे बच्चे के लिये और कहा " गौ माता आपके परिवार को हमेशा प्रसन्न रखे|" मैं धन्यवाद कर दुकान के बाहर आ गया और धीमी गति से पान वाले की तरफ़ बढ़ गया जहाँ मेरा स्कूटर खड़ा था|

आगे जारी है ........

Saturday, October 16, 2021

वृत्तांत ८ - भाग २

प्रथम भाग से आगे........ 

घर जाते समय मेरा ध्यान अकस्मात् ही उस मंदिर की तरफ चला गया जिसके बारे में साडू साहब ने बताया था| लाल बत्ती पर दो मिनट रुकना था तो मैं स्कूटर पर बैठे-बैठे ही अंदर झांकने लगा|मुख्य पट बंद थे और काफी लोग पट खुलने के इंतज़ार में खड़े थे|खड़े हुए लोगों की पीठ मेरी तरफ थी इसलिए किसी का चेहरा नहीं देख सकता था|तभी अचानक से मेरा ध्यान मंदिर के पास वाली अंधेरी संकरी गली की तरफ़ गया जिसमें से मौलवी साहब निकल कर मंदिर के विपरीत दिशा की ओर बढ़ गए और बीस सेकेंड में आँखों से ओझल हो गए| ये वो ही मौलवी साहब थे जो मेरे मकान का सौदा लेकर मेरी दुकान पधारे थे| इतने में बत्ती हरी हो गयी और मैं निकल पड़ा अपने घर एक नई उधेड़बुन के साथ| 

अगले दिन सुबह डेयरी पर दूध ख़रीदते समय मुझे मस्जिद की सफाई करने वाला मिला|वो भी दूध खरीदने आया था|डेयरी वाले ने मज़ाक में कहा "मियाँ, आज दूधवाला नहीं पहुँचा मस्जिद में जो हमारी डेयरी पर आये हो? अगर गाय का मांस चाहिए हो कहीं और जाना पड़ेगा|" सफ़ाईवाला हंस दिया और दूध खरीद कर चल पड़ा|मैं भी उसके पीछे चल दिया और थोड़ा आगे जाकर गली की घूम पर उसको आवाज़ देकर रोक लिया|मैंने कहा" यार जुम्मन, एक बात तो बता|कल तेरे मौलवी को मंदिर के पीछे वाली गली से निकलते देखा था लेकिन समझ नहीं आया कि वो वहाँ गए क्यों थे?" जुम्मन बोला " मौलवी साहब का तो आना जाना है वहाँ काफी|ज़मीन जायदाद के मामले रहते हैं जो ये आपस में सुलझाते हैं|आप और हम तो गाय-गोबर ही करते रह गए और ये अल्लाह को ठेके पर बेच आये|" मैंने कहा " क्या बे बावली टांट|कुछ भी बके जा रहा है| तुझे तो रोकना ही ग़लत हो गया|सारा दिन ख़राब जायेगा अब|" मेरी झाड़ खा कर सफ़ाईवाला अपने रास्ते निकल गया और मैं अपने रास्ते चला गया| 

दिन भर मेरा बकवास निकला और दो हज़ार का काम करके वापस सांय को अपने घर चल दिया|आज पूरा ध्यान मंदिर पर था और बत्ती लाल हुए बिना भी स्कूटर किनारे लगा कर मंदिर में ताका झांकी करने लगा| आरती का समय था तो सब ध्यान में लीन थे|तभी मेरा ध्यान लाल बुशट के आदमी पर पड़ी जो कि जाना माना हिस्ट्रिशीटर था और अटकी ज़मीनो की सौदेबाज़ी करवाता था|मैं अपना स्कूटर और थैला वहीं छोड़ मंदिर के अंदर चल पड़ा| मेरा पूरा ध्यान हिस्ट्रिशीटर पर था|वह माथे पर तिलक लगा कर परिक्रमा के लिए पीछे गया और दस मिनट बाद बाहर आया|मुझे कुछ समझ नही आया और मैं भी परिक्रमा के लिए अंदर गया और दस सेकंड में बाहर आ गया| कुछ समझ नहीं आया|अब तक मंदिर के पट बंद होने का समय हो गया था और इक्का दुक्का लोग ही प्रांगण में रह गए थे| मेरा मन नहीं मान रहा था जाने के लिए लेकिन जाना तो था|मैंने फिर परिक्रमा के लिए कदम बढ़ाये और पीछे मत्था टेक कर आगे बढ़ने लगा| तभी ताला लगे कमरे से आवाज़ सुनाई दी तो मैं ठिठका और गौर से सुनने की कोशिश करने लगा| अंदर से एक भारी आवाज़ आ रही थी " देखो, तुम चाहे कुछ भी कहो लेकिन इस ज़मीन का 1 करोड़ से ज़्यादा नहीं होता है|कितनी मेहनत की है हमने ये हमें पता है| आप तो जिंदगी भर खाली नहीं करवा सकते थे| एक बीघा भले ही है लेकिन दस करोड़ का माल कहीं से नहीं है|" एक रूआँसि आवाज़ उठी और बोली " महाराज|आपने तो जबरदस्ती वहाँ पत्थर की मूर्ति रखवा दी और दीया बत्ती करवाने लगे| हमारी बात तो केवल ज़मीन मुक्त करवाने की थी लेकिन अब आप उसको खरीदने को आतुर हो रहे हैं|ये तो अन्याय हो रहा है| मुझे उस ज़मीन के दस करोड़ मिल रहे हैं और अगर आप खरीदना चाहते हैं तो मुझे इतने दिलवा दीजिये|" भारी आवाज़ ने कहा " सुन सेठ| अब वहाँ ठाकुर जी की पूजा होगी और तू दुनिया की किसी भी कचहरी में चला जा, ये ज़मीन ठाकुर जी की ही रहेगी|एक करोड़ तेरे हैं कभी भी ले जाना लेकिन धर्म के आड़े कभी मत आना| तेरा हर काम निकाला है ठाकुर जी ने और आगे भी निकालते रहेंगे| तेरे माल की गाड़ी कभी अटकी? तेरे पास ख़रीदार की कभी कमी हुयी? एक धरती के टुकड़े के लिए मत रो|अलीपुरा में एक मौके का सौदा आया है|उसका मालिक कोई छोटा सा टाइलवाला है जिसमें अधिक पुदीना नहीं है|वो मकान नहीं बेच रहा है मौलवी को तो तू दिलवा दे|मौलवी डेढ़ करोड़ देगा| बाकी तू समझदार है|" 

इतना सुनकर मेरी रूह काँप उठी|मैं भागा और स्कूटर उठा कर रवाना हुआ| ये लोग मेरे ही पुराने वाले मकान की बात कर रहे हैं जिसका सौदा वो मौलवी लेकर आया था|तो क्या ये मौलवी..... मंदिर...... हिस्ट्रीशिटर... सब मिले हुए हैं? ये सब क्या हो रहा है? मैंने स्कूटर की गति बढ़ा दी|

आगे जारी है।......... 

Thursday, September 30, 2021

वृत्तांत - ८

नमस्कार साथियों, आज मैं फिर उपस्थित हूँ आपके सामने एक नये वृत्तांत के साथ जो कि मेरे एक मित्र ने मुझे सुनाया जो कि अक्षरक्ष: आपके समक्ष प्रस्तुत है:-

मैं वही एक अदना सा व्यापारी जो समय समय पर अपने आस पास होने वाली घटनाओं को आपसे साझा कर लेता हूँ| पिछले कुछ महीनों से मेरा काम बहुत कम हो गया था| बिक्री दस प्रतिशत ही रह गयी थी जबकि तीन दुकान आगे कालूराम की दुकान बड़ी अच्छी चल रही थी जो कि मुझसे समान खरीदकर ग्राहकों को महंगा बेचा करता था| मेरे पास तो माल ना बिके जबकि वो ही माल दूसरा दूकान्दार बेच रहा है ज़्यादा क़ीमत लेकर| ये गड़बड़ समझ नहीं आती|कहीं किसी ने टोटका तो नहीं कर दिया मेरी दुकान पर? शायद इस कालूराम ने ही मेरी दुकान बांध दी है वरना चलता हुआ धंधा कैसे रुक गया मेरा? इतने में मेरे साडू साहब दुकान पधारे और मुझे परेशान देख कर पूछ बैठे "क्या हुआ कंवर साहब, इतने उलझन में क्यों दिखाई दे रहे हो? सब ठीक तो है ना?" मैंने उनकी बात जवाब देते हुए कहा " क्या बताऊँ बड़े कंवर साहब, धंधा तो पाताल लोक चला गया है मेरा| मेरे यहाँ ग्राहकों का अकाल पड़ रहा है और वहाँ तीन दुकान आगे वो कालूराम चाँदी काट रहा है| मेरी दुकान को नज़र लग गयी है|" बड़े कंवर साहब कुछ सोच में पड़ गए और बोले "कँवर साहब मेरे पास अचूक रामबाण है लेकिन आप किसी को नहीं बोलेंगे ये बात|" मैंने तुरंत हामी भर दी| दुकान पर काम के लिए रखे लड़के को डमरुलाल का समोसा और चाय लेने भेज दियादिया और ध्यान से बड़े कंवर साहब की बात सुनने लगा|

बड़े कंवर साहब ने पूछा " कौनसे मंदिर जाते हो? " मैंने बता दिया| बड़े कँवर साहब हंस दिये और बोले " अब उस मंदिर के महंत में दम नहीं रहा| उनके पिताजी यानी बड़े महंत साहब तो जिस दिन विदा हुए दुनिया से उसी दिन से मंदिर कमज़ोर हो गया| बड़े महंत जी ने चढ़ावे का सारा पैसा ब्याज पर चला रखा था झर्जहोला वाले परिवार के द्वारा जिसकी कोई लिखा पढ़ी नहीं हो रखी थी| बड़े महंत विदा हुए और सारा पैसा हजम| अब नये महंत साहब को नये सिरे से सब करना पड़ रहा है जिसके कारण अब जान-पहचान के प्रभावशाली लोगों का ध्यान दूसरे शक्तिशाली महंत के मंदिर में लगने लगा है ताकि उनके अटके काम निकल सकें जिसे बदले में वो बड़ा चढ़ावा चढ़ा आते हैं| महंत शक्तिशाली होंगे तो चमत्कार भी बड़े होंगे और सबका काम निकलने लगेगा| आप चौराहे से तीन गली आगे कोने वाले मंदिर में जाया करें अब|वहाँ सारी इच्छायें पूरी होती हैं|आप जब वहाँ जाएँ तो केवल दर्शन या परिक्रमा ही ना करें बल्कि पुजारी एवं उनके शिष्यों से भी जानकारी बढ़ाना शुरू करें| उनसे चलाकर कहें कि आपका काम नहीं चल रहा है, बड़ा दुखी हूँ महाराज, क्या करूँ? वो आपको बाद में आने को कहेंगे| आप बाद में जाना और दीन हीन स्थिति में उनको अपनी बात कहना और सबको महाराज कह कर ही संबोधित करना है| वो आपको कुछ खास तरह का उपाय बतायेंगे जैसे की किसी देवता की फोटो अपनी दुकान में लगाने के लिए या फ़िर कोई खास तरह की अंगूठी पहनने के लिए| वो जो भी बोले आप कर लेना| एक बात का और ध्यान रखना, अगर मुख्य पुजारी आपसे बात कर रहे हैं तो पैसा दान पेटी में डालना क्योंकि वो सीधे पैसा लेना अपमान समझेंगे लेकिन अगर कोई शिष्य हो तो 2100/- रुपये बिना देर किये दक्षिणा पकड़ देना| अब आप एक समय बांध लेना और उसी समय मंदिर जाना ताकि आप उनकी नज़र में रहो| ऐसा आप एक महीने तक करना फ़िर मुझे बताना|"

मैंने बड़े अचरज के साथ उनकी पूरी बात सुनी और बिना हिचक के हामी भर दी| इतने में दुकान का लड़का समोसा और चाय ले आया और हमने इधर उधर की बातें करके खाने पीने का लुत्फ़ उठाया| एक घंटे बाद साडू साहब विदा हुए और मैं ग्राहकों का इंतज़ार करने लगा और साथ ही सोचने लगा कि मेरे साडू साहब अपना मानसिक संतुलन खो चुके हैं जो ऐसी बहकी हुई सलाह दे गए| मंदिर तो हमारी मानसिक संतुष्टि और चित्त को शांत करने के लिए होते हैं|मेरा काम तो पहले भी बिना किसी महंत या पुजारी के चलता ही था| मंदिरो की पवित्रता को ब्याज बट्टे से जोड़ना अक्षम्य अपराध है और मैं अपने साडू साहब की उजड़ी बुद्धि के ठीक हो जाने के लिए इन्ही के सुझाए मंदिर में इनके नाम का प्रसाद बोल कर आऊंगा|

इतना सब सोचते हुए कब सांझ ढल गयी मालूम ही नहीं चला| गोधूलि बेला के बाद रात्रि आहट पर मैं दुकान मंगल कर बिना बोहनी किये घर रवाना हो गया|

वृत्तांत जारी है...........

Wednesday, May 26, 2021

वृत्तांत-७

नमस्कारl साथियों, आज फिर प्रस्तुत हूँ आपके सामने एक वृत्तांत लेकर जो मेरे मित्र ने सुनाया और अब मै आपको सुना रहा हूँ| निम्नलिखित है वृत्तांत:-

मैं वही प्लंबिंग एवं सैनट्री एक छोटा सा दुकानदार जो महामारी की दूसरी लहर के कारण सरकारी आदेश की पालना करते हुए घर पर बैठा है और पुरानी कमाई से घर खर्च चला रहा है| अब तो समय व्यतीत ही नहीं होता है| पत्नी और बच्चे से कितनी और क्या बात करें|पत्नी की बातें घरेलू मुद्दों पर केंद्रित रहती हैं जिसमें मुख्यतः रसोई, गद्दे के कवर, पर्दे, गहनों की पॉलिश, बच्चे की शिक्षा, नकद की गिनती, फोटो एल्बम, जेठानी और ननद के किस्से, पड़ोसी के घर की अंदरूनी जानकारी एवं अपने पीहर वालों की बढ़ाई शामिल है| इसी तरह 7 साल का बच्चा भी अपने ही अलग आयाम में घूमता रहता है जिसमें खेलकूद, कार्टून इत्यादि मुख्य है| मैं काम-धंधे और राजनीतिक बातों में अधिक रुचि रखता हूं इसीलिए दूरभाष पर अपने मित्रों से समसामयिक मुद्दों पर मंथन करता रहता हूँ| इसी तरह आज मेरे एक बहुत पुराने मित्र से मेरी वीडियो वार्ता हुई जो मैं आपको बताने जा रहा हूँ| 

मेरा मित्र आशीष पाली जिले में पला बढ़ा और जयपुर में कॉलेज की पढ़ाई करके दिल्ली नौकरी के लिए चला गया|शुरू से ही वह एक संस्था से जुड़ा हुआ था जिसके सामाजिक कार्यो में वह बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेता था और आज भी लेता है| हमारी वार्ता के मध्य में संस्था का स्मरण हुआ तो बात चली| मेरे मित्र ने कहा "यार, तू इतना समझदार होकर भी हमारी संस्था से क्यों दूर है? तेरा आधार नंबर दे, अभी जोड़ देता हूँ|" मैंने कहा " रहने दे भाई|मेरे पास काम धंधे से कहाँ फुर्सत है जो तेरी संस्था को समय दे पाऊँगा|" मित्र ने कहा "क्या बे, तू फ़िर से घुमा फिरा कर टाल रहा है मुझे|सच सच बता, तू आना क्यों नहीं चाहता हमारी संस्था के साथ? " मैंने कहा "देख भाई, सच तो ये है की तुम्हारी संस्था का सामाजिक सरोकार से कोई लेना देना नहीं है|तुम भले ही समाज सुधार का चोगा पहने हुए हो लेकिन तुम कभी भी सुधार की तरफ नहीं बढ़ पाये|" मित्र ने पूछा "वो कैसे? हम तो हमेशा राष्ट्र और समाज के उत्थान में तत्पर रहे हैं|" मैंने कहा "चल इतिहास से चालू करते हैं|तुम्हारी संस्था बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में बनी लेकिन स्वतंत्रता संग्राम के किसी भी आंदोलन में तुम्हारी संस्था ने भाग नहीं लिया बल्कि अपने कार्यकर्ताऔं को मना भी किया भाग लेने से|भले ही पूरा देश ग़ुलामी की ज़न्जीरों से मुक्ति के लिए असहयोग आंदोलन कर रहा हो, नमक बनाकर विदेशी ताकत को ललकार रहा हो, 'भारत छोड़ो आंदोलन' कर रहा हो, भारत के संविधान पर मंथन कर रहा हो लेकिन तुम्हारी संस्था हमेशा अंग्रेज़ों के साथ खड़ी होकर गद्धारी का झंडा फहराती रही|" मित्र ने कहा "यार तू बहुत भोला है| जो कुछ भी तूने कहा है वो सब ग़लत है| दरअसल, जिन आंदोलनों की तू बात कर रहा है वो तो कांग्रेस के आंदोलन थे जो की उस बुड्ढे गांधी और उस मुसलमान नेहरू की सोची समझी साज़िश का हिस्सा थे|ये तो सब जानते हैं की गांधी और नेहरू लड़कीबाज थे और मुसलमानों को अत्यधिक प्रेम करते थे|" मैंने कहा "यही तो समस्या है तुम्हारी संस्था की| इतना झूठ बोलते हो की सच लगने लगता है| ना तो गांधी लड़कीबाज थे और ना ही नेहरू मुस्लिम|गांधी ने जो प्रयोग किये थे वो खुद सबके सामने खुली किताब की तरह रखे हैं जिसमें वो बताते हैं की कैसे उन्होंने ब्रहम्चर्य को परखा और जाना|जहाँ तक रही नेहरू की, तो मैं ये बता दूँ की किसी महिला से ठिठोली करते हुए फोटो से ये बात नहीं कही जा सकती की वो लड़कीबाज है और मैं ये फोटो वाली बात इसलिए कह रहा हूँ कि तुम्हारी संस्था के पास नेहरू के खिलाफ़ फ़ोटो के अलावा और कुछ भी नहीं है लड़कीबाज वाले लेबल के लिए|अब बात कर लेते हैं नेहरू के मुसलमान होने की तो मैं ये बता दूँ की तुम्हारी संस्था के पास एक भी ऐसा सबूत नहीं है जिससे यह पता चल सके की नेहरू मुसलमान थे|चलो मैं ये बात एक बार मान भी लूँ की गांधी लड़कीबाज थे और नेहरू मुसलमान थे तो भी तुम्हारी संस्था अपना अलग आंदोलन कर सकती थी जैसे सुभाष चंद्र बोस ने कर रखा था,लेकिन सच तो ये है कि तुम्हारी संस्था के लोगों ने अंग्रेज़ों से करार कर रखा था की तुम भारत के किसी भी स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में भाग नहीं लोगे|गद्दारी करके खुद को राष्ट्रवादी कैसे कह सकते हो? तुम्हारी संस्था का एक भी व्यक्ति आज़ादी की लड़ाई में ना तो जेल गया ना ही शहीद हुआ|ऊपर से,खुद को मुसलमान विरोधी बोलते हो और खुद ही अपने उस परममित्र संगठन का समर्थन करते हो जिसने सिंध प्रांत में 1939 मेंमें सरकार बना ली थी मुस्लिम लीग के समर्थन से जिसका भी कोई नहीं गया जेल और ना शहीद हुआ|सच तो ये है कि तुम्हारी संस्था और मुस्लिम लीग एक ही जैसे लोगों से भरी हुई थी,बस पंथ अलग थे|जो नफ़रत वो मदरसों में सिखाते थे,तुम लाठी पकड़ाकर गली कूचों में सिखाते थे|और एक बात, तुम्हारी संस्था के
परममित्र संगठन के अध्यक्ष साहब अंग्रेज़ों से चार बार माफीनामा लिख कर जेल से छूटे थे और बाहर आकर साठ रुपये महीने की पगार पर अंग्रेज़ों के लिए मुखबिरी करते थे|अब और क्या बोलूँ, तुम्हारी संस्था तो तिरंगे को भी आत्मसात नहीं कर पाई तो फिर इस देश की आत्मा को समझना तो बहुत दूर की बात है|"

मेरे मित्र ने कहा "यार तू भी मुसलमान बन गया है क्या जो उन लोगों की तरह बात कर रहा है? या फिर किसी इस्लाम परस्त गुट ने तुझे बरगला दिया है? देशभक्त बनो ना कि गद्दार| जब ये लोग तुझे मारने आयेंगे तब हम ही बचाने आयेंगे| ये लोग किसी के सगे नहीं हैं|" मैंने कहा "यार, तू तो बिल्कुल रेडियो की तरह बोल रहा है|मैंने जो इतना सब कुछ बोला तेरी संस्था की गद्दारी के लिए, उसको तो तूने हवा में उड़ा दिया और ले-दे कर मुसलमानों पर आ गया| मेरी मुसलमानों से कोई यारी वगैरह नहीं है और इस्लाम को मैं एक विध्वंसक पंथ मानता हूँ जिसने तबाही के सिवाय कुछ नहीं किया लेकिन इसका मतलब ये बिल्कुल भी नहीं है कि मैं तुम्हारी संस्था के झूठ और मक्कारी भरे कामों को सही ठहरा दूँ|तुम लोग दरअसल सनातन धर्म को समझ ही नहीं पाए और हिंदू राष्ट्रावाद का राग अलापने लगे|जैसे मदरसे इस्लामी राष्ट्रावाद पढ़ाते हैं जिसमें वो बच्चों को भारत को एक इस्लामी राष्ट्र में तब्दील करने के लिए उकसाते हैं वैसे ही तुम्हारी संस्था हिंदू राष्ट्रावाद पढ़ाती है जिसमें भारत को हिंदू राष्ट्र में परिवर्तित करने की बात करते हो|"

मेरे मित्र ने कहा" यार, जब तू खुद इस्लाम को विध्वंसक मानता है तो फिर दिक्कत कहाँ है भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने में?" मैंने कहा " देख भाई, तुम लोगों ने सनातन धर्म को एक साँचे में ढालने की कोशीश की है जो कि बिल्कुल ग़लत है|सनातन धर्म कई शताब्दियों से बदलता रहा है और हर बदलाव को आत्मसात् करता आया है|हमने खुद को किसी भी ग्रंथ में बांध कर नहीं रखा और खुले विचारों से दर्शन करते रहे फिर चाहे वो महावीर के विचार हों, बुद्ध के हों या गुरु नानक के|कोई भगवान को मानता है तो कोई नहीं मानता|कोई, शिव को मानता तो कोई विष्णु को तो कोई उनके अवतारों को लेकिन कभी भी किसी को जबरदस्ती नहीं मनवाया|सनातन धर्म का मतलब ही अनादि -अनन्त है और आप लोग इसका आदि- अंत अपने मतलब के अनुसार परिभाषित करते हो|हिंदू एक भौगोलिक स्थिति पर आधारित नाम है जो पूरे सनातन धर्म के लिए अपूर्ण है|आपके हिंदुत्व की परिभाषा मुसलमानों के आक्रमण से शुरू होती है और उनके पतन के साथ समाप्त हो जाती है| मैं इस्लामी चश्मे से सनातन धर्म को नहीं देखता इसीलिए मैं आपकी संस्था से नहीं जुड़ता|तुम्हारी संस्था वर्ण-व्यवस्था की हितैषी है इसलिए सामाजिक स्थिरता कभी नहीं हो पायेगी| तुम्हारी संस्था वापस दो हज़ार साल पीछे चले जाना चाहती है जब स्कूल नहीं आश्रम होते थे, जब मोटर वाहन नहीं बल्कि बैलगाड़ी होती थी, जब लोकतंत्र नहीं बल्कि राजशाही होती थी और जब औरतें घर और खेतों तक ही सीमित थी|"

मेरे मित्र ने कहा"भाई, तू नक्सली हो गया है और इसीलिए देशद्रोह करने पर आमादा है| अभी भी समय रहते आजा हमारे साथ|" मैंने कहा "तुम्हारी संस्था को बुनियादी सोच बदलनी होगी अगर मुझे अपने साथ जोड़ना है तो वरना जो है सो है|" मित्र ने कहा "भाई, खतना मुबारक हो| जय हिंद,जय भारत|" इतना कह कर हमारी वीडियो वार्ता समाप्त हुई और मैं दोपहर के खाने के लिए रसोई की तरफ़ बढ़ चला|

तो मित्रों, ये था मेरे एक मित्र द्वारा किया गया एक वर्णन उनके जीवन के दैनिक वृत्तांत में से एक|मैं फिर मिलूँगा आपसे एक नये वर्णन के साथ| प्रणाम|

Saturday, March 13, 2021

वृत्तांत 6 - उम्माह

नमस्कार साथियों | आज फिर मैं आपके समक्ष प्रस्तुत हूँ एक बिल्कुल अलग वृत्तांत लेकर जो आज के सामाजिक ताने बाने को दर्शाता है | यह वृत्तांत मुझे मेरे मित्र ने सुनाया जो कि अक्षरक्षः निम्नलिखित है :-
 
मैं वही एक अदना सा प्लम्बिंग एवं सैनेट्री का छोटा सा व्यापारी जो कि दिन भर मजदूरी करके अपने परिवार का पेट पाल रहा है |अन्य दिनों की तरह ही कल भी मैं दोपहर का भोजन करके अपनी कुर्सी पर ऊंघ रहा था | तभी कुछ दूर स्थित एक मस्जिद के मौलवी साहब का दुकान आना हुआ | मैं उनके आदर में उठ खड़ा हुआ और उनका हाथ जोड़कर अभिवादन किया जिसका उनकी तरफ से कोई उत्तर नहीं दिया गया | ख़ैर, मैंने उनको कुर्सी पर बैठाकर अपनी कुर्सी संभाली और उनकी खैरियत पूछी और उन्हे चाय कॉफी पूछी जिसका भी उन्होने कोई प्रत्युत्तर नहीं दिया | उन्होंने अपने आने का प्रयोजन साफ करते हुए कहा " मियाँ, हमने सुना है कि भट्टा बस्ती इलाके में आपका एक मकान है 650 गज में जो कि आप निकलना चाहते हैं |" मैंने कहा "आप ने बिल्कुल सही सुना है लेकिन उस मकान की सही कीमत नहीं मिल रही है |" मौलवी साहब बोले " मियाँ, जो मिल रहा है ले लो क्यूँकि आसपास के सारे मकान मुसलमानों के हो चुके हैं और आपका मकान भी अब कोई मुसलमान ही खरीदेगा |"

मैं थोड़ा सकुचाते हुए बोला " जनाब गुस्ताखी माफ लेकिन मैं और आप एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं और कोई भी पंथ का व्यक्ति मेरा मकान खरीदने के लिए आ सकता है |" मौलवी साहब हंसते हुए बोले "बर्खुरदार, ये सब बराबरी वाली बातें आप पर फबती हैं, हम लोग तो वहीं रहना पसंद करते हैं जहां हमारे लोग रहना पसंद करते हैं | आप अगर ये सोचते हैं कि आपकी कौम का कोई आदमी वह मकान 3 करोड़ में खरीद लेगा तो कयामत तक इंतज़ार करके देख लीजिएगा | आपको हमारे लोगों को ही अपना माल बेचना होगा| जैसे जैसे कॉलोनी के दूसरे मकान हम खरीदते जाएंगे, वैसे-वैसे आपके मकान की कीमत गिरती जाएगी |मैं आपके पास 2 करोड़ की पेशकश लाया हूँ | आधा कैश अभी तुरंत और आधा डिमांड ड्राफ्ट रजिस्ट्री के वक़्त | बोलिए |" मैंने कहा " आप तो बिल्कुल ग़ैरवाजिब कीमत लगा रहे हैं | 3 करोड़ से नीचे तो कीमत ही नहीं है उस मकान की |" मौलवी साहब बोले "जनाब आप मौके की नज़ाकत को नहीं समझ पा रहे हैं |आज मैं खुद आपके पास चलकर आया हूँ इसलिए 2 करोड़ दे रहा हूं | खुदा ना खास्ता आप आज ना कर देते हैं तो कल कम से कम 2 करोड़ तो नहीं मिलेंगे और दलाली देनी पड़ेगी सो अलग |" मैंने कहा" ये तो सरासर दादागिरी है, मेरी मर्ज़ी मैं कितने में भी बेचूं और मैं चाहूंगा तो ये कभी बिकेगा ही नहीं |" मौलवी साहब बोले" ये तो और भी अच्छा है|" मैं सकते में आ गया और बोला" आपकी कौम पहले जहां कम संख्या में होती है वहां तो अच्छा बन कर रहते हो और जहाँ तादात बढ़ जाती है वहाँ दादागिरी करने लगते हो |"

मौलवी साहब उठ खड़े हुए और बोले "हम तो रसूल के बंदे हैं, उसी की सुनते हैं और उसी के हिसाब से चलते हैं |आज यूँ ही हमारी उम्माह इतनी बड़ी नहीं हुई है | तुम्हारे मकान को तुड़वा कर वहाँ इलाके की सबसे बड़ी मस्जिद बनाएंगे और तुम नहीं बेचोगे ज़मीन तो भी मस्जिद तो वहीं बनेगी | इसलिए बेच कर पैसा ले लो वर्ना वो भी हाथ से निकल जाएगा | हम अल्लाह से डरते हैं इसलिए तुम्हें तुम्हारा हक़ दे रहे हैं लेकिन इन्तेहां होने पर तुम कुछ भी नहीं बचा पाओगे |"

इतना कह कर मौलवी साहब चले गए और मुझे उलझन में डाल गए |3 करोड़ का मकान 2 करोड़ में कैसे बेच दूँ लेकिन उनकी बात भी गौर करने लायक है क्यूँकि जो सबसे पहले मकान बिका था 700 गज का 15 साल पहले उसके 3 करोड़ रुपये की कीमत लगी थी, यानी कि 42,000/- प्रति वर्ग गज, जो कि एक मुसलमान ने खरीदा था | उसके बाद जो 500 गज का प्लॉट बिका था 40,000/- वर्ग गज के भाव से 2 करोड़ में और उसके बाद भाव नीचे ही गए हैं | पर ये सब तो मंदी के कारण भी तो हो सकता है | लेकिन मौलवी साहब इतने विश्वास से लबरेज थे कि अगर मैं मकान नहीं बेचता हूँ तो वो कब्ज़ा ही कर लेंगे | उफ्फ | ये सब चीजें मेरे साथ ही क्यों होती हैं |पता ही नहीं अब मैं क्या करूंगा | इतने में एक ग्राहक आता दिखाई दिया और मैं तैयार हो गया कुछ बेचने के लिए||

तो मित्रों, ये था मेरे एक साथी के साथ हुई एक घटना जिसके बाद मैं भी सोचने लगा कि क्या इस्लाम के पंथ में उम्माह का बड़ा होना ही एकमात्र लक्ष्य है और अगर है तो फिर सनातन धर्म के अनुयायी क्यूँ वसुधैव कुटुम्बकम का ढोल बजाते फिरते हैं जबकि एक पंथ साथ आने को तैयार ही नहीं है||ख़ैर, आज काफी समय लिया है आपका इसलिए आपको नमस्कार करते हुए आप से विदा लेता हूँ और फिर मिलने के वादे के साथ अपको अपनी कलम को विश्राम देता हूं | प्रणाम |

वृत्तांत 5 - जीवन चक्र

आप सभी बन्धु जनों को मेरा हार्दिक प्रणाम | आज बड़े दिनों बाद आपके सामने प्रस्तुत हूँ एक बिल्कुल अलग वृत्तांत लेकर जिसे मेरे एक सैनेट्री एवं प्लंबिग का काम करने वाले मित्र ने सुनाई जो कि अक्षरक्षः निम्नलिखित है :-
मैं वही अदना सा प्लम्बिंग एवं सैनेट्री का एक छोटा व्यापारी जो छोटा मोटा कुछ बेच कर अपना तथा अपने परिवार का पेट पाल रहा है | अन्य दिनों की तरह कल भी मैं समय पर अपनी दुकान मंगल कर रहा था के तभी मेरे पास स्थित एक हार्डवेयर वाले दुकानदार की पत्नी एक अन्य व्यक्ति के साथ मोटरसाइकिल पर सवार होकर कहीं जाती दिखी | मैंने सोचा कि "होगा कोई जानकार, अपने को क्या मतलब|" यह सोच कर मैं दुकान मंगल करके अपने घर को चल दिया |
घर पहुँच कर मैं हाथ - मुंह धोकर खाने की मेज पर बैठ गया | मेरी पत्नी के साथ मैं खाना खाने लगा | अयन अपने कमरे में परीक्षा की तैयारी कर रहा था क्योंकि विद्यालय आदि तो अभी भी बंद थे सो घर पर बैठ कर ही परीक्षा की तैयारी करनी पड़ रही है| खाना खाते समय भी मेरे मन में प्रतीक जी की पत्नी के किसी अन्य व्यक्ति के साथ देख कर अजीब सी उलझन हो रही थी | सो, मैंने अपनी पत्नी से सारी बात कह दी जिसे सुनकर मेरी पत्नी हंसने लगी |
मेरा अचरज भरा भाव देख कर वो खुद ही बोल पड़ी "आप तो ध्यान ही मत दिया किजिये | जो टेम्पो वाला आपके लिए माल ले कर जाता है, कुछ दिन पहले तो ये उसी टेम्पो वाले के साथ कहीं जा रही थी जब मैं तरकारी खरीदने गयी हुई थी दोपहर में| प्रतीक जी के यहां बहू ही ग़लत आ गयी है | पिछले दस वर्षों में ना जाने कितने लोगों के साथ घूमने के लिए निकल चुकी है और ना जाने कितने ही घर आ चुके हैं | आपको ध्यान है जब एक बार महेश जी का अपनी बीवी से झगड़ा हो गया था तो उनकी बीवी इसी के घर के बाहर जाकर चिल्ला कर आई थी |"
मैं हतप्रभ हो कर सब सुनता रहा | मैंने पूछा कि "महेश जी की अपनी बीवी से लड़ाई क्यूँ हुई थी? ऐसा क्या हो गया था कि वो प्रतीक जी की बीवी पर चिल्लाने चली गई थी? " तब मेरी पत्नी बोली " प्रतीक जी को आप जितना सीधा समझते हो वो अंदर से उतने ही टेढ़े हैं | दरअसल, प्रतीक जी की पत्नी ने महेश जी को अपने जाल में फंसा लिया था और उनके साथ गुलछर्रे उड़ाने लगी थी | प्रतीक जी को विरोध ना करने के एवज में महेश जी की तरफ से मदद के नाम पर पैसे मिल जाते थे और महेश जी अपने जान पहचान के लोगों को उनकी हार्डवेयर की दुकान से माल खरीदने के लिए प्रेरित करते थे | फिर एक दिन महेश जी की पत्नी ने बाज़ार में महेश जी को प्रतीक जी की पत्नी के साथ होटल में जाते देख लिया| बस फिर क्या था, घर पहुँचते ही महेश जी की बीवी सीधे प्रतीक जी के घर पहुंची और चिल्लाने लगी | बड़ा बवाल हुआ था उस दिन तो और ये सारी बात मुझे रंजीता ने बतायी जो उनके पड़ोस में ही रहती है | और आगे क्या बताऊँ आप तो सु कर न पागल ही हो जाओगे |"
मैं सचमुच पागल सा सब सुने जा रहा था | कितना कुछ होता रहा मेरे आसपास और मुझे खबर ही नहीं | मैंने कहा " अब पागल करने जैसा बाकी ही क्या है और |" तब मेरी पत्नी बोली " अब जो मैं बताने जा रही हूँ वो पागल करने जैसा ही है |" मैं ठूंठ बन कर विस्फोट का इंतजार करने लगा | मेरी बीवी बोली " ये लोग पति पत्नी की अदला बदली भी खेलते हैं और प्रतीक जी तो कभी कभी माल के पेमेंट के बदले अपनी बीवी ही पकड़ा आते हैं |"
मेरे कान से रक्त बहना चालू हो चुका था | मेरे नीचे की धरती नहीं दिख रही थी | आंखो के आगे सभी चेहरे तेज़ी से घूमने लगे जैसे कि किसी ने जीवन चक्र को एक बार के लिए रोक दिया हो और दिमाग़ को एकदम सन्न कर दिया हो | आगे और सुनने की क्षमता खत्म हो गई थी | मैं खाना पूरा करने के बाद बाहर आकर कुर्सी पर बैठ गया और जीवन दर्शन पर विचार करने लगा | कैसे एक बच्चा पैदा होकर बोलना सीखता है, चलना सीखता है, स्कूल जाता है, मित्र बनाता है, सामाजिक और व्यवहारिक ज्ञान अर्जित करता है, काम पर लगता है और फिर पैसों की जरूरत को पैसों की कमी बना कर गलती पर ग़लती करने लगता है, अपने बीवी बच्चों के लिए पैसा इकट्ठा कर के दुनिया से विदा ले लेता है और उसके आश्रित उसके पैसों पर मौज उड़ाते हैं | क्या यही जीवन का मर्म है |यही सोचते सोचते मैं कब गहन निद्रा में चला गया, मालूम ही नहीं चला |
तो मित्रों, ये था मेरे साथी द्वारा सुनाया गया एक वृत्तांत जो सच में बहुत गहराई से विचार करने के लिए बाध्य करता है | अभी आप को नमन करते हुए विदा लेता हूँ और फिर आपके समक्ष नए वृत्तांत के साथ प्रस्तुत होने का वादा करता हूं | नमस्कार |