नमस्कारl साथियों, आज फिर प्रस्तुत हूँ आपके सामने एक वृत्तांत लेकर जो मेरे मित्र ने सुनाया और अब मै आपको सुना रहा हूँ| निम्नलिखित है वृत्तांत:-
मैं वही प्लंबिंग एवं सैनट्री एक छोटा सा दुकानदार जो महामारी की दूसरी लहर के कारण सरकारी आदेश की पालना करते हुए घर पर बैठा है और पुरानी कमाई से घर खर्च चला रहा है| अब तो समय व्यतीत ही नहीं होता है| पत्नी और बच्चे से कितनी और क्या बात करें|पत्नी की बातें घरेलू मुद्दों पर केंद्रित रहती हैं जिसमें मुख्यतः रसोई, गद्दे के कवर, पर्दे, गहनों की पॉलिश, बच्चे की शिक्षा, नकद की गिनती, फोटो एल्बम, जेठानी और ननद के किस्से, पड़ोसी के घर की अंदरूनी जानकारी एवं अपने पीहर वालों की बढ़ाई शामिल है| इसी तरह 7 साल का बच्चा भी अपने ही अलग आयाम में घूमता रहता है जिसमें खेलकूद, कार्टून इत्यादि मुख्य है| मैं काम-धंधे और राजनीतिक बातों में अधिक रुचि रखता हूं इसीलिए दूरभाष पर अपने मित्रों से समसामयिक मुद्दों पर मंथन करता रहता हूँ| इसी तरह आज मेरे एक बहुत पुराने मित्र से मेरी वीडियो वार्ता हुई जो मैं आपको बताने जा रहा हूँ|
मेरा मित्र आशीष पाली जिले में पला बढ़ा और जयपुर में कॉलेज की पढ़ाई करके दिल्ली नौकरी के लिए चला गया|शुरू से ही वह एक संस्था से जुड़ा हुआ था जिसके सामाजिक कार्यो में वह बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेता था और आज भी लेता है| हमारी वार्ता के मध्य में संस्था का स्मरण हुआ तो बात चली| मेरे मित्र ने कहा "यार, तू इतना समझदार होकर भी हमारी संस्था से क्यों दूर है? तेरा आधार नंबर दे, अभी जोड़ देता हूँ|" मैंने कहा " रहने दे भाई|मेरे पास काम धंधे से कहाँ फुर्सत है जो तेरी संस्था को समय दे पाऊँगा|" मित्र ने कहा "क्या बे, तू फ़िर से घुमा फिरा कर टाल रहा है मुझे|सच सच बता, तू आना क्यों नहीं चाहता हमारी संस्था के साथ? " मैंने कहा "देख भाई, सच तो ये है की तुम्हारी संस्था का सामाजिक सरोकार से कोई लेना देना नहीं है|तुम भले ही समाज सुधार का चोगा पहने हुए हो लेकिन तुम कभी भी सुधार की तरफ नहीं बढ़ पाये|" मित्र ने पूछा "वो कैसे? हम तो हमेशा राष्ट्र और समाज के उत्थान में तत्पर रहे हैं|" मैंने कहा "चल इतिहास से चालू करते हैं|तुम्हारी संस्था बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में बनी लेकिन स्वतंत्रता संग्राम के किसी भी आंदोलन में तुम्हारी संस्था ने भाग नहीं लिया बल्कि अपने कार्यकर्ताऔं को मना भी किया भाग लेने से|भले ही पूरा देश ग़ुलामी की ज़न्जीरों से मुक्ति के लिए असहयोग आंदोलन कर रहा हो, नमक बनाकर विदेशी ताकत को ललकार रहा हो, 'भारत छोड़ो आंदोलन' कर रहा हो, भारत के संविधान पर मंथन कर रहा हो लेकिन तुम्हारी संस्था हमेशा अंग्रेज़ों के साथ खड़ी होकर गद्धारी का झंडा फहराती रही|" मित्र ने कहा "यार तू बहुत भोला है| जो कुछ भी तूने कहा है वो सब ग़लत है| दरअसल, जिन आंदोलनों की तू बात कर रहा है वो तो कांग्रेस के आंदोलन थे जो की उस बुड्ढे गांधी और उस मुसलमान नेहरू की सोची समझी साज़िश का हिस्सा थे|ये तो सब जानते हैं की गांधी और नेहरू लड़कीबाज थे और मुसलमानों को अत्यधिक प्रेम करते थे|" मैंने कहा "यही तो समस्या है तुम्हारी संस्था की| इतना झूठ बोलते हो की सच लगने लगता है| ना तो गांधी लड़कीबाज थे और ना ही नेहरू मुस्लिम|गांधी ने जो प्रयोग किये थे वो खुद सबके सामने खुली किताब की तरह रखे हैं जिसमें वो बताते हैं की कैसे उन्होंने ब्रहम्चर्य को परखा और जाना|जहाँ तक रही नेहरू की, तो मैं ये बता दूँ की किसी महिला से ठिठोली करते हुए फोटो से ये बात नहीं कही जा सकती की वो लड़कीबाज है और मैं ये फोटो वाली बात इसलिए कह रहा हूँ कि तुम्हारी संस्था के पास नेहरू के खिलाफ़ फ़ोटो के अलावा और कुछ भी नहीं है लड़कीबाज वाले लेबल के लिए|अब बात कर लेते हैं नेहरू के मुसलमान होने की तो मैं ये बता दूँ की तुम्हारी संस्था के पास एक भी ऐसा सबूत नहीं है जिससे यह पता चल सके की नेहरू मुसलमान थे|चलो मैं ये बात एक बार मान भी लूँ की गांधी लड़कीबाज थे और नेहरू मुसलमान थे तो भी तुम्हारी संस्था अपना अलग आंदोलन कर सकती थी जैसे सुभाष चंद्र बोस ने कर रखा था,लेकिन सच तो ये है कि तुम्हारी संस्था के लोगों ने अंग्रेज़ों से करार कर रखा था की तुम भारत के किसी भी स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में भाग नहीं लोगे|गद्दारी करके खुद को राष्ट्रवादी कैसे कह सकते हो? तुम्हारी संस्था का एक भी व्यक्ति आज़ादी की लड़ाई में ना तो जेल गया ना ही शहीद हुआ|ऊपर से,खुद को मुसलमान विरोधी बोलते हो और खुद ही अपने उस परममित्र संगठन का समर्थन करते हो जिसने सिंध प्रांत में 1939 मेंमें सरकार बना ली थी मुस्लिम लीग के समर्थन से जिसका भी कोई नहीं गया जेल और ना शहीद हुआ|सच तो ये है कि तुम्हारी संस्था और मुस्लिम लीग एक ही जैसे लोगों से भरी हुई थी,बस पंथ अलग थे|जो नफ़रत वो मदरसों में सिखाते थे,तुम लाठी पकड़ाकर गली कूचों में सिखाते थे|और एक बात, तुम्हारी संस्था के
परममित्र संगठन के अध्यक्ष साहब अंग्रेज़ों से चार बार माफीनामा लिख कर जेल से छूटे थे और बाहर आकर साठ रुपये महीने की पगार पर अंग्रेज़ों के लिए मुखबिरी करते थे|अब और क्या बोलूँ, तुम्हारी संस्था तो तिरंगे को भी आत्मसात नहीं कर पाई तो फिर इस देश की आत्मा को समझना तो बहुत दूर की बात है|"
मेरे मित्र ने कहा "यार तू भी मुसलमान बन गया है क्या जो उन लोगों की तरह बात कर रहा है? या फिर किसी इस्लाम परस्त गुट ने तुझे बरगला दिया है? देशभक्त बनो ना कि गद्दार| जब ये लोग तुझे मारने आयेंगे तब हम ही बचाने आयेंगे| ये लोग किसी के सगे नहीं हैं|" मैंने कहा "यार, तू तो बिल्कुल रेडियो की तरह बोल रहा है|मैंने जो इतना सब कुछ बोला तेरी संस्था की गद्दारी के लिए, उसको तो तूने हवा में उड़ा दिया और ले-दे कर मुसलमानों पर आ गया| मेरी मुसलमानों से कोई यारी वगैरह नहीं है और इस्लाम को मैं एक विध्वंसक पंथ मानता हूँ जिसने तबाही के सिवाय कुछ नहीं किया लेकिन इसका मतलब ये बिल्कुल भी नहीं है कि मैं तुम्हारी संस्था के झूठ और मक्कारी भरे कामों को सही ठहरा दूँ|तुम लोग दरअसल सनातन धर्म को समझ ही नहीं पाए और हिंदू राष्ट्रावाद का राग अलापने लगे|जैसे मदरसे इस्लामी राष्ट्रावाद पढ़ाते हैं जिसमें वो बच्चों को भारत को एक इस्लामी राष्ट्र में तब्दील करने के लिए उकसाते हैं वैसे ही तुम्हारी संस्था हिंदू राष्ट्रावाद पढ़ाती है जिसमें भारत को हिंदू राष्ट्र में परिवर्तित करने की बात करते हो|"
मेरे मित्र ने कहा" यार, जब तू खुद इस्लाम को विध्वंसक मानता है तो फिर दिक्कत कहाँ है भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने में?" मैंने कहा " देख भाई, तुम लोगों ने सनातन धर्म को एक साँचे में ढालने की कोशीश की है जो कि बिल्कुल ग़लत है|सनातन धर्म कई शताब्दियों से बदलता रहा है और हर बदलाव को आत्मसात् करता आया है|हमने खुद को किसी भी ग्रंथ में बांध कर नहीं रखा और खुले विचारों से दर्शन करते रहे फिर चाहे वो महावीर के विचार हों, बुद्ध के हों या गुरु नानक के|कोई भगवान को मानता है तो कोई नहीं मानता|कोई, शिव को मानता तो कोई विष्णु को तो कोई उनके अवतारों को लेकिन कभी भी किसी को जबरदस्ती नहीं मनवाया|सनातन धर्म का मतलब ही अनादि -अनन्त है और आप लोग इसका आदि- अंत अपने मतलब के अनुसार परिभाषित करते हो|हिंदू एक भौगोलिक स्थिति पर आधारित नाम है जो पूरे सनातन धर्म के लिए अपूर्ण है|आपके हिंदुत्व की परिभाषा मुसलमानों के आक्रमण से शुरू होती है और उनके पतन के साथ समाप्त हो जाती है| मैं इस्लामी चश्मे से सनातन धर्म को नहीं देखता इसीलिए मैं आपकी संस्था से नहीं जुड़ता|तुम्हारी संस्था वर्ण-व्यवस्था की हितैषी है इसलिए सामाजिक स्थिरता कभी नहीं हो पायेगी| तुम्हारी संस्था वापस दो हज़ार साल पीछे चले जाना चाहती है जब स्कूल नहीं आश्रम होते थे, जब मोटर वाहन नहीं बल्कि बैलगाड़ी होती थी, जब लोकतंत्र नहीं बल्कि राजशाही होती थी और जब औरतें घर और खेतों तक ही सीमित थी|"
मेरे मित्र ने कहा"भाई, तू नक्सली हो गया है और इसीलिए देशद्रोह करने पर आमादा है| अभी भी समय रहते आजा हमारे साथ|" मैंने कहा "तुम्हारी संस्था को बुनियादी सोच बदलनी होगी अगर मुझे अपने साथ जोड़ना है तो वरना जो है सो है|" मित्र ने कहा "भाई, खतना मुबारक हो| जय हिंद,जय भारत|" इतना कह कर हमारी वीडियो वार्ता समाप्त हुई और मैं दोपहर के खाने के लिए रसोई की तरफ़ बढ़ चला|
तो मित्रों, ये था मेरे एक मित्र द्वारा किया गया एक वर्णन उनके जीवन के दैनिक वृत्तांत में से एक|मैं फिर मिलूँगा आपसे एक नये वर्णन के साथ| प्रणाम|
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