मैं वही एक अदना सा व्यापारी जो समय समय पर अपने आस पास होने वाली घटनाओं को आपसे साझा कर लेता हूँ| पिछले कुछ महीनों से मेरा काम बहुत कम हो गया था| बिक्री दस प्रतिशत ही रह गयी थी जबकि तीन दुकान आगे कालूराम की दुकान बड़ी अच्छी चल रही थी जो कि मुझसे समान खरीदकर ग्राहकों को महंगा बेचा करता था| मेरे पास तो माल ना बिके जबकि वो ही माल दूसरा दूकान्दार बेच रहा है ज़्यादा क़ीमत लेकर| ये गड़बड़ समझ नहीं आती|कहीं किसी ने टोटका तो नहीं कर दिया मेरी दुकान पर? शायद इस कालूराम ने ही मेरी दुकान बांध दी है वरना चलता हुआ धंधा कैसे रुक गया मेरा? इतने में मेरे साडू साहब दुकान पधारे और मुझे परेशान देख कर पूछ बैठे "क्या हुआ कंवर साहब, इतने उलझन में क्यों दिखाई दे रहे हो? सब ठीक तो है ना?" मैंने उनकी बात जवाब देते हुए कहा " क्या बताऊँ बड़े कंवर साहब, धंधा तो पाताल लोक चला गया है मेरा| मेरे यहाँ ग्राहकों का अकाल पड़ रहा है और वहाँ तीन दुकान आगे वो कालूराम चाँदी काट रहा है| मेरी दुकान को नज़र लग गयी है|" बड़े कंवर साहब कुछ सोच में पड़ गए और बोले "कँवर साहब मेरे पास अचूक रामबाण है लेकिन आप किसी को नहीं बोलेंगे ये बात|" मैंने तुरंत हामी भर दी| दुकान पर काम के लिए रखे लड़के को डमरुलाल का समोसा और चाय लेने भेज दियादिया और ध्यान से बड़े कंवर साहब की बात सुनने लगा|
बड़े कंवर साहब ने पूछा " कौनसे मंदिर जाते हो? " मैंने बता दिया| बड़े कँवर साहब हंस दिये और बोले " अब उस मंदिर के महंत में दम नहीं रहा| उनके पिताजी यानी बड़े महंत साहब तो जिस दिन विदा हुए दुनिया से उसी दिन से मंदिर कमज़ोर हो गया| बड़े महंत जी ने चढ़ावे का सारा पैसा ब्याज पर चला रखा था झर्जहोला वाले परिवार के द्वारा जिसकी कोई लिखा पढ़ी नहीं हो रखी थी| बड़े महंत विदा हुए और सारा पैसा हजम| अब नये महंत साहब को नये सिरे से सब करना पड़ रहा है जिसके कारण अब जान-पहचान के प्रभावशाली लोगों का ध्यान दूसरे शक्तिशाली महंत के मंदिर में लगने लगा है ताकि उनके अटके काम निकल सकें जिसे बदले में वो बड़ा चढ़ावा चढ़ा आते हैं| महंत शक्तिशाली होंगे तो चमत्कार भी बड़े होंगे और सबका काम निकलने लगेगा| आप चौराहे से तीन गली आगे कोने वाले मंदिर में जाया करें अब|वहाँ सारी इच्छायें पूरी होती हैं|आप जब वहाँ जाएँ तो केवल दर्शन या परिक्रमा ही ना करें बल्कि पुजारी एवं उनके शिष्यों से भी जानकारी बढ़ाना शुरू करें| उनसे चलाकर कहें कि आपका काम नहीं चल रहा है, बड़ा दुखी हूँ महाराज, क्या करूँ? वो आपको बाद में आने को कहेंगे| आप बाद में जाना और दीन हीन स्थिति में उनको अपनी बात कहना और सबको महाराज कह कर ही संबोधित करना है| वो आपको कुछ खास तरह का उपाय बतायेंगे जैसे की किसी देवता की फोटो अपनी दुकान में लगाने के लिए या फ़िर कोई खास तरह की अंगूठी पहनने के लिए| वो जो भी बोले आप कर लेना| एक बात का और ध्यान रखना, अगर मुख्य पुजारी आपसे बात कर रहे हैं तो पैसा दान पेटी में डालना क्योंकि वो सीधे पैसा लेना अपमान समझेंगे लेकिन अगर कोई शिष्य हो तो 2100/- रुपये बिना देर किये दक्षिणा पकड़ देना| अब आप एक समय बांध लेना और उसी समय मंदिर जाना ताकि आप उनकी नज़र में रहो| ऐसा आप एक महीने तक करना फ़िर मुझे बताना|"
मैंने बड़े अचरज के साथ उनकी पूरी बात सुनी और बिना हिचक के हामी भर दी| इतने में दुकान का लड़का समोसा और चाय ले आया और हमने इधर उधर की बातें करके खाने पीने का लुत्फ़ उठाया| एक घंटे बाद साडू साहब विदा हुए और मैं ग्राहकों का इंतज़ार करने लगा और साथ ही सोचने लगा कि मेरे साडू साहब अपना मानसिक संतुलन खो चुके हैं जो ऐसी बहकी हुई सलाह दे गए| मंदिर तो हमारी मानसिक संतुष्टि और चित्त को शांत करने के लिए होते हैं|मेरा काम तो पहले भी बिना किसी महंत या पुजारी के चलता ही था| मंदिरो की पवित्रता को ब्याज बट्टे से जोड़ना अक्षम्य अपराध है और मैं अपने साडू साहब की उजड़ी बुद्धि के ठीक हो जाने के लिए इन्ही के सुझाए मंदिर में इनके नाम का प्रसाद बोल कर आऊंगा|
इतना सब सोचते हुए कब सांझ ढल गयी मालूम ही नहीं चला| गोधूलि बेला के बाद रात्रि आहट पर मैं दुकान मंगल कर बिना बोहनी किये घर रवाना हो गया|
वृत्तांत जारी है...........
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