प्रथम भाग से आगे........
घर जाते समय मेरा ध्यान अकस्मात् ही उस मंदिर की तरफ चला गया जिसके बारे में साडू साहब ने बताया था| लाल बत्ती पर दो मिनट रुकना था तो मैं स्कूटर पर बैठे-बैठे ही अंदर झांकने लगा|मुख्य पट बंद थे और काफी लोग पट खुलने के इंतज़ार में खड़े थे|खड़े हुए लोगों की पीठ मेरी तरफ थी इसलिए किसी का चेहरा नहीं देख सकता था|तभी अचानक से मेरा ध्यान मंदिर के पास वाली अंधेरी संकरी गली की तरफ़ गया जिसमें से मौलवी साहब निकल कर मंदिर के विपरीत दिशा की ओर बढ़ गए और बीस सेकेंड में आँखों से ओझल हो गए| ये वो ही मौलवी साहब थे जो मेरे मकान का सौदा लेकर मेरी दुकान पधारे थे| इतने में बत्ती हरी हो गयी और मैं निकल पड़ा अपने घर एक नई उधेड़बुन के साथ|
अगले दिन सुबह डेयरी पर दूध ख़रीदते समय मुझे मस्जिद की सफाई करने वाला मिला|वो भी दूध खरीदने आया था|डेयरी वाले ने मज़ाक में कहा "मियाँ, आज दूधवाला नहीं पहुँचा मस्जिद में जो हमारी डेयरी पर आये हो? अगर गाय का मांस चाहिए हो कहीं और जाना पड़ेगा|" सफ़ाईवाला हंस दिया और दूध खरीद कर चल पड़ा|मैं भी उसके पीछे चल दिया और थोड़ा आगे जाकर गली की घूम पर उसको आवाज़ देकर रोक लिया|मैंने कहा" यार जुम्मन, एक बात तो बता|कल तेरे मौलवी को मंदिर के पीछे वाली गली से निकलते देखा था लेकिन समझ नहीं आया कि वो वहाँ गए क्यों थे?" जुम्मन बोला " मौलवी साहब का तो आना जाना है वहाँ काफी|ज़मीन जायदाद के मामले रहते हैं जो ये आपस में सुलझाते हैं|आप और हम तो गाय-गोबर ही करते रह गए और ये अल्लाह को ठेके पर बेच आये|" मैंने कहा " क्या बे बावली टांट|कुछ भी बके जा रहा है| तुझे तो रोकना ही ग़लत हो गया|सारा दिन ख़राब जायेगा अब|" मेरी झाड़ खा कर सफ़ाईवाला अपने रास्ते निकल गया और मैं अपने रास्ते चला गया|
दिन भर मेरा बकवास निकला और दो हज़ार का काम करके वापस सांय को अपने घर चल दिया|आज पूरा ध्यान मंदिर पर था और बत्ती लाल हुए बिना भी स्कूटर किनारे लगा कर मंदिर में ताका झांकी करने लगा| आरती का समय था तो सब ध्यान में लीन थे|तभी मेरा ध्यान लाल बुशट के आदमी पर पड़ी जो कि जाना माना हिस्ट्रिशीटर था और अटकी ज़मीनो की सौदेबाज़ी करवाता था|मैं अपना स्कूटर और थैला वहीं छोड़ मंदिर के अंदर चल पड़ा| मेरा पूरा ध्यान हिस्ट्रिशीटर पर था|वह माथे पर तिलक लगा कर परिक्रमा के लिए पीछे गया और दस मिनट बाद बाहर आया|मुझे कुछ समझ नही आया और मैं भी परिक्रमा के लिए अंदर गया और दस सेकंड में बाहर आ गया| कुछ समझ नहीं आया|अब तक मंदिर के पट बंद होने का समय हो गया था और इक्का दुक्का लोग ही प्रांगण में रह गए थे| मेरा मन नहीं मान रहा था जाने के लिए लेकिन जाना तो था|मैंने फिर परिक्रमा के लिए कदम बढ़ाये और पीछे मत्था टेक कर आगे बढ़ने लगा| तभी ताला लगे कमरे से आवाज़ सुनाई दी तो मैं ठिठका और गौर से सुनने की कोशिश करने लगा| अंदर से एक भारी आवाज़ आ रही थी " देखो, तुम चाहे कुछ भी कहो लेकिन इस ज़मीन का 1 करोड़ से ज़्यादा नहीं होता है|कितनी मेहनत की है हमने ये हमें पता है| आप तो जिंदगी भर खाली नहीं करवा सकते थे| एक बीघा भले ही है लेकिन दस करोड़ का माल कहीं से नहीं है|" एक रूआँसि आवाज़ उठी और बोली " महाराज|आपने तो जबरदस्ती वहाँ पत्थर की मूर्ति रखवा दी और दीया बत्ती करवाने लगे| हमारी बात तो केवल ज़मीन मुक्त करवाने की थी लेकिन अब आप उसको खरीदने को आतुर हो रहे हैं|ये तो अन्याय हो रहा है| मुझे उस ज़मीन के दस करोड़ मिल रहे हैं और अगर आप खरीदना चाहते हैं तो मुझे इतने दिलवा दीजिये|" भारी आवाज़ ने कहा " सुन सेठ| अब वहाँ ठाकुर जी की पूजा होगी और तू दुनिया की किसी भी कचहरी में चला जा, ये ज़मीन ठाकुर जी की ही रहेगी|एक करोड़ तेरे हैं कभी भी ले जाना लेकिन धर्म के आड़े कभी मत आना| तेरा हर काम निकाला है ठाकुर जी ने और आगे भी निकालते रहेंगे| तेरे माल की गाड़ी कभी अटकी? तेरे पास ख़रीदार की कभी कमी हुयी? एक धरती के टुकड़े के लिए मत रो|अलीपुरा में एक मौके का सौदा आया है|उसका मालिक कोई छोटा सा टाइलवाला है जिसमें अधिक पुदीना नहीं है|वो मकान नहीं बेच रहा है मौलवी को तो तू दिलवा दे|मौलवी डेढ़ करोड़ देगा| बाकी तू समझदार है|"
इतना सुनकर मेरी रूह काँप उठी|मैं भागा और स्कूटर उठा कर रवाना हुआ| ये लोग मेरे ही पुराने वाले मकान की बात कर रहे हैं जिसका सौदा वो मौलवी लेकर आया था|तो क्या ये मौलवी..... मंदिर...... हिस्ट्रीशिटर... सब मिले हुए हैं? ये सब क्या हो रहा है? मैंने स्कूटर की गति बढ़ा दी|
आगे जारी है।.........
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