पान वाले के पास से स्कूटर उठा कर मैं घर की तरफ़ चल दिया लेकिन घर जाने की इच्छा नहीं थी| मैंने स्कूटर नाहरगढ़ रोड़ की तरफ़ मोड दिया जहाँ मेरा एक दोस्त रहता था| रोड के अंतिम छोर से पहले मंदिर की दीवार के पास स्कूटर लगा कर पहाड़ी के दुर्गम रास्ते के दाँयी तरफ़ बनी एक झोपड़ी की तरफ़ चल दिया| वहाँ दुनिया भर का कचरा पड़ा था और शूकर मुँह मार रहे थे| तीन बकरियाँ भी अपनी किस्मत आज़मा रही थी के खाने को कुछ मिल जाए|मैं छोटे बड़े पत्थर सब लाँघ कर झोपड़ी की तरफ़ पहुंचा|बाहर पड़ी बाल्टी से चुल्लु भर कर हाथ धोया और अंदर गया| वहाँ मेरा कॉलेज का दोस्त रहता है जो कि उत्तर प्रदेश से पढाई करने जयपुर आया था 15 साल पहले और किस्मत ने आज उसे इस झोपड़ी में ला पटका| खैर, इस विषय पर बाद में चर्चा करेंगे पहले मेरे दोस्त से मिल तो लूँ|
चार दियोँ की रोशनी से टिमतिमा रही फूस की झोपड़ी के अंदर जाने पर मैंने देखा कि ज़मीन पर मेरा दोस्त पत्थर की सिल्ली का सहारा लेकर बैठा था और पास में उसका बेटा चुन्नु सो रहा था| मैंने कहा "पंडित, क्या हाल हैं?" दोस्त झुंझलाकर बोला "अबे ओ सूदखोर बनिये, मरवायेगा क्या? किसी ने सुन लिया तो पकड़ा जाऊंगा| तू रफीक़ बोला कर मुझे| सबको यही नाम बता रखा है|" मैं हँस दिया| पंडित भी नरम पड़ मुस्कुराने लगा| मैंने कहा " यार आज बिल्कुल भी मन नहीं था घर जाने का तो तेरे पास चला आया|आज खाने का इंतज़ाम हुआ या फ़िर फाका कर रहा है?" दोस्त बोला "चुन्नु को खिलाने लायक रोटी तो मिल गयी थी और उस खानदानी तवायफ् ने अचार दे दिया था तो चुन्नु ने खा लिया|" मैंने कहा "और तूने कुछ नहीं खाया? " दोस्त बोला "कल इधर कुछ लड़के पार्टी करके गए थे तो उनके फेंके हुए मांस के टुकड़े और ब्रेड से काम चल गया|कल की कल देखी जायेगी|" मैं बोला "तू कब तक ऐसे जियेगा? दो साल से यहाँ छुपा हुआ है, भाभी भूख सहन नहीं कर पाने के कारण परलोक सिधार चुकी है, चुन्नु कमज़ोर होता जा रहा है, तू पंडित होकर मांस के टुकड़ों पर जी रहा है लेकिन कब तक? " दोस्त रुआंसा होकर बोला "यार, सब मेरी गलतियों से हो रहा है|भूख इतनी बड़ी चीज़ हो जायेगी कभी सोचा ना था| जब भी कुछ खाने को लाता था तो ललिता चुन्नु और मुझे खिला देती थी| बचा हुआ खाना बाद में खाने को कह कर बचा लेती थी और शाम को फ़िर चुन्नु को खिला देती थी लेकिन खुद भूखी रहती थी और मुझे कहती कि खा लिया| मेरे जीते जी मेरी पत्नी भूख से मर गयी और मैं सर पीटता रह गया|किसकी हाय लगी है मुझे|"
इस गमगीन माहौल मैं अपने आप को सम्हालते हुए बोला "जो हुआ वो किसी के साथ भी ना हो पर अब तू कर भी क्या सकता है क्योंकि जो होना था सो हो गया| अब तू चुन्नु की सोच|सबसे पहले तो ये ख्याल छोड़ दे कि तेरे गाँव से अब कोई तुझे पकड़ने आयेगा यहाँ क्योंकि कोई नहीं जानता कि तू यहाँ है| तूने जिनको जान से मार डाला था उनके घरवाले अब तक थोड़े ही याद रखे होंगे तुझे और वैसे भी तू अपने किये की सज़ा भुगत चुका है इसलिए पुरानी बातें भूल कर नयी शुरुआत कर| मैं कल तुझे और चुन्नु को यहाँ से ले जाऊंगा, तुझे काम दिलवाउंगा और चुन्नु को स्कूल में दाखिला करवाउंगा| और अब कोई ना नुकुर नहीं चलेगी क्योंकि मैं फैसला कर चुका हूँ|" दोस्त चुपचाप सुन रहा था लेकिन कुछ बोला नहीं|मैंने उसके भाव पढ़ लिए थे कि वो मना करने का बहाना ढूंढ रहा था लेकिन मेरी ज़िद के आगे वो चुप हो चुका था| मैंने कहा " चाँददारा- पानदारा (साथ में लघु शंका जाने के लिए न्यौता देने का देसी कोड) "| दोस्त बोला" तू ही हो आ यार, मैं यादों की सवारी पर सवार हूँ| शायद कल यहाँ नहीं रहूँगा|" मैं उसका इशारा समझ गया था औरऔर खुशी से उसको कल दोपहर आने की कह कर अलविदा करके बाहर आ गया| अब मुझे लघुशंका के लिए साफ जगह चाहिए थी जो थोड़ी और उपर जाकर दिखती सो मैं पहाड़ी के उपर चल पड़ा|
आज का मूड ही सुपर चल रहा है| रात के 12 बज चुके हैं लेकिन घर से अब तक कोई फोन नहीं आया| मेरी तो किसी को चिंता ही नहीं है और हो भी क्यों, मेरे मरने पर बीमा का सारा पैसा जो मिलेगा|खैर, मैं ही फ़ोन करके बोल दूँ| मैंने अपना फोन निकाला तो 45 मिस्ड कॉल थे घर से| हरे राम| मैंने तुरंत फोन मिलाया और पत्नी के द्वारा फोन उठाते ही भजन- कीर्तन की जो मांगलिक बेला का आरंभ हुआ वह 10 मिनट तक चला और जल्दी से जल्दी घर पहुँचने के आंशिक मिथ्या वचन के साथ सुखद परिणाति को प्राप्त हुआ|
फोन रख कर मैं जल्द से जल्द घर के लिए रवाना होना चाहता था इसलिए मैंने तुरंत लघुशंका बाधा निवारण के लिए जगह ढूंढी और एक चट्टान पर विसर्जन कर उसे आधी रात को धन्य किया| रात बहुत मनमोहक थी| ग्यारस का चाँद और हल्की सी ठंडी हवा का झोंका जो बिरले ही कभी महसूस करते हों| टिमतिमाते तारे और मखमली आसमान में सफ़ेद लकीर का वो रॉकेट का धुंआ| अनंत आकाश को भेदने वाली वो उल्लू की आवाज़ें और पक्षियों की उबासियां| क्या प्राकृतिक नज़ारा छोड़ कंक्रीट के जंगलो में हमने अपने घोंसले बना लिए| प्रकृति के नयनाभिराम दृश्यों का रसास्वादन करते समय ही अचानक मेरी नज़र दूर एक महल की तरफ़ से कुछ जनानाओं के खिलखिलने की आवाज़ की तरफ़ गयी| मैं ना चाहते हुए भी उस तरफ़ देखने लगा जिस तरफ़ वे महिलाएँ जा रही थी| वे दूसरे रास्ते से नीचे उतर रही थी तो मैं भी झाड़ियों की ओट के सहारे उनके पीछे हो लिया क्योंकि जीवन की उथल पुथल से अलग हर चीज़ मुझे आकर्षित कर रही थी|
उन महिलाओं के वस्त्र पारंपरिक लग रहे थे जो कि महलों में पहना करते थे|रंग तो साफ़ नहीं दिख रहा था लेकिन छोटे छोटे काँच चमक रहे थे उनके घाघरे और चोली के|वे सब नीचे तालाब के रास्ते शहर की तरफ़ जा रही थीं| मेरा स्कूटर तो दूसरी ओर वाले रास्ते पर खड़ा था और अगर मैं जनानियों के पीछे जाता तो स्कूटर तक पहुँचना बहुत मुश्किल होता पर मैंने पीछा करना श्रेयस्कर समझा और मैं भी शहर के रास्ते चल दिया|सड़के बिल्कुल सुन्न थीं और चाँद की रोशनी से गुलाबी रंग जगमगा रहा था|वे महिलाएँ शहर के मुख्य दरवाज़े से अंदर आयीं और उनमें से एक छरहरे बदन वाली युवती ने खिलखिलाते हुए एक घर के दरवाज़े पर दोनों हाथों के पंजो से थपथपया और खिलखिलाते हुए आगे बढ़ गयी|किसी ने भी दरवाज़ा नहीं खोला और फ़िर एक और युवती ने वैसे ही तरीके से दरवाज़ा थपथपाया| इस बार दरवाज़ा खुला और एक अत्यंत बूढ़ा आदमी थाली में कुछ अनारदाने, खट्टी मीठी गोलियां, कुछ सूखे छुआरे और सूखी इमलियाँ बाहर रख कर वापस दरवाज़ा बंद कर अंदर चला गया| महिलाओं ने थाली में से सब उठा लिया और आगे बढ़ गयीं|
अब वे आगे के कई घरों पर थपथपा कर आगे बढ़ जातीं लेकिन रुकती नहीं थीं|कुल 9 महिलाएँ इतना खुल कर सड़क के बीचों बीच चल रही हैं और कोई इक्का-दुक्का आने जाने वाला उन्हें नहीं देख रहा था|कमाल ही है|उसी समय एक पुलिस की गाड़ी पीछे से आयी और उन महिलाओं के आर पार होकर निकल गयीं|ये क्या हुआ? गाड़ी आर पार? कोई चोट नहीं और सब कुछ पहले जैसा? वैसी ही चाल और वैसी ही खिलखिलहट! मेरे तो पैर जम गए|चौपड़ से 100 मीटर दूर मैं खड़ा ही रह गया और वो महिलाएँ चौपड़ के नीचे चली गयीं| तभी मेरे कान में एक जनानी आवाज़ आयी "मीठी गुड़ की डली और कड़वा मेरा पान, खाये जो 100 बरस जिये और फेंके तो दे दे अपनी जान|" मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो एक अत्यंत सुंदर से वस्त्रों में लिपटी कन्या कुमारी अपने मुख में पान का बीड़ा दबाये मुझे पलटी नज़रों से देखते हुए भागी जा रही थी| उसके मादकता भरे चक्षु मुझे मेरा नाम पुकारते लग रहे थे|नहीं! मैं नहीं जाऊँगा उसके पीछे|मेरे पीछे मेरी पत्नी और बच्चा है|नहीं|मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ गया है|मुझे घर जाना है|मुझे सब घूमता हुआ दिखाई दे रहा है|अंततः मैं मूर्छित होकर गिर पड़ा|
आगे जारी है.........
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