Friday, May 6, 2022

वृत्तांत ८ भाग ५

गतांक से आगे.....

मूर्छा टूटने पर मैंने अपने आप को बड़े अस्पताल के बिस्तर पर पाया|मैं क़ाफ़ी कमज़ोर महसूस कर रहा था| पास में एक कांस्टेबल नर्स से ठिठोली कर रहा था|मुझे पंखे से लटकी लाश दिखाई दे रही थी| पास के बिस्तर पर मुह कटा चार हाथ वाला राक्षस लेटा था|ये क्या हो रहा है? मेरे बिस्तर पर सांप क्यों हैं? और.... और ये ज़मीन पर बिच्छू क्यों रेंग रहे हैं? मैं अब लेटा - लेटा ही बिस्तर से ऊपर क्यों उठा जा रहा हूँ? मैं चीखा " ओ ठुल्ले मुझे बचा ले|ओ बाई मुझे बचा ले, मैं गिर जाऊँगा|" किसी ने कुछ नहीं सुना|ये कौन है जो घोड़े पर बैठा हुआ वायु मार्ग से मेरी तरफ़ आ रहा है? लेकिन... ये तो..... ये..... ये तो घोड़े के धड़ पर मनुष्य का धड़ है!! ऐसा तो केवल कॉमिक्स में होता था या फ़िर यूनानी कथाओं में| क्या मैं मर गया हूँ? या फ़िर कोई सपना देख रहा हूँ? अचानक इतनी असहनीय अग्नि क्यों महसूस कर रहा हूँ? मेरा शरीर जल रहा है|मैं अलग खड़ा हो गया हूँ और चिता पर मेरा शरीर जल रहा है? हे प्रभु|हे मेरे गोविंद|मैं मर चुका हूँ!!

अब मैं कहाँ जाऊँगा? और ये आधा घोड़ा- आधा मनुष्य मेरे पास क्यों आ रहा है? क्या मुझे स्वर्ग ले जाया जायेगा या नर्क? अप्सराओं के बीच अंगूर खाऊँगा या खौलते तेल में उबाला जाऊँगा? इतना सोचते सोचते वह मनुष्य- घोड़ा मेरे निकट आ जाता है और कहता है- "तुंबरू जी ने आपको याद किया है|" अगले ही क्षण मैं एक पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर था जहाँ एक मनुष्य के शरीर पर घोड़े का सिर लिए सज्जन से जीव खड़े थे जिनके एक हाथ में वीणा और एक हाथ में पोथी थी|ये ही तुंबरू हैं|वे मुझे अपने साथ हवा में उड़ा चलते हैं उपर की ओर आकाश की ओर|जैसे जैसे हम ऊपर बढ़ते हैं वैसे वैसे पानी की कलकल सुनाई देने लगती है|अब मुझे सागर दिखाई देने लगता है और मैं अचंभित सा सागर में प्रवेश कर जाता हूँ|
ये सागर ही विचित्र है|एक तो आसमान में सागर और वहीं दूसरी तरफ़ उल्टे पेड़| जी हाँ आपने सही सुना - उल्टे पेड़| ऐसा पेड़ जिसकी जड़ आकाश की ओर तथा पत्ते और लताएँ नीचे की ओर|गाय, बकरियाँ, भेड़, शूकर, श्वान, सिंह, मृग इत्यादि जानवर अजीब से तरीके से उड़ रहे थे|मृग चले अश्व की तरह तो अश्व चले श्वान की तरह|सिंह चले बकरी की तरह और बकरी चले शूकर की तरह| सब उलट पुलट| 

अब तुंबरू जी मुझे सागर के अंधेरे इलाके की तरफ़ ले जाते हैं जहाँ से कुछ आवाज़ें आ रही थी| पास जाने पर वो आवाज़ें भयानक चीत्कार में बदल गया गयीं ऐसी आवाज़ें की जीवित मनुष्य अगर सुन ले तो आत्मा बाहर आ जाए| अब तुंबरू जी कहीं अंतर्धान हो गये थे और मैं अकेला ही उन चित्कारों की तरफ़ तेज़ी से बढ़ा जा रहा था| जब मैं वहाँ पहुंचा तो वहाँ पहुंच कर मुझे मेरे पूर्व कर्म दिखाई देने लगे|मैंने बचपन में एक श्वान को लकड़ी से पीटा था|वह बहुत चिल्लाया था|अचानक से मुझे लगा की मुझे किसी ने बहुत तेज़ चोट मारी है डंडे से| चोट इतनी भीषण थी कि मेरे मुख से चित्कार निकल गयी|अब मेरे समझ आ चुका था की यहाँ पापों का एहसास करवाया जा रहा है|मेरी चीत्कार ठंडी होती उससे पहले ही उस व्यक्ति का डरावना चेहरा मेरे समक्ष आ गया जिसको मैंने गलत माल बेचा था और जब वो माल बदलवाने आया था तो मैंने उसको भगा दिया था|उस डरावने चेहरे ने मेरे ज़हरीला बटका काटा और मैं जलने लगा| चीत्कारों से मेरा मुख सूख गया लेकिन रुदन रुका नहीं|

अब मुझे सुई सी चुभने का एहसास हुआ और किसी ने मेरे कान में कहा "मीठी गुड़ की डली और कड़वा मेरा पान, खाये जो 100 बरस जिये और फेंके तो दे दे अपनी जान|" ये तो उसी महिला की आवाज़ है जिसकी आवाज़ सुनकर मैं चौपड़ के पास सम्मोहित हो मूर्छित हो गया था| अब फिर से सुई चुभने का एहसास हुआ और मेरे बच्चे की आवाज़ आई "पापा उठो|" मेरी आँखे झपकी और मैंने देखा की मैं वहीं बड़े अस्पताल में बिस्तर पर हूँ|वो कांस्टेबल और नर्स भी वहीं थे लेकिन पंखे पर कोई लाश नहीं थी और ना ही पास वाले बिस्तर पर कोई राक्षस| मैं पहले जो देख रहा था वो सपना था या ये जो मैं अब देख रहा हूँ| मेरी रुलाई छूट गयी| मेरे घरवाले पहली बार मुझे रोते हुए देख रहे थे|

आगे जारी है.......

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