मैं वहीं अस्पताल में तीन दिवस तक रहा और ठीक होकर घर आ गया| ठीक तो क्या ही हुआ था बस दवाओं के नशे में झूम रहा था| घर आकर दो दिवस तक घोड़े बेच कर सोया| इतनी प्यारी नींद| ना कोई सपना, ना कोई डर| शुद्ध होते अन्तः करण की आवाज़ में निरंतर खोते जाना| अपनी रक्त धमनियों की आवाज़ सुनना बिल्कुल वैसे ही जैसे बहते हुए झरने को अपने समीप अनुभव करना| बस सोता ही रहूँ|
अब मैं ठीक हो गया था और दुकान के लिए तैयार था|काफी समय बीत गया था दुकान खोले हुए| जाले हटाने और साफ़ सफाई में ही सारा दिन निकल जायेगा| ऐसा सोच कर दुकान के लिए तैयार हुआ लेकिन जाने का मन ना हुआ| तीस वर्ष में पहली बार दुकान जाने का मन नहीं हो रहा है| लेकिन मन जाना कहाँ चाहता है| मैंने अपनी धर्मपत्नी से विचार साझा किया तो उसने मुख पर चिंता का दरिया बिखेर दिया| मैंने कहा " तुम नहीं जानती के मैं किस दौर से गुजरा हूँ|तुमने मेरी हालत देख कर नहीं पूछा इसी से मैं समझ गया था कि मैं सकुशल हूँ इतना ही काफी है| मैं शारदा पीठ जाना चाहता हूँ|
शारदा पीठ का नाम सुनकर मेरी पत्नी का कलेजा हिल गया| शारदा पीठ पाकिस्तान में है और वहाँ जाना आसान है लेकिन वापस आना लगभग नामुमकिन| मेरी पत्नी ने मुझे बच्चे की कसम दिलवा दी कि मैं पाकिस्तान नहीं जाऊंगा लेकिन अब तक मैं शक्ति के दर्शन के लिए ठान चुका था|मैंने समझाया कि पाकिस्तान जाने का गुप्त रास्ता मुज़फ़्फ़राबाद से निकलता है|वहाँ खास रास्ता बना हुआ है पहाड़ी क्षेत्र में जिससे शारदा पीठ केवल दो किलोमीटर ही है| मैं एक हफ्ते में वापस आ जाऊँगा|पत्नी क्या बोलती|पागल आदमी से ब्याव के नतीजे भी भुगतने पड़ते हैं| मैं एक भी क्षण नहीं गवाना चाहता था| पत्नी दही और गुड़ में मूंग भिगो कर ले आई और अपनी अंगुलियों के बीच दबा कर मुझे खिला दिया|गणेश जी और गोविंद को याद करकेकरके बटुआ और मोबाइल रखकर मैं घर के कपड़ों में निकल पड़ा|
मैं इतना तो जानता था कि कश्मीर के लिए बस ही ठीक रहेगी और वो मिलेगी दिल्ली से, सो मैं दिल्ली पहुंचा और हर उस बस में पूछने लगा कि ये बस कहाँ तक जायेगी और मैं बोलता था 'शारदा पीठ'| ना तो किसी कंडक्टर को पता था और ना ही किसी यात्री को| फिर एक सरदार ने कहा कि यहाँ से पहले जम्मू तक जाना पड़ेगा फ़िर वहाँ से सोपोर और फ़िर सोपोर से कुपवाड़ा| मैं जम्मू की बस से पहले सोपोर उतरा और फ़िर 12 घंटे तक इंतज़ार करके कुपवाड़ा वाली बस में| सोपोर और कुपवाड़ा में लोग मुझे पलट कर घूरते थे क्योंकि मैं घर के पजामा औरऔर पोलो कमीज़ में था| जबकि वहाँ सब शेरवानी और कुर्ता पहने हुए थे| रास्ते में काफी चेकिंग भी हो रही थी लेकिन हिंदू दिखने के कारण जाने दे रहे थे|शायद कश्मीर वो नही है जो देखा था टीवी पर|बस से उतरते ही एक मुस्लिम युवक मेरे समीप आया और पूछा के कहाँ जाना है तो मैंने कहा नदी के उस पार|वो समझ चुका था कि मैं हिंदू हूँ और शारदा पीठ जाना चाहता हूँ| उसने कहा "मेरे अब्बू ये काम करते हैं|दो लाख दिल्ली रूपया लगेगा - एक लाख जाने का और एक लाख आने का|" मैं पांच हज़ार सोच रहा था लेकिन यहाँ तो घोड़ा ताँगा छोड़ कर भाग रहा है| मैंने कहा "इतना तो नहीं है, पाँच हज़ार दे सकता हूँ|" युवक बोला "उल्टी बस पकड़ के निकल जाओ|यहाँ फँस गए तो फँसे रह जाओगे| युवक जाने लगा तो मैं भी आस पास सराय देखने लगा| युवक वापस आता है और बोलता है" पाँच हज़ार में केवल जाने का हो सकता है|वापसी का खुद इंतज़ाम कर लेना|" मैंने कहा वापसी भी पाँच हज़ार में चाहिए|" युवक कुछ सोचा और बोला ठीक है लेकिन वापसी के टाइम पूरा पैसा लूंगा फ़िर बिठाऊँगा| मैंने हाँ कर दी और चल दिया युवक के साथ|
लड़का मुझे अपने अब्बू के पास ले जाता है मोटरसाइकल पर जो कि कसाई का काम करते हैं| उनकी दुकान पर पहुँच कर मुझसे सहा नहीं गया और उल्टी हो गयी| दोनों लोग हसने लगे और तंज कसने लगे - पता नहीं औरत को कैसे संभालता होगा|इसका तो कलेजा भी ना बिके| मैंने उनकी बात को अनसुना कर दिया और शारदा पीठ जाने का कार्यक्रम पूछने लगा| उन्होंने ने मुझे एक पर्ची काट कर दी जिस पर उर्दु में कुछ लिखा था| मुझे हिदायत दी गयी के ये पर्ची ही मेरा टिकट है इसलिए संभाल कर रखूँ| अब मैं उस युवक के साथ पैदल नदी की तरफ़ चल दिया|
नदी के पास कुछ नावें लगी हुई थी जिसमें से एक पर मुझे बैठना था| युवक नाव खेने लगा और मैं प्रक्रति के मनोहारी दृश्यों को देखने लगा| दो घंटे तैरने के बाद हम किनारे पर पहुँच गए जहाँ से एक पहाड़ी का रास्ता दिखाई दे रहा था और कुछ झोपड़ियाँ| युवक मुझे उन्हीं में से एक झोपड़ी में ले गया| अंदर पैंतीस की उम्र के आस पास का एक आदमी राइफल लेकर खाट पर बैठा था| युवक ने मुझसे कहा कि अब ये ही आगे लेकर जायेंगे और वापस यहीं तक लायेंगे| इतना बोलकर युवक चला गया| वो पैंतीस बरस का आदमी बोला" आ जाओ इधर मेरे पास|" मैं पास चला गया| उसने कहा " मेरा नाम अली है और जब तक हम वापस लौट नहीं आते तब तक दो बातें याद रखना| पहली ये की तुम रफ़ीक़ हो और दूसरी ये की तुम आधे पागल हो| अगर कोई पकड़ ले तो एक ही बात बोलनी है- ला इलाहा इल इलाह, मोहम्मद उर रसूल अल्लाह|" मुझे इस पँक्ति का मतलब नहीं पता था लेकिन मैंने याद कर ली|
अब हम झोपड़ी से निकल चुके थे पहाड़ी रास्ते की तरफ़| वह रास्ता पत्तों से बना हुआ था और उबड़ खाबड़ था| मेरे मन में कुलबुलाहट थी यह जानने की के उस पँक्ति का अर्थ क्या है सो मैंने अली से पूछ लिया| अली बोला "इसका मतलब है कि इस दुनिया में अल्लाह के अलावा और कोई खुदा नहीं है और मोहम्मद सलालाहु अलियाही वसल्लंम् उस एक अल्लाह के आख़िरी रसूल हैं|" मैंने पूछा " आपको कैसे पता लगा कि वो आख़िरी रसूल ही हैं? " अली ने कहा " क़ुरान में लिखा है "| मैंने पूछा " क़ुरान किसने लिखी? " अली बोला " अल्लाह ने जिबरील नाम के एक फ़रिश्ते से क़ुरान नाज़िल कारवाई थी हुज़ूर को और अल्लाह का ने ही इंसानियत की भलाई के लिए क़ुरान उतारी थी|" मैंने फ़िर पूछा " जिस वक़्त क़ुरान उतारी जा रही थी उसी वक़्त लिख लिया गया होगा? "अली ने कहा" हाँ लिखा था लेकिन बकरियाँ खा गयी थी|" अब मेरी हँसी छूटने वाली थी लेकिन अली की राइफल देखकर चुप रहा| अली अपने आप ही बोलने लगा " तुम्हें शायद हँसी आ रही होगी लेकिन सच यही है जो मैंने कहा| हुज़ूर के पर्दा फरमाने के बाद उमैय्या और फ़िर अब्बासियों ने खूब् ज़ुल्म किया| कुरान के साथ भी छेड़ छाड़ हुई और अहले बैत को दरकिनार कर दिया|" अली अब भावुक हो रहा था| वो रुक गया और उसकी आँखे गीली होने लगी| अली बोला " अबु बक्र ने अपनी बेटी आयशा को असली वारिस बनाने के लिए हुज़ूर की बेटी फ़ातिमा पर खूब ज़ुल्म किये जिसके कारण हुज़ूर के पर्दा फरमाने के कुछ महीनों बाद वो भी चली गयीं| उनके पति अली और दो बेटे - हसन और हुसैन पर भी अत्याचार हुए| हुसैन को तो कायर यज़ीद ने कर्बला के मैदान में कत्ल कर दिया था|उनकी सबसे प्यारी चार साल की बच्ची सकीना को गले में रस्सी बांधकर पेश किया गया| वो इतनी मासूम सी बच्ची अपने बाबा के कटे सिर पर प्यार से हाथ फेर कर बोलती कि बाबा उठ जाओ मैं आ गयी| अपने बाबा को याद करते करते सकीना कारागार में ही चल बसी| या मौला, कैसा इंतेहा ले रहा है|"
अब मैं कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं था| मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या बोलूं| अली ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा " मैं शिया हूँ|पहले हम हिंदू थे आपकी तरह लेकिन नुन्द् ॠषि के वक़्त मेरे वालिद के वालिद के वालिद के वालिद मुसलमान हो गए| उस वक़्त हम पर काफी कर्ज़ था जो की मुसलमान बनते ही माफ हो गया था और तब से हम मुसलमान ही बने रहे|" अब मैं कुछ बोलने की हिम्मत जुटा चुका था सो मैंने कहा " जब तुम खुद पहले हिंदू थे तो आज क्यों कश्मीरी पंडितों को मारते हो? " अली ने कहा "जब हिंदुस्तान की तकसीम हुई थी तब भी कश्मीर में दंगे नहीं हुए थे| कश्मीर को पाकिस्तान और हिंदुस्तान से मुफ़्त का पैसा आता रहा जिसके कारण हम आगे बढ़ने की सोच ही नहीं पाए| कश्मीर का होना दोनों खित्तों के लिए फायदेमंद था जिसको फुटबॉल की तरह मारते रहो|कश्मीरी पंडितों को मारने का सिलसिला 1989 से शुरू हुआ जब अफ़गान की लडाई में रूसी हार कर वापस चले गए थे और मुजाहिद कश्मीर की तरफ़ आ गए जिहाद के लिए| उनकी ट्रेनिंग मज़हबी थी इसीलिए कश्मीर में गैर-मुसलमानो को मारना सवाब का काम हो गया| और जब मारने का पैसा मिले तो ये तो और भी अच्छा है|"
अली और मैं चले जा रहे थे|दो रातें निकल चुकी थीं | जूता फटने को हो रहा था|अली ने कहा " वो आगे जो पीला कपड़ा है ना ऊँचे डंडे पर, वहाँ ही शक्ति- पीठ है| तुम जाकर आ जाओ, मैं यहीं हूँ|" मैं जब उस डंडे के पास पहुंचा तो वहाँ एक किताब रखी थी जिसमें लोगों ने अपने नाम और इच्छायें लिखी हुई थीं| साथ में एक लंबा पत्थर था जिस पर काला तिलक जैसा कुछ था| मैं प्रणाम करके अपनी इच्छा किताब में लिख वापस अली की तरफ़ चल दिया|
अगले अंक में जारी......
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