मैं वही अदना सा प्लम्बिंग एवं सैनेट्री का एक छोटा व्यापारी अपनी दुकान पर बैठा हिसाब में लीन था | तभी आसपास की दुकान से लड़ाई झगड़े का शोर सुनाई दिया तो मेरा ध्यान टूटा और अपनी कुर्सी से उठ कर बाहर आया | मैंने देखा कि कुछ दूरी पर स्थित मेरे ही जैसे एक प्लम्बिंग और सैनेट्री के यहां से शोर उठ रहा था लेकिन कुछ साफ सुनाई नहीं दे रहा था | तभी वहां पर मौजूद एक पुराने मित्र को मैंने देखा तो इशारे से उन्हें बुला लिया | वो भी वहां से निकलने ही वाले थे तो मेरे यहाँ आए और उनका अभिवादन कर उन्हें अंदर ले आया | आराम से बैठकर एक दूसरे का हाल चाल पूछ कर हम उस शोर के बारे में बात करने लगे |
मैंने पूछा "वो दुकानदार तो बड़ा अच्छा व्यक्ति है फिर क्यों उसके वहां शोर मचा हुआ था?" वे बोले "अजी दिल्ली से नलों का सप्लायर आया हुआ था अपने आदमीयों के साथ पैसों की उगाही के लिए |" मैं सुनकर हतप्रभ रह गया क्यूँकि जिस दुकानदार की मैं बात कर रहा था वो तो साहूकार आदमी था जो किसी का पैसा नहीं रोकता था| मेरे मित्र आगे बोले "दरअसल इन्होने अपने लड़के के भरोसे हर चीज़ छोड़ दी थी तो उसने मस्ती काट ली | माल मंगवा कर घाटे में बेच देता था और खाते में उधार की देनदारी दिखा देता था तो पिताजी को लगता था कि उधार तो निकाल लेंगे पर निकलने के लिए किसी को उधार भी तो दे रखी होनी चाहिए|"
मैं सोचने लगा कि कोई भी व्यक्ति माल घाटे में क्यूँ बेचेगा? खरीद की दर के आसपास दाम करके ही बेच सकता था लेकिन नुकसान खाने की क्या जरूरत थी? मेरे मित्र मेरा सवाल भांप कर बोले "अजी चक्कर ये था कि उसके शौक बड़े थे| अपने पिता को भले ही कुछ नहीं दिया हो पर अपनी गर्लफ्रेंड और उसके भाई को महंगे उपहार जैसे कि हीरे की अंगूठीयां और बालियाँ, लाल आई-फोन देना, महंगे रिज़ॉर्ट में रंगरेलियां करता था, दोस्तों को महंगे होटलों में शराब पिलाता था, सट्टे में भी पैसा लगाने लगा था और भी ना जाने क्या क्या | मेरे बैंक का मैनेजर बता रहा था कि ये लड़का नीमच के एक खाते में हर शुक्रवार काफी पैसा डलवाता था जो कि किसी बृज बिहारी माहोर के नाम से है | ये बात मैंने पिछले महीने सेठ जी से कही तो वो पागल हो उठे थे | वो नीमच वाला खाता दरअसल किसी और का नहीं बल्कि लड़के के असली पिता का था|"
यह सब सुनकर मैं सन्न रह गया क्यूंकि मैं तो सेठ जी को ही उसका पिता समझता आया था | मैं पानी का घूँट पीकर फिर से तैयार था आगे की बात जानने के लिए |मेरे मित्र बोले "जब सेठ जी की आर्थिक हालत खराब थी तो उनके ससुराल से मदद आई थी जिससे उन्होंने वापस अपना साम्राज्य खड़ा किया | मदद के साथ-साथ सेठ जी को उनके घर के एक सदस्य को गोद भी लेने को कहा गया जिसकी माँ कुछ समय पहले परलोक सिधार गयी थी और पिता, जो कि एक निचली जाती से थे, लड़के को अपने ससुराल छोड़ गये थे |सेठ जी उस लड़के को गोद लेने को राज़ी हो गये | लड़का यहां आ गया और इनके साथ रह कर काम सीखने लगा | सेठ जी पूरी तरह से उसे अपना लड़का मान चुके थे और काम काज अब उसके भरोसे छोड़ने लगे | उन्होंने उसके सभी कागज़ात में पिता की जगह पर खुद का नाम दिया जिससे लड़के को शहर में ऊंची जाती के लोगों में इज़्ज़त मिलने लगी और उसका नेटवर्क बढ़ने लगा | धीरे धीरे उसके हाथ में सामान खरीदने और बेचने की भी ज़िम्मेदारी आ गयी जिससे पैसा उसके हाथ में रहने लगा | इसी दौरान उसका असली पिता से संपर्क बना रहा और वह धीरे धीरे करके पैसा दूसरी ओर सरकाने लगा | वह ग्राहकों को माल की रेट खरीद से भी कम में बता बेचता था जिससे ग्राहक तुरंत खरीद लेता था नतीजन लड़के के हाथ में अधिक से अधिक पैसा आ जाता और फिर उसी में से पैसा निकाल कर अपने पिता को देता |उदाहरण के लिए समझें कि आज उसने 1 लाख देकर खरीदा हुआ माल 90 हज़ार में ही बेच दिया 10 हज़ार का घाटा खाकर | अब उस 90 हज़ार में से 20 हज़ार और निकाले जो उसके असली पिता को बैंक में डाल दिए या इधर-उधर खर्च कर दिये यानी कुल घाटा हुआ सेठ जी को 30 हज़ार का जिसमें अगर मुनाफ़ा भी जोड़ दूँ तो घाटा और बढ़ जाएगा| अब यही 30 हज़ार की रकम कुछ मुनाफ़ा जोड़ने के बाद अपने दोस्त को उधार माल के पेटे खाते में लिख दिया जिससे यह लगे कि पैसा आना बाकी है लेकिन वो तो आने ही नहीं थे | सेठ जी अच्छा कमाए हुए थे इसलिए उन्हें लंबे समय तक इस घाटे का आभास नहीं हुआ | लड़का तब तक और लापरवाह हो गया था और सप्लायर से महंगी दर पर माल खरीदता क्यूंकि वो लड़के को मस्ती करवाते थे ताकि वो महंगा और डैड माल भी ऊंची दर पर खरीद ले | इसी तरह उसने दिल्ली से नलों का पीटा हुआ माल खरीद लिया 4 महीने की उधारी पर जो कि बिका नहीं और पेमेंट खड़ा हो गया | आज वो ही दिल्ली वाले हंगामा कर रहे थे सेठ जी की दुकान पर और लड़का शायद कहीं गुलछर्रे उड़ा रहा था |"
मेरा मुख खुला ही रह गया था काफी देर से क्यूंकि ऐसा सब कुछ मैंने जीवन में पहले कभी नहीं सुना था | मैंने होश सम्हाल कर पूछा कि अब सेठ जी क्या करेंगे तो मेरे मित्र ने कहा "पैसा चुकता करने के अलावा और कोई भी रास्ता नहीं है | लड़के को अलग कर देंगे और अब अकेले ही सम्हालेंगे सब कुछ|बाकी जो नसीब में लिखा है वही होगा | हो सकता है कि अब अपने पिता को यहीं पर बुला कर नया काम डाल ले क्यूंकि पैसा तो बना ही लिया है लड़के ने |ख़ैर, आप तो ध्यान रखें अपना और हमारे लायक कुछ काम हो तो बताना |अभी मैं इजाज़त चाहूँगा आपकी| " यह कह कर मेरे मित्र उठ गये और अपना ध्यान रखने की कह कर चल दिए |
मैं सोचता रहा कि एक भले इन्सान ने किसी को आसरा दिया, अपना नाम दिया, समाज में इज्ज़त दिलवाई और उसी ने ही उनके साथ ऐसा विश्वासघात किया | अब तो यह बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं है कि अच्छाई का बदला अच्छाई से ही मिले भले ही हम रिश्ते को कितना ही प्रगाढ़ समझते हों |
तो साथियों, आज का वृत्तांत आप को पसंद आया हो इसी कामना के साथ आपसे विदा लेता हूँ |अगली बार चौथी कड़ी के साथ आपके समक्ष फिर प्रस्तुत होऊंगा |
No comments:
Post a Comment