मैं एक साधारण सा प्लंबिंग एवँ सैनेट्री का दुकानदार जो कुछ समय पहले ही अपने बच्चे के बुखार के कारण दुनिया के कई रंग देख चुका था जिसके बारे में मैंने पिछली बैठक में आपसे अपना अनुभव साझा किया था, आज आपको एक अलग ही अनुभव बताने वाला हूँ |
लॉक-डाउन में छूट मिलने के बाद से मैं आम दिनों की तरह ही दुकान आने लगा था सुबह 10 बजे से सांझ के 6 बजे तक | उस दिन समय था दोपहर 3 बजे का और कोई ग्राहक भी नहीं था | बाहर की खाली सड़क पर पड़ती चिलचिलाती धूप को देख कर अनायास ही मृग मरीचिका का ध्यान हो उठता था | मैं अपने खयालों में खोया हुआ था कि तभी एक रिक्शा चलाती महिला दुकान के बाहर आकर रुकी जिसमें पीछे की सीट पर दो छोटे से बच्चे, जिनमें एक लगभग 3 वर्ष की बच्ची तथा एक बच्चा 2 वर्ष का, बैठे हुए थे एक दूसरे का हाथ पकड़कर | वह रिक्शा चालक महिला, जो कि करीब 30 वर्ष की आयु के आसपास की लग रही थी, वह दोनों बच्चों के साथ मेरी दुकान में आई और मुझे नमस्ते करके मेरा अभिवादन किया | मैं बोहनी नहीं होने के कारण थोड़ा निराश सा बैठा था इसलिए मैंने महिला के अभिवादन का जवाब केवल गर्दन हिलाकर दिया और कुछ नहीं बोला|
मैं सोच रहा था कि ये ज़रुर अपने बच्चों के लिए खाने के पैसे मांगेगी क्योंकि ऐसे लोगों को मैं काफी देख चुका था जो कि सामने वाले का मन अपनी गरीबी से पिघला कर उनसे पैसे ऐंठने का प्रयास करते हैं | मेरे मन में ये बात काफ़ी समय पहले घर कर गई थी कि इस तरह के लोगों का संगठन होता है जो गुट बना कर निकलते हैं और अकेले दुकानदार को फांस लेते हैं जिनसे फिर ये पैसा निकलवाने का काम करते हैं इसीलिए मैं सचेत हो गया था |
मैं उस महिला को बाहर निकलने के लिए कहता इतने में ही वो मेरे काउंटर के पास आई और 4,000/- रुपए रख कर बोली के "आज बाऊजी नहीं बैठे हैं?" मैं अपनी उधेड़बुन से बाहर निकलने के अथक प्रयास के दौरान बोला "कौन बाऊजी? यहां तो केवल मैं ही बैठता हूँ |" महिला ने पूछा "ये अग्रवाल जी की ही दुकान है ना? बाहर भी अग्रवाल ही लिखा है |" मैं अब तक सजग हो गया था | मैंने कहा "हाँ, ये अग्रवालों की ही दुकान है लेकिन आप किनको पूछ रही हैं और ये पैसे किसके हैं?" वह महिला अब थोड़ा रुकी और फिर बोली" भैय्या, मैं गरीबी की मार से परेशान एक विधवा 2 बच्चों की माँ हूँ जो रिक्शा चला कर अपना पेट पालती हूँ | मैं शहर के पुराने सैनैट्री बाज़ार के बाहर रिक्शा खड़ा करती थी तब एक बार एक बाऊजी मेरे रिक्शे से अपने घर तक गए थे |उतर कर उन्होंने जय सियाराम कहा तो मुझे बहुत अच्छा लगा तो मैंने उनसे पूछा के वे क्या काम करते हैं तो उन्होंने कहा कि वे कुंडीयां एवं वॉश-बेसन बेचते हैं| उन्होंने मुझे अपना कार्ड दिया और कहा कि अगर कभी ज़रूरत पड़े तो मेरे नए सैनैट्री बाज़ार स्थित प्रतिष्ठान पर आ जाना | मैंने उनसे कार्ड एवं रिक्शा का किराया लिया और चली गयी |कुछ समय बाद ही मुझे अपने किराए के घर पर कुंडी और कुछ टाइलों की ज़रूरत पड़ी तो मुझे बाऊजी का कार्ड याद आ गया जो मैंने एक आले में रख दिया था | थोड़ा ढूंढने के बाद वह कार्ड मिल गया और मैं पता ढूंढते उनकी नए सैनैट्री बाज़ार स्थित दुकान पहुँच गयी जहां बाऊजी और उनके पुत्र बैठे थे | बाऊजी मुझे देखते ही तुरंत पहचान गए और उन्होंने जय सियाराम से मेरा अभिवादन किया | मैंने उनको अपनी ज़रूरत बतायी तो उन्होंने मुझे एक कुंडी दिखायी और सुंदर सी मछली वाली चित्रकारी की टाइल दिखाई जो मुझे बहुत पसंद आई | जब बिल बना तो 4000/- का जोड़ सुनकर तो मेरी आंखो के आगे अँधेरा छा गया क्यूंकि मैं केवल 500/- रुपये लायी थी और वैसे भी इतना खर्चा मैं नहीं कर सकती थी | मैं वापस जाने लगी तब बाऊजी ने मुझे रोका और कहा" बेटी, तू ये सामान ले जा, अब ये तेरा है और तुझे ही फलेगा |पैसा जब तेरे पास आ जाये तब दे जाना और पैसा देने तब ही आना जब तेरे घर में सब बर्तन धान्य से भरपूर हो जाएँ |" इतना कह कर उन्होंने सामान मेरे रिक्शे में रखवा दिया और मुझे विदा किया |"
उस महिला की सारी बात मैं बिना पलकें झपकाए सूखे कंठ से सब कुछ सुनता चला गया |महिला बोली "भैय्या, आज एक वर्ष बाद मेरा घर धान्य से भरपूर है और मैं 4000/- रुपए बाऊजी को देने आयी हूँ | उनका कार्ड मुझसे कहीं गिर गया और फिर नहीं मिला लेकिन मुझे इतना ध्यान था कि उनकी दुकान के बाहर अग्रवाल लिखा था और अंदर भगवान् की भी टाइलें रखी हुई थीं |" भगवान् की टाइलें सुनकर मैं समझ गया कि वह कौन सी दुकान की बात कर रही है | मैं उस महिला के सम्मान में खड़ा हुआ, उसके पैसे काउंटर से उठा कर उसे वापस दिए और बाहर जाकर उस दुकान का रास्ता दिखा दिया |वह अपने बच्चों को वापस रिक्शे में बिठाकर उस दुकान की ओर चल पड़ी जहां वह नेक व्यक्ति विराजमान थे |मैं वापस अपने काउंटर की तरफ चल पड़ा और मानव जीवन के विभिन्न रंगों में से सबसे उजले रंग को आज वास्तविकता के अनुभव से अपनी पराकाष्ठा को छूते देखकर भाव विभोर होता रहा |
तो साथियों, यह थी वृत्तांत श्रृंखला की दूसरी कड़ी जो आपने पढ़ी |इसी प्रकार से आगे भी आपको सच्चे अनुभवों पर आधारित कथाएँ आपके समक्ष प्रस्तुत करने के प्रयास के वचन के साथ आपसे विदा लेता हूँ |
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