Tuesday, June 28, 2022

वृत्तांत ८ भाग ६

गतांक से आगे.......

मैं वहीं अस्पताल में तीन दिवस तक रहा और ठीक होकर घर आ गया| ठीक तो क्या ही हुआ था बस दवाओं के नशे में झूम रहा था| घर आकर दो दिवस तक घोड़े बेच कर सोया| इतनी प्यारी नींद| ना कोई सपना, ना कोई डर| शुद्ध होते अन्तः करण की आवाज़ में निरंतर खोते जाना| अपनी रक्त धमनियों की आवाज़ सुनना बिल्कुल वैसे ही जैसे बहते हुए झरने को अपने समीप अनुभव करना| बस सोता ही रहूँ|

अब मैं ठीक हो गया था और दुकान के लिए तैयार था|काफी समय बीत गया था दुकान खोले हुए| जाले हटाने और साफ़ सफाई में ही सारा दिन निकल जायेगा| ऐसा सोच कर दुकान के लिए तैयार हुआ लेकिन जाने का मन ना हुआ| तीस वर्ष में पहली बार दुकान जाने का मन नहीं हो रहा है| लेकिन मन जाना कहाँ चाहता है| मैंने अपनी धर्मपत्नी से विचार साझा किया तो उसने मुख पर चिंता का दरिया बिखेर दिया| मैंने कहा " तुम नहीं जानती के मैं किस दौर से गुजरा हूँ|तुमने मेरी हालत देख कर नहीं पूछा इसी से मैं समझ गया था कि मैं सकुशल हूँ इतना ही काफी है| मैं शारदा पीठ जाना चाहता हूँ|

शारदा पीठ का नाम सुनकर मेरी पत्नी का कलेजा हिल गया| शारदा पीठ पाकिस्तान में है और वहाँ जाना आसान है लेकिन वापस आना लगभग नामुमकिन| मेरी पत्नी ने मुझे बच्चे की कसम दिलवा दी कि मैं पाकिस्तान नहीं जाऊंगा लेकिन अब तक मैं शक्ति के दर्शन के लिए ठान चुका था|मैंने समझाया कि पाकिस्तान जाने का गुप्त रास्ता मुज़फ़्फ़राबाद से निकलता है|वहाँ खास रास्ता बना हुआ है पहाड़ी क्षेत्र में जिससे शारदा पीठ केवल दो किलोमीटर ही है| मैं एक हफ्ते में वापस आ जाऊँगा|पत्नी क्या बोलती|पागल आदमी से ब्याव के नतीजे भी भुगतने पड़ते हैं| मैं एक भी क्षण नहीं गवाना चाहता था| पत्नी दही और गुड़ में मूंग भिगो कर ले आई और अपनी अंगुलियों के बीच दबा कर मुझे खिला दिया|गणेश जी और गोविंद को याद करकेकरके बटुआ और मोबाइल रखकर मैं घर के कपड़ों में निकल पड़ा|

मैं इतना तो जानता था कि कश्मीर के लिए बस ही ठीक रहेगी और वो मिलेगी दिल्ली से, सो मैं दिल्ली पहुंचा और हर उस बस में पूछने लगा कि ये बस कहाँ तक जायेगी और मैं बोलता था 'शारदा पीठ'| ना तो किसी कंडक्टर को पता था और ना ही किसी यात्री को| फिर एक सरदार ने कहा कि यहाँ से पहले जम्मू तक जाना पड़ेगा फ़िर वहाँ से सोपोर और फ़िर सोपोर से कुपवाड़ा| मैं जम्मू की बस से पहले सोपोर उतरा और फ़िर 12 घंटे तक इंतज़ार करके कुपवाड़ा वाली बस में| सोपोर और कुपवाड़ा में लोग मुझे पलट कर घूरते थे क्योंकि मैं घर के पजामा औरऔर पोलो कमीज़ में था| जबकि वहाँ सब शेरवानी और कुर्ता पहने हुए थे| रास्ते में काफी चेकिंग भी हो रही थी लेकिन हिंदू दिखने के कारण जाने दे रहे थे|शायद कश्मीर वो नही है जो देखा था टीवी पर|बस से उतरते ही एक मुस्लिम युवक मेरे समीप आया और पूछा के कहाँ जाना है तो मैंने कहा नदी के उस पार|वो समझ चुका था कि मैं हिंदू हूँ और शारदा पीठ जाना चाहता हूँ| उसने कहा "मेरे अब्बू ये काम करते हैं|दो लाख दिल्ली रूपया लगेगा - एक लाख जाने का और एक लाख आने का|" मैं पांच हज़ार सोच रहा था लेकिन यहाँ तो घोड़ा ताँगा छोड़ कर भाग रहा है| मैंने कहा "इतना तो नहीं है, पाँच हज़ार दे सकता हूँ|" युवक बोला "उल्टी बस पकड़ के निकल जाओ|यहाँ फँस गए तो फँसे रह जाओगे| युवक जाने लगा तो मैं भी आस पास सराय देखने लगा| युवक वापस आता है और बोलता है" पाँच हज़ार में केवल जाने का हो सकता है|वापसी का खुद इंतज़ाम कर लेना|" मैंने कहा वापसी भी पाँच हज़ार में चाहिए|" युवक कुछ सोचा और बोला ठीक है लेकिन वापसी के टाइम पूरा पैसा लूंगा फ़िर बिठाऊँगा| मैंने हाँ कर दी और चल दिया युवक के साथ|

लड़का मुझे अपने अब्बू के पास ले जाता है मोटरसाइकल पर जो कि कसाई का काम करते हैं| उनकी दुकान पर पहुँच कर मुझसे सहा नहीं गया और उल्टी हो गयी| दोनों लोग हसने लगे और तंज कसने लगे - पता नहीं औरत को कैसे संभालता होगा|इसका तो कलेजा भी ना बिके| मैंने उनकी बात को अनसुना कर दिया और शारदा पीठ जाने का कार्यक्रम पूछने लगा| उन्होंने ने मुझे एक पर्ची काट कर दी जिस पर उर्दु में कुछ लिखा था| मुझे हिदायत दी गयी के ये पर्ची ही मेरा टिकट है इसलिए संभाल कर रखूँ| अब मैं उस युवक के साथ पैदल नदी की तरफ़ चल दिया|

नदी के पास कुछ नावें लगी हुई थी जिसमें से एक पर मुझे बैठना था| युवक नाव खेने लगा और मैं प्रक्रति के मनोहारी दृश्यों को देखने लगा| दो घंटे तैरने के बाद हम किनारे पर पहुँच गए जहाँ से एक पहाड़ी का रास्ता दिखाई दे रहा था और कुछ झोपड़ियाँ| युवक मुझे उन्हीं में से एक झोपड़ी में ले गया| अंदर पैंतीस की उम्र के आस पास का एक आदमी राइफल लेकर खाट पर बैठा था| युवक ने मुझसे कहा कि अब ये ही आगे लेकर जायेंगे और वापस यहीं तक लायेंगे| इतना बोलकर युवक चला गया| वो पैंतीस बरस का आदमी बोला" आ जाओ इधर मेरे पास|" मैं पास चला गया| उसने कहा " मेरा नाम अली है और जब तक हम वापस लौट नहीं आते तब तक दो बातें याद रखना| पहली ये की तुम रफ़ीक़ हो और दूसरी ये की तुम आधे पागल हो| अगर कोई पकड़ ले तो एक ही बात बोलनी है- ला इलाहा इल इलाह, मोहम्मद उर रसूल अल्लाह|" मुझे इस पँक्ति का मतलब नहीं पता था लेकिन मैंने याद कर ली|
अब हम झोपड़ी से निकल चुके थे पहाड़ी रास्ते की तरफ़| वह रास्ता पत्तों से बना हुआ था और उबड़ खाबड़ था| मेरे मन में कुलबुलाहट थी यह जानने की के उस पँक्ति का अर्थ क्या है सो मैंने अली से पूछ लिया| अली बोला "इसका मतलब है कि इस दुनिया में अल्लाह के अलावा और कोई खुदा नहीं है और मोहम्मद सलालाहु अलियाही वसल्लंम् उस एक अल्लाह के आख़िरी रसूल हैं|" मैंने पूछा " आपको कैसे पता लगा कि वो आख़िरी रसूल ही हैं? " अली ने कहा " क़ुरान में लिखा है "| मैंने पूछा " क़ुरान किसने लिखी? " अली बोला " अल्लाह ने जिबरील नाम के एक फ़रिश्ते से क़ुरान नाज़िल कारवाई थी हुज़ूर को और अल्लाह का ने ही इंसानियत की भलाई के लिए क़ुरान उतारी थी|" मैंने फ़िर पूछा " जिस वक़्त क़ुरान उतारी जा रही थी उसी वक़्त लिख लिया गया होगा? "अली ने कहा" हाँ लिखा था लेकिन बकरियाँ खा गयी थी|" अब मेरी हँसी छूटने वाली थी लेकिन अली की राइफल देखकर चुप रहा| अली अपने आप ही बोलने लगा " तुम्हें शायद हँसी आ रही होगी लेकिन सच यही है जो मैंने कहा| हुज़ूर के पर्दा फरमाने के बाद उमैय्या और फ़िर अब्बासियों ने खूब् ज़ुल्म किया| कुरान के साथ भी छेड़ छाड़ हुई और अहले बैत को दरकिनार कर दिया|" अली अब भावुक हो रहा था| वो रुक गया और उसकी आँखे गीली होने लगी| अली बोला " अबु बक्र ने अपनी बेटी आयशा को असली वारिस बनाने के लिए हुज़ूर की बेटी फ़ातिमा पर खूब ज़ुल्म किये जिसके कारण हुज़ूर के पर्दा फरमाने के कुछ महीनों बाद वो भी चली गयीं| उनके पति अली और दो बेटे - हसन और हुसैन पर भी अत्याचार हुए| हुसैन को तो कायर यज़ीद ने कर्बला के मैदान में कत्ल कर दिया था|उनकी सबसे प्यारी चार साल की बच्ची सकीना को गले में रस्सी बांधकर पेश किया गया| वो इतनी मासूम सी बच्ची अपने बाबा के कटे सिर पर प्यार से हाथ फेर कर बोलती कि बाबा उठ जाओ मैं आ गयी| अपने बाबा को याद करते करते सकीना कारागार में ही चल बसी| या मौला, कैसा इंतेहा ले रहा है|"

अब मैं कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं था| मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या बोलूं| अली ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा " मैं शिया हूँ|पहले हम हिंदू थे आपकी तरह लेकिन नुन्द् ॠषि के वक़्त मेरे वालिद के वालिद के वालिद के वालिद मुसलमान हो गए| उस वक़्त हम पर काफी कर्ज़ था जो की मुसलमान बनते ही माफ हो गया था और तब से हम मुसलमान ही बने रहे|" अब मैं कुछ बोलने की हिम्मत जुटा चुका था सो मैंने कहा " जब तुम खुद पहले हिंदू थे तो आज क्यों कश्मीरी पंडितों को मारते हो? " अली ने कहा "जब हिंदुस्तान की तकसीम हुई थी तब भी कश्मीर में दंगे नहीं हुए थे| कश्मीर को पाकिस्तान और हिंदुस्तान से मुफ़्त का पैसा आता रहा जिसके कारण हम आगे बढ़ने की सोच ही नहीं पाए| कश्मीर का होना दोनों खित्तों के लिए फायदेमंद था जिसको फुटबॉल की तरह मारते रहो|कश्मीरी पंडितों को मारने का सिलसिला 1989 से शुरू हुआ जब अफ़गान की लडाई में रूसी हार कर वापस चले गए थे और मुजाहिद कश्मीर की तरफ़ आ गए जिहाद के लिए| उनकी ट्रेनिंग मज़हबी थी इसीलिए कश्मीर में गैर-मुसलमानो को मारना सवाब का काम हो गया| और जब मारने का पैसा मिले तो ये तो और भी अच्छा है|"

अली और मैं चले जा रहे थे|दो रातें निकल चुकी थीं | जूता फटने को हो रहा था|अली ने कहा " वो आगे जो पीला कपड़ा है ना ऊँचे डंडे पर, वहाँ ही शक्ति- पीठ है| तुम जाकर आ जाओ, मैं यहीं हूँ|" मैं जब उस डंडे के पास पहुंचा तो वहाँ एक किताब रखी थी जिसमें लोगों ने अपने नाम और इच्छायें लिखी हुई थीं| साथ में एक लंबा पत्थर था जिस पर काला तिलक जैसा कुछ था| मैं प्रणाम करके अपनी इच्छा किताब में लिख वापस अली की तरफ़ चल दिया|

अगले अंक में जारी......

Friday, May 6, 2022

वृत्तांत ८ भाग ५

गतांक से आगे.....

मूर्छा टूटने पर मैंने अपने आप को बड़े अस्पताल के बिस्तर पर पाया|मैं क़ाफ़ी कमज़ोर महसूस कर रहा था| पास में एक कांस्टेबल नर्स से ठिठोली कर रहा था|मुझे पंखे से लटकी लाश दिखाई दे रही थी| पास के बिस्तर पर मुह कटा चार हाथ वाला राक्षस लेटा था|ये क्या हो रहा है? मेरे बिस्तर पर सांप क्यों हैं? और.... और ये ज़मीन पर बिच्छू क्यों रेंग रहे हैं? मैं अब लेटा - लेटा ही बिस्तर से ऊपर क्यों उठा जा रहा हूँ? मैं चीखा " ओ ठुल्ले मुझे बचा ले|ओ बाई मुझे बचा ले, मैं गिर जाऊँगा|" किसी ने कुछ नहीं सुना|ये कौन है जो घोड़े पर बैठा हुआ वायु मार्ग से मेरी तरफ़ आ रहा है? लेकिन... ये तो..... ये..... ये तो घोड़े के धड़ पर मनुष्य का धड़ है!! ऐसा तो केवल कॉमिक्स में होता था या फ़िर यूनानी कथाओं में| क्या मैं मर गया हूँ? या फ़िर कोई सपना देख रहा हूँ? अचानक इतनी असहनीय अग्नि क्यों महसूस कर रहा हूँ? मेरा शरीर जल रहा है|मैं अलग खड़ा हो गया हूँ और चिता पर मेरा शरीर जल रहा है? हे प्रभु|हे मेरे गोविंद|मैं मर चुका हूँ!!

अब मैं कहाँ जाऊँगा? और ये आधा घोड़ा- आधा मनुष्य मेरे पास क्यों आ रहा है? क्या मुझे स्वर्ग ले जाया जायेगा या नर्क? अप्सराओं के बीच अंगूर खाऊँगा या खौलते तेल में उबाला जाऊँगा? इतना सोचते सोचते वह मनुष्य- घोड़ा मेरे निकट आ जाता है और कहता है- "तुंबरू जी ने आपको याद किया है|" अगले ही क्षण मैं एक पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर था जहाँ एक मनुष्य के शरीर पर घोड़े का सिर लिए सज्जन से जीव खड़े थे जिनके एक हाथ में वीणा और एक हाथ में पोथी थी|ये ही तुंबरू हैं|वे मुझे अपने साथ हवा में उड़ा चलते हैं उपर की ओर आकाश की ओर|जैसे जैसे हम ऊपर बढ़ते हैं वैसे वैसे पानी की कलकल सुनाई देने लगती है|अब मुझे सागर दिखाई देने लगता है और मैं अचंभित सा सागर में प्रवेश कर जाता हूँ|
ये सागर ही विचित्र है|एक तो आसमान में सागर और वहीं दूसरी तरफ़ उल्टे पेड़| जी हाँ आपने सही सुना - उल्टे पेड़| ऐसा पेड़ जिसकी जड़ आकाश की ओर तथा पत्ते और लताएँ नीचे की ओर|गाय, बकरियाँ, भेड़, शूकर, श्वान, सिंह, मृग इत्यादि जानवर अजीब से तरीके से उड़ रहे थे|मृग चले अश्व की तरह तो अश्व चले श्वान की तरह|सिंह चले बकरी की तरह और बकरी चले शूकर की तरह| सब उलट पुलट| 

अब तुंबरू जी मुझे सागर के अंधेरे इलाके की तरफ़ ले जाते हैं जहाँ से कुछ आवाज़ें आ रही थी| पास जाने पर वो आवाज़ें भयानक चीत्कार में बदल गया गयीं ऐसी आवाज़ें की जीवित मनुष्य अगर सुन ले तो आत्मा बाहर आ जाए| अब तुंबरू जी कहीं अंतर्धान हो गये थे और मैं अकेला ही उन चित्कारों की तरफ़ तेज़ी से बढ़ा जा रहा था| जब मैं वहाँ पहुंचा तो वहाँ पहुंच कर मुझे मेरे पूर्व कर्म दिखाई देने लगे|मैंने बचपन में एक श्वान को लकड़ी से पीटा था|वह बहुत चिल्लाया था|अचानक से मुझे लगा की मुझे किसी ने बहुत तेज़ चोट मारी है डंडे से| चोट इतनी भीषण थी कि मेरे मुख से चित्कार निकल गयी|अब मेरे समझ आ चुका था की यहाँ पापों का एहसास करवाया जा रहा है|मेरी चीत्कार ठंडी होती उससे पहले ही उस व्यक्ति का डरावना चेहरा मेरे समक्ष आ गया जिसको मैंने गलत माल बेचा था और जब वो माल बदलवाने आया था तो मैंने उसको भगा दिया था|उस डरावने चेहरे ने मेरे ज़हरीला बटका काटा और मैं जलने लगा| चीत्कारों से मेरा मुख सूख गया लेकिन रुदन रुका नहीं|

अब मुझे सुई सी चुभने का एहसास हुआ और किसी ने मेरे कान में कहा "मीठी गुड़ की डली और कड़वा मेरा पान, खाये जो 100 बरस जिये और फेंके तो दे दे अपनी जान|" ये तो उसी महिला की आवाज़ है जिसकी आवाज़ सुनकर मैं चौपड़ के पास सम्मोहित हो मूर्छित हो गया था| अब फिर से सुई चुभने का एहसास हुआ और मेरे बच्चे की आवाज़ आई "पापा उठो|" मेरी आँखे झपकी और मैंने देखा की मैं वहीं बड़े अस्पताल में बिस्तर पर हूँ|वो कांस्टेबल और नर्स भी वहीं थे लेकिन पंखे पर कोई लाश नहीं थी और ना ही पास वाले बिस्तर पर कोई राक्षस| मैं पहले जो देख रहा था वो सपना था या ये जो मैं अब देख रहा हूँ| मेरी रुलाई छूट गयी| मेरे घरवाले पहली बार मुझे रोते हुए देख रहे थे|

आगे जारी है.......

Monday, December 6, 2021

वृत्तांत -८ भाग -४

तीसरे अंक से आगे.......

पान वाले के पास से स्कूटर उठा कर मैं घर की तरफ़ चल दिया लेकिन घर जाने की इच्छा नहीं थी| मैंने स्कूटर नाहरगढ़ रोड़ की तरफ़ मोड दिया जहाँ मेरा एक दोस्त रहता था| रोड के अंतिम छोर से पहले मंदिर की दीवार के पास स्कूटर लगा कर पहाड़ी के दुर्गम रास्ते के दाँयी तरफ़ बनी एक झोपड़ी की तरफ़ चल दिया| वहाँ दुनिया भर का कचरा पड़ा था और शूकर मुँह मार रहे थे| तीन बकरियाँ भी अपनी किस्मत आज़मा रही थी के खाने को कुछ मिल जाए|मैं छोटे बड़े पत्थर सब लाँघ कर झोपड़ी की तरफ़ पहुंचा|बाहर पड़ी बाल्टी से चुल्लु भर कर हाथ धोया और अंदर गया| वहाँ मेरा कॉलेज का दोस्त रहता है जो कि उत्तर प्रदेश से पढाई करने जयपुर आया था 15 साल पहले और किस्मत ने आज उसे इस झोपड़ी में ला पटका| खैर, इस विषय पर बाद में चर्चा करेंगे पहले मेरे दोस्त से मिल तो लूँ|

 चार दियोँ की रोशनी से टिमतिमा रही फूस की झोपड़ी के अंदर जाने पर मैंने देखा कि ज़मीन पर मेरा दोस्त पत्थर की सिल्ली का सहारा लेकर बैठा था और पास में उसका बेटा चुन्नु सो रहा था| मैंने कहा "पंडित, क्या हाल हैं?" दोस्त झुंझलाकर बोला "अबे ओ सूदखोर बनिये, मरवायेगा क्या? किसी ने सुन लिया तो पकड़ा जाऊंगा| तू रफीक़ बोला कर मुझे| सबको यही नाम बता रखा है|" मैं हँस दिया| पंडित भी नरम पड़ मुस्कुराने लगा| मैंने कहा " यार आज बिल्कुल भी मन नहीं था घर जाने का तो तेरे पास चला आया|आज खाने का इंतज़ाम हुआ या फ़िर फाका कर रहा है?" दोस्त बोला "चुन्नु को खिलाने लायक रोटी तो मिल गयी थी और उस खानदानी तवायफ् ने अचार दे दिया था तो चुन्नु ने खा लिया|" मैंने कहा "और तूने कुछ नहीं खाया? " दोस्त बोला "कल इधर कुछ लड़के पार्टी करके गए थे तो उनके फेंके हुए मांस के टुकड़े और ब्रेड से काम चल गया|कल की कल देखी जायेगी|" मैं बोला "तू कब तक ऐसे जियेगा? दो साल से यहाँ छुपा हुआ है, भाभी भूख सहन नहीं कर पाने के कारण परलोक सिधार चुकी है, चुन्नु कमज़ोर होता जा रहा है, तू पंडित होकर मांस के टुकड़ों पर जी रहा है लेकिन कब तक? " दोस्त रुआंसा होकर बोला "यार, सब मेरी गलतियों से हो रहा है|भूख इतनी बड़ी चीज़ हो जायेगी कभी सोचा ना था| जब भी कुछ खाने को लाता था तो ललिता चुन्नु और मुझे खिला देती थी| बचा हुआ खाना बाद में खाने को कह कर बचा लेती थी और शाम को फ़िर चुन्नु को खिला देती थी लेकिन खुद भूखी रहती थी और मुझे कहती कि खा लिया| मेरे जीते जी मेरी पत्नी भूख से मर गयी और मैं सर पीटता रह गया|किसकी हाय लगी है मुझे|"

 इस गमगीन माहौल मैं अपने आप को सम्हालते हुए बोला "जो हुआ वो किसी के साथ भी ना हो पर अब तू कर भी क्या सकता है क्योंकि जो होना था सो हो गया| अब तू चुन्नु की सोच|सबसे पहले तो ये ख्याल छोड़ दे कि तेरे गाँव से अब कोई तुझे पकड़ने आयेगा यहाँ क्योंकि कोई नहीं जानता कि तू यहाँ है| तूने जिनको जान से मार डाला था उनके घरवाले अब तक थोड़े ही याद रखे होंगे तुझे और वैसे भी तू अपने किये की सज़ा भुगत चुका है इसलिए पुरानी बातें भूल कर नयी शुरुआत कर| मैं कल तुझे और चुन्नु को यहाँ से ले जाऊंगा, तुझे काम दिलवाउंगा और चुन्नु को स्कूल में दाखिला करवाउंगा| और अब कोई ना नुकुर नहीं चलेगी क्योंकि मैं फैसला कर चुका हूँ|" दोस्त चुपचाप सुन रहा था लेकिन कुछ बोला नहीं|मैंने उसके भाव पढ़ लिए थे कि वो मना करने का बहाना ढूंढ रहा था लेकिन मेरी ज़िद के आगे वो चुप हो चुका था| मैंने कहा " चाँददारा- पानदारा (साथ में लघु शंका जाने के लिए न्यौता देने का देसी कोड) "| दोस्त बोला" तू ही हो आ यार, मैं यादों की सवारी पर सवार हूँ| शायद कल यहाँ नहीं रहूँगा|" मैं उसका इशारा समझ गया था औरऔर खुशी से उसको कल दोपहर आने की कह कर अलविदा करके बाहर आ गया| अब मुझे लघुशंका के लिए साफ जगह चाहिए थी जो थोड़ी और उपर जाकर दिखती सो मैं पहाड़ी के उपर चल पड़ा|

आज का मूड ही सुपर चल रहा है| रात के 12 बज चुके हैं लेकिन घर से अब तक कोई फोन नहीं आया| मेरी तो किसी को चिंता ही नहीं है और हो भी क्यों, मेरे मरने पर बीमा का सारा पैसा जो मिलेगा|खैर, मैं ही फ़ोन करके बोल दूँ| मैंने अपना फोन निकाला तो 45 मिस्ड कॉल थे घर से| हरे राम| मैंने तुरंत फोन मिलाया और पत्नी के द्वारा फोन उठाते ही भजन- कीर्तन की जो मांगलिक बेला का आरंभ हुआ वह 10 मिनट तक चला और जल्दी से जल्दी घर पहुँचने के आंशिक मिथ्या वचन के साथ सुखद परिणाति को प्राप्त हुआ|

फोन रख कर मैं जल्द से जल्द घर के लिए रवाना होना चाहता था इसलिए मैंने तुरंत लघुशंका बाधा निवारण के लिए जगह ढूंढी और एक चट्टान पर विसर्जन कर उसे आधी रात को धन्य किया| रात बहुत मनमोहक थी| ग्यारस का चाँद और हल्की सी ठंडी हवा का झोंका जो बिरले ही कभी महसूस करते हों| टिमतिमाते तारे और मखमली आसमान में सफ़ेद लकीर का वो रॉकेट का धुंआ| अनंत आकाश को भेदने वाली वो उल्लू की आवाज़ें और पक्षियों की उबासियां| क्या प्राकृतिक नज़ारा छोड़ कंक्रीट के जंगलो में हमने अपने घोंसले बना लिए| प्रकृति के नयनाभिराम दृश्यों का रसास्वादन करते समय ही अचानक मेरी नज़र दूर एक महल की तरफ़ से कुछ जनानाओं के खिलखिलने की आवाज़ की तरफ़ गयी| मैं ना चाहते हुए भी उस तरफ़ देखने लगा जिस तरफ़ वे महिलाएँ जा रही थी| वे दूसरे रास्ते से नीचे उतर रही थी तो मैं भी झाड़ियों की ओट के सहारे उनके पीछे हो लिया क्योंकि जीवन की उथल पुथल से अलग हर चीज़ मुझे आकर्षित कर रही थी|

उन महिलाओं के वस्त्र पारंपरिक लग रहे थे जो कि महलों में पहना करते थे|रंग तो साफ़ नहीं दिख रहा था लेकिन छोटे छोटे काँच चमक रहे थे उनके घाघरे और चोली के|वे सब नीचे तालाब के रास्ते शहर की तरफ़ जा रही थीं| मेरा स्कूटर तो दूसरी ओर वाले रास्ते पर खड़ा था और अगर मैं जनानियों के पीछे जाता तो स्कूटर तक पहुँचना बहुत मुश्किल होता पर मैंने पीछा करना श्रेयस्कर समझा और मैं भी शहर के रास्ते चल दिया|सड़के बिल्कुल सुन्न थीं और चाँद की रोशनी से गुलाबी रंग जगमगा रहा था|वे महिलाएँ शहर के मुख्य दरवाज़े से अंदर आयीं और उनमें से एक छरहरे बदन वाली युवती ने खिलखिलाते हुए एक घर के दरवाज़े पर दोनों हाथों के पंजो से थपथपया और खिलखिलाते हुए आगे बढ़ गयी|किसी ने भी दरवाज़ा नहीं खोला और फ़िर एक और युवती ने वैसे ही तरीके से दरवाज़ा थपथपाया| इस बार दरवाज़ा खुला और एक अत्यंत बूढ़ा आदमी थाली में कुछ अनारदाने, खट्टी मीठी गोलियां, कुछ सूखे छुआरे और सूखी इमलियाँ बाहर रख कर वापस दरवाज़ा बंद कर अंदर चला गया| महिलाओं ने थाली में से सब उठा लिया और आगे बढ़ गयीं|

अब वे आगे के कई घरों पर थपथपा कर आगे बढ़ जातीं लेकिन रुकती नहीं थीं|कुल 9 महिलाएँ इतना खुल कर सड़क के बीचों बीच चल रही हैं और कोई इक्का-दुक्का आने जाने वाला उन्हें नहीं देख रहा था|कमाल ही है|उसी समय एक पुलिस की गाड़ी पीछे से आयी और उन महिलाओं के आर पार होकर निकल गयीं|ये क्या हुआ? गाड़ी आर पार? कोई चोट नहीं और सब कुछ पहले जैसा? वैसी ही चाल और वैसी ही खिलखिलहट! मेरे तो पैर जम गए|चौपड़ से 100 मीटर दूर मैं खड़ा ही रह गया और वो महिलाएँ चौपड़ के नीचे चली गयीं| तभी मेरे कान में एक जनानी आवाज़ आयी "मीठी गुड़ की डली और कड़वा मेरा पान, खाये जो 100 बरस जिये और फेंके तो दे दे अपनी जान|" मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो एक अत्यंत सुंदर से वस्त्रों में लिपटी कन्या कुमारी अपने मुख में पान का बीड़ा दबाये मुझे पलटी नज़रों से देखते हुए भागी जा रही थी| उसके मादकता भरे चक्षु मुझे मेरा नाम पुकारते लग रहे थे|नहीं! मैं नहीं जाऊँगा उसके पीछे|मेरे पीछे मेरी पत्नी और बच्चा है|नहीं|मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ गया है|मुझे घर जाना है|मुझे सब घूमता हुआ दिखाई दे रहा है|अंततः मैं मूर्छित होकर गिर पड़ा|

आगे जारी है.........

Monday, November 15, 2021

वृत्तांत-८ भाग-३

पिछले भाग से आगे जारी. .....

मैं तेजी से स्कूटर दौड़ाता हुआ जा रहा था कि दो चौराहा आगे मुझे पंडो का एक समूह रेलवे स्टेशन की तरफ़ जाता हुआ दिखा| मैंने अपना स्कूटर धीरे किया और उनकी तरफ़ घुमा दिया| नुक्कड़ पर पान वाले के पास स्कूटर खड़ा करके मैं उनके पीछे हो लिया| मैंने उनसे कोई बात शुरू नही की लेकिन उनकी बातें सुनने लगा| उनमें से एक व्यक्ति बहुत ही उम्रदराज थे और अँग्रेजी-हिंदी मिश्रित बोल रहे थे वहीं दूसरी ओर एक युवक उनसे कुछ पूछ रहे थे जिसका उत्तर वे वृद्ध व्यक्ति दे रहे थे| मेरे हिसाब से वो युवक शायद कोई पत्रकार थे और वो वृद्ध व्यक्ति कोई संत| वृद्ध व्यक्ति कह रहे थे " हिंदू एक भौगोलिक स्थिति को भी दर्शाता है, पंथ-संस्कार को भी दर्शाता है और रक्त सम्मिश्रण को भी| जब इन तीनों अभिलक्षण को मिला दिया जाता है तो हिंदुत्व की उत्पति होती है| जो पंथ-संस्कार को ही मानते हैं वो हिंदू-धर्म को ही मान रहे हैं लेकिन भौगोलिक स्थित एवं रक्त सम्मिश्रण के प्रति उनके विचार अलग हैं इसलिए वो हिंदुत्व का समर्थन नहीं करते हैं और 'हंटर हिंदुइसम्' (Hunter Hinduism) के नाम से संबोधित किया करते हैं|" युवक ने पूछा " क्या हिंदुत्व को 'हंटर हिंदुइसम्' कहा जा रहा है?" वृद्ध व्यक्ति ने कहा " नहीं| हिंदुत्व एक तार्किक मान्यता है जबकि इस मान्यता को चाबुक अथवा कुतर्कि हिंसा के ज़ोर पर मनवाने वाले गैंगवादी लोगों के कुकृत्यों से यह हंटर हिंदुइसम् का रूप धारण कर लेता है|" युवक ने फ़िर पूछा " मुझे क्या मानना चाहिए: हिंदू-धर्म या हिंदुत्व या हंटर हिंदुइसम्? " वृद्ध ने कहा " मान्यता किसी के कहने से मानो तो फ़िर हिंदू होने का लाभ ही क्या हुआ? किसी को ना मानना भी हिंदू-धर्म की सुंदरता को दर्शाता है| वहीं अगर पित्रभूमि और पुण्यभूमि के प्रति भी आसक्ति है तो हिंदुत्व उपलब्ध है लेकिन ध्यान रहे की हिंदुत्व की डगर बहुत संकरी है जिसके एक तरफ़ आत्मबोध है तो दूसरी तरफ़ हंटर-हिंदुइसम्|"

मैं अब पागल होने वाला था|अपना सिर पकड़ कर मैं खिलौनों की दुकान के बाहर बनी सीढ़ी पर बैठ गया| थोड़ा सोच कर उठा और दुकान के अंदर चला गया| इधर उधर खिलौनों पर नज़र दौड़ाई ताकि समय काट सकूँ| ग्राहक देख कर मालिक ने पूछा " बच्चा कितने साल का है? " मैंने अनमने कहा " सात साल का |" दुकान्दार ने फ़िर पूछा " कितने बजट का दिखाऊँ?" मैंने कहा "बजट की तो समस्या नहीं है लेकिन ये सब तो चीनी लग रहे हैं| मेड इन इंडिया दिखाइये|" दुकान्दार ने घूर कर देखा और कहा "भाईसाहब| ये सारा माल चीन से ही आता है और आपको हर जगह ये ही मिलेगा|" मुझे कुछ खरीदना तो था नहीं तो मैंने कहा "मैं एक देशप्रेमी हूँ, चीन का माल नहीं खरीदूँगा|" दुकान्दार खिसियता हुआ अपने गल्ले के पास चला गया और बड़बड़ाने लगा| मैं भी वापस जाने लगा तो एक पोस्टर पर नज़र गयी जिसमें गौ सेवा संस्थान ने दान पुण्य के लिए रेट लिस्ट लगा रखी थी जिसके तहत गुड़ सेवा के 1100/- रुपये, बाजरा सेवा के 2100/- रुपये और तिल्ली तेल के 3100/- रुपये के सहयोग के लिए संकल्प मांगा गया था| मैंने 2100/- का पेटीएम डाल दिया और जाने लगा| दुकान्दार ने रोका और पूछा " भाईसाहब, एक बात पूछनी थी| आपने इस मंदी में भी 2100/- का पेटीएम डाल दिया बिना ये पूछे की ये पैसा वाकई में गौ सेवा में ही लगेगा या नहीं!? " मैंने कहा " आज मेरा मूड खराब था, समय काटने आपकी दुकान में घुस गया और बिना सोचे जाने ही दान भी कर दिया| मनुष्य चरित्र बड़ा विचित्र है| एक तरफ़ तो मैंने देशप्रेम की भावना दिखा कर आपके माल को दरकिनार कर दिया और वहीं दूसरी तरफ़ बिना जाने दान कर डाला|गाय एक बहुत उपयोगी पशु है और हमारे समाज में पूजनीय भी तो मैंने जेब ढीली कर दी| गाय हमारे लिए इतनी पूजनीय है कि उसके मांस और चमड़े के निर्यात के व्यापार पर कब्ज़े के लिए 'हंटर' पागल हो उठे|" दुकान्दार के कुछ समझ नहीं आ रहा था पर वो यह समझ गया था की बहस नहीं करनी है वरना चिल्लम-चिल्ली हो जाएगी| उसने एक चमकने वाला लट्टु और रस्सी दिया मेरे बच्चे के लिये और कहा " गौ माता आपके परिवार को हमेशा प्रसन्न रखे|" मैं धन्यवाद कर दुकान के बाहर आ गया और धीमी गति से पान वाले की तरफ़ बढ़ गया जहाँ मेरा स्कूटर खड़ा था|

आगे जारी है ........

Saturday, October 16, 2021

वृत्तांत ८ - भाग २

प्रथम भाग से आगे........ 

घर जाते समय मेरा ध्यान अकस्मात् ही उस मंदिर की तरफ चला गया जिसके बारे में साडू साहब ने बताया था| लाल बत्ती पर दो मिनट रुकना था तो मैं स्कूटर पर बैठे-बैठे ही अंदर झांकने लगा|मुख्य पट बंद थे और काफी लोग पट खुलने के इंतज़ार में खड़े थे|खड़े हुए लोगों की पीठ मेरी तरफ थी इसलिए किसी का चेहरा नहीं देख सकता था|तभी अचानक से मेरा ध्यान मंदिर के पास वाली अंधेरी संकरी गली की तरफ़ गया जिसमें से मौलवी साहब निकल कर मंदिर के विपरीत दिशा की ओर बढ़ गए और बीस सेकेंड में आँखों से ओझल हो गए| ये वो ही मौलवी साहब थे जो मेरे मकान का सौदा लेकर मेरी दुकान पधारे थे| इतने में बत्ती हरी हो गयी और मैं निकल पड़ा अपने घर एक नई उधेड़बुन के साथ| 

अगले दिन सुबह डेयरी पर दूध ख़रीदते समय मुझे मस्जिद की सफाई करने वाला मिला|वो भी दूध खरीदने आया था|डेयरी वाले ने मज़ाक में कहा "मियाँ, आज दूधवाला नहीं पहुँचा मस्जिद में जो हमारी डेयरी पर आये हो? अगर गाय का मांस चाहिए हो कहीं और जाना पड़ेगा|" सफ़ाईवाला हंस दिया और दूध खरीद कर चल पड़ा|मैं भी उसके पीछे चल दिया और थोड़ा आगे जाकर गली की घूम पर उसको आवाज़ देकर रोक लिया|मैंने कहा" यार जुम्मन, एक बात तो बता|कल तेरे मौलवी को मंदिर के पीछे वाली गली से निकलते देखा था लेकिन समझ नहीं आया कि वो वहाँ गए क्यों थे?" जुम्मन बोला " मौलवी साहब का तो आना जाना है वहाँ काफी|ज़मीन जायदाद के मामले रहते हैं जो ये आपस में सुलझाते हैं|आप और हम तो गाय-गोबर ही करते रह गए और ये अल्लाह को ठेके पर बेच आये|" मैंने कहा " क्या बे बावली टांट|कुछ भी बके जा रहा है| तुझे तो रोकना ही ग़लत हो गया|सारा दिन ख़राब जायेगा अब|" मेरी झाड़ खा कर सफ़ाईवाला अपने रास्ते निकल गया और मैं अपने रास्ते चला गया| 

दिन भर मेरा बकवास निकला और दो हज़ार का काम करके वापस सांय को अपने घर चल दिया|आज पूरा ध्यान मंदिर पर था और बत्ती लाल हुए बिना भी स्कूटर किनारे लगा कर मंदिर में ताका झांकी करने लगा| आरती का समय था तो सब ध्यान में लीन थे|तभी मेरा ध्यान लाल बुशट के आदमी पर पड़ी जो कि जाना माना हिस्ट्रिशीटर था और अटकी ज़मीनो की सौदेबाज़ी करवाता था|मैं अपना स्कूटर और थैला वहीं छोड़ मंदिर के अंदर चल पड़ा| मेरा पूरा ध्यान हिस्ट्रिशीटर पर था|वह माथे पर तिलक लगा कर परिक्रमा के लिए पीछे गया और दस मिनट बाद बाहर आया|मुझे कुछ समझ नही आया और मैं भी परिक्रमा के लिए अंदर गया और दस सेकंड में बाहर आ गया| कुछ समझ नहीं आया|अब तक मंदिर के पट बंद होने का समय हो गया था और इक्का दुक्का लोग ही प्रांगण में रह गए थे| मेरा मन नहीं मान रहा था जाने के लिए लेकिन जाना तो था|मैंने फिर परिक्रमा के लिए कदम बढ़ाये और पीछे मत्था टेक कर आगे बढ़ने लगा| तभी ताला लगे कमरे से आवाज़ सुनाई दी तो मैं ठिठका और गौर से सुनने की कोशिश करने लगा| अंदर से एक भारी आवाज़ आ रही थी " देखो, तुम चाहे कुछ भी कहो लेकिन इस ज़मीन का 1 करोड़ से ज़्यादा नहीं होता है|कितनी मेहनत की है हमने ये हमें पता है| आप तो जिंदगी भर खाली नहीं करवा सकते थे| एक बीघा भले ही है लेकिन दस करोड़ का माल कहीं से नहीं है|" एक रूआँसि आवाज़ उठी और बोली " महाराज|आपने तो जबरदस्ती वहाँ पत्थर की मूर्ति रखवा दी और दीया बत्ती करवाने लगे| हमारी बात तो केवल ज़मीन मुक्त करवाने की थी लेकिन अब आप उसको खरीदने को आतुर हो रहे हैं|ये तो अन्याय हो रहा है| मुझे उस ज़मीन के दस करोड़ मिल रहे हैं और अगर आप खरीदना चाहते हैं तो मुझे इतने दिलवा दीजिये|" भारी आवाज़ ने कहा " सुन सेठ| अब वहाँ ठाकुर जी की पूजा होगी और तू दुनिया की किसी भी कचहरी में चला जा, ये ज़मीन ठाकुर जी की ही रहेगी|एक करोड़ तेरे हैं कभी भी ले जाना लेकिन धर्म के आड़े कभी मत आना| तेरा हर काम निकाला है ठाकुर जी ने और आगे भी निकालते रहेंगे| तेरे माल की गाड़ी कभी अटकी? तेरे पास ख़रीदार की कभी कमी हुयी? एक धरती के टुकड़े के लिए मत रो|अलीपुरा में एक मौके का सौदा आया है|उसका मालिक कोई छोटा सा टाइलवाला है जिसमें अधिक पुदीना नहीं है|वो मकान नहीं बेच रहा है मौलवी को तो तू दिलवा दे|मौलवी डेढ़ करोड़ देगा| बाकी तू समझदार है|" 

इतना सुनकर मेरी रूह काँप उठी|मैं भागा और स्कूटर उठा कर रवाना हुआ| ये लोग मेरे ही पुराने वाले मकान की बात कर रहे हैं जिसका सौदा वो मौलवी लेकर आया था|तो क्या ये मौलवी..... मंदिर...... हिस्ट्रीशिटर... सब मिले हुए हैं? ये सब क्या हो रहा है? मैंने स्कूटर की गति बढ़ा दी|

आगे जारी है।......... 

Thursday, September 30, 2021

वृत्तांत - ८

नमस्कार साथियों, आज मैं फिर उपस्थित हूँ आपके सामने एक नये वृत्तांत के साथ जो कि मेरे एक मित्र ने मुझे सुनाया जो कि अक्षरक्ष: आपके समक्ष प्रस्तुत है:-

मैं वही एक अदना सा व्यापारी जो समय समय पर अपने आस पास होने वाली घटनाओं को आपसे साझा कर लेता हूँ| पिछले कुछ महीनों से मेरा काम बहुत कम हो गया था| बिक्री दस प्रतिशत ही रह गयी थी जबकि तीन दुकान आगे कालूराम की दुकान बड़ी अच्छी चल रही थी जो कि मुझसे समान खरीदकर ग्राहकों को महंगा बेचा करता था| मेरे पास तो माल ना बिके जबकि वो ही माल दूसरा दूकान्दार बेच रहा है ज़्यादा क़ीमत लेकर| ये गड़बड़ समझ नहीं आती|कहीं किसी ने टोटका तो नहीं कर दिया मेरी दुकान पर? शायद इस कालूराम ने ही मेरी दुकान बांध दी है वरना चलता हुआ धंधा कैसे रुक गया मेरा? इतने में मेरे साडू साहब दुकान पधारे और मुझे परेशान देख कर पूछ बैठे "क्या हुआ कंवर साहब, इतने उलझन में क्यों दिखाई दे रहे हो? सब ठीक तो है ना?" मैंने उनकी बात जवाब देते हुए कहा " क्या बताऊँ बड़े कंवर साहब, धंधा तो पाताल लोक चला गया है मेरा| मेरे यहाँ ग्राहकों का अकाल पड़ रहा है और वहाँ तीन दुकान आगे वो कालूराम चाँदी काट रहा है| मेरी दुकान को नज़र लग गयी है|" बड़े कंवर साहब कुछ सोच में पड़ गए और बोले "कँवर साहब मेरे पास अचूक रामबाण है लेकिन आप किसी को नहीं बोलेंगे ये बात|" मैंने तुरंत हामी भर दी| दुकान पर काम के लिए रखे लड़के को डमरुलाल का समोसा और चाय लेने भेज दियादिया और ध्यान से बड़े कंवर साहब की बात सुनने लगा|

बड़े कंवर साहब ने पूछा " कौनसे मंदिर जाते हो? " मैंने बता दिया| बड़े कँवर साहब हंस दिये और बोले " अब उस मंदिर के महंत में दम नहीं रहा| उनके पिताजी यानी बड़े महंत साहब तो जिस दिन विदा हुए दुनिया से उसी दिन से मंदिर कमज़ोर हो गया| बड़े महंत जी ने चढ़ावे का सारा पैसा ब्याज पर चला रखा था झर्जहोला वाले परिवार के द्वारा जिसकी कोई लिखा पढ़ी नहीं हो रखी थी| बड़े महंत विदा हुए और सारा पैसा हजम| अब नये महंत साहब को नये सिरे से सब करना पड़ रहा है जिसके कारण अब जान-पहचान के प्रभावशाली लोगों का ध्यान दूसरे शक्तिशाली महंत के मंदिर में लगने लगा है ताकि उनके अटके काम निकल सकें जिसे बदले में वो बड़ा चढ़ावा चढ़ा आते हैं| महंत शक्तिशाली होंगे तो चमत्कार भी बड़े होंगे और सबका काम निकलने लगेगा| आप चौराहे से तीन गली आगे कोने वाले मंदिर में जाया करें अब|वहाँ सारी इच्छायें पूरी होती हैं|आप जब वहाँ जाएँ तो केवल दर्शन या परिक्रमा ही ना करें बल्कि पुजारी एवं उनके शिष्यों से भी जानकारी बढ़ाना शुरू करें| उनसे चलाकर कहें कि आपका काम नहीं चल रहा है, बड़ा दुखी हूँ महाराज, क्या करूँ? वो आपको बाद में आने को कहेंगे| आप बाद में जाना और दीन हीन स्थिति में उनको अपनी बात कहना और सबको महाराज कह कर ही संबोधित करना है| वो आपको कुछ खास तरह का उपाय बतायेंगे जैसे की किसी देवता की फोटो अपनी दुकान में लगाने के लिए या फ़िर कोई खास तरह की अंगूठी पहनने के लिए| वो जो भी बोले आप कर लेना| एक बात का और ध्यान रखना, अगर मुख्य पुजारी आपसे बात कर रहे हैं तो पैसा दान पेटी में डालना क्योंकि वो सीधे पैसा लेना अपमान समझेंगे लेकिन अगर कोई शिष्य हो तो 2100/- रुपये बिना देर किये दक्षिणा पकड़ देना| अब आप एक समय बांध लेना और उसी समय मंदिर जाना ताकि आप उनकी नज़र में रहो| ऐसा आप एक महीने तक करना फ़िर मुझे बताना|"

मैंने बड़े अचरज के साथ उनकी पूरी बात सुनी और बिना हिचक के हामी भर दी| इतने में दुकान का लड़का समोसा और चाय ले आया और हमने इधर उधर की बातें करके खाने पीने का लुत्फ़ उठाया| एक घंटे बाद साडू साहब विदा हुए और मैं ग्राहकों का इंतज़ार करने लगा और साथ ही सोचने लगा कि मेरे साडू साहब अपना मानसिक संतुलन खो चुके हैं जो ऐसी बहकी हुई सलाह दे गए| मंदिर तो हमारी मानसिक संतुष्टि और चित्त को शांत करने के लिए होते हैं|मेरा काम तो पहले भी बिना किसी महंत या पुजारी के चलता ही था| मंदिरो की पवित्रता को ब्याज बट्टे से जोड़ना अक्षम्य अपराध है और मैं अपने साडू साहब की उजड़ी बुद्धि के ठीक हो जाने के लिए इन्ही के सुझाए मंदिर में इनके नाम का प्रसाद बोल कर आऊंगा|

इतना सब सोचते हुए कब सांझ ढल गयी मालूम ही नहीं चला| गोधूलि बेला के बाद रात्रि आहट पर मैं दुकान मंगल कर बिना बोहनी किये घर रवाना हो गया|

वृत्तांत जारी है...........

Wednesday, May 26, 2021

वृत्तांत-७

नमस्कारl साथियों, आज फिर प्रस्तुत हूँ आपके सामने एक वृत्तांत लेकर जो मेरे मित्र ने सुनाया और अब मै आपको सुना रहा हूँ| निम्नलिखित है वृत्तांत:-

मैं वही प्लंबिंग एवं सैनट्री एक छोटा सा दुकानदार जो महामारी की दूसरी लहर के कारण सरकारी आदेश की पालना करते हुए घर पर बैठा है और पुरानी कमाई से घर खर्च चला रहा है| अब तो समय व्यतीत ही नहीं होता है| पत्नी और बच्चे से कितनी और क्या बात करें|पत्नी की बातें घरेलू मुद्दों पर केंद्रित रहती हैं जिसमें मुख्यतः रसोई, गद्दे के कवर, पर्दे, गहनों की पॉलिश, बच्चे की शिक्षा, नकद की गिनती, फोटो एल्बम, जेठानी और ननद के किस्से, पड़ोसी के घर की अंदरूनी जानकारी एवं अपने पीहर वालों की बढ़ाई शामिल है| इसी तरह 7 साल का बच्चा भी अपने ही अलग आयाम में घूमता रहता है जिसमें खेलकूद, कार्टून इत्यादि मुख्य है| मैं काम-धंधे और राजनीतिक बातों में अधिक रुचि रखता हूं इसीलिए दूरभाष पर अपने मित्रों से समसामयिक मुद्दों पर मंथन करता रहता हूँ| इसी तरह आज मेरे एक बहुत पुराने मित्र से मेरी वीडियो वार्ता हुई जो मैं आपको बताने जा रहा हूँ| 

मेरा मित्र आशीष पाली जिले में पला बढ़ा और जयपुर में कॉलेज की पढ़ाई करके दिल्ली नौकरी के लिए चला गया|शुरू से ही वह एक संस्था से जुड़ा हुआ था जिसके सामाजिक कार्यो में वह बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेता था और आज भी लेता है| हमारी वार्ता के मध्य में संस्था का स्मरण हुआ तो बात चली| मेरे मित्र ने कहा "यार, तू इतना समझदार होकर भी हमारी संस्था से क्यों दूर है? तेरा आधार नंबर दे, अभी जोड़ देता हूँ|" मैंने कहा " रहने दे भाई|मेरे पास काम धंधे से कहाँ फुर्सत है जो तेरी संस्था को समय दे पाऊँगा|" मित्र ने कहा "क्या बे, तू फ़िर से घुमा फिरा कर टाल रहा है मुझे|सच सच बता, तू आना क्यों नहीं चाहता हमारी संस्था के साथ? " मैंने कहा "देख भाई, सच तो ये है की तुम्हारी संस्था का सामाजिक सरोकार से कोई लेना देना नहीं है|तुम भले ही समाज सुधार का चोगा पहने हुए हो लेकिन तुम कभी भी सुधार की तरफ नहीं बढ़ पाये|" मित्र ने पूछा "वो कैसे? हम तो हमेशा राष्ट्र और समाज के उत्थान में तत्पर रहे हैं|" मैंने कहा "चल इतिहास से चालू करते हैं|तुम्हारी संस्था बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में बनी लेकिन स्वतंत्रता संग्राम के किसी भी आंदोलन में तुम्हारी संस्था ने भाग नहीं लिया बल्कि अपने कार्यकर्ताऔं को मना भी किया भाग लेने से|भले ही पूरा देश ग़ुलामी की ज़न्जीरों से मुक्ति के लिए असहयोग आंदोलन कर रहा हो, नमक बनाकर विदेशी ताकत को ललकार रहा हो, 'भारत छोड़ो आंदोलन' कर रहा हो, भारत के संविधान पर मंथन कर रहा हो लेकिन तुम्हारी संस्था हमेशा अंग्रेज़ों के साथ खड़ी होकर गद्धारी का झंडा फहराती रही|" मित्र ने कहा "यार तू बहुत भोला है| जो कुछ भी तूने कहा है वो सब ग़लत है| दरअसल, जिन आंदोलनों की तू बात कर रहा है वो तो कांग्रेस के आंदोलन थे जो की उस बुड्ढे गांधी और उस मुसलमान नेहरू की सोची समझी साज़िश का हिस्सा थे|ये तो सब जानते हैं की गांधी और नेहरू लड़कीबाज थे और मुसलमानों को अत्यधिक प्रेम करते थे|" मैंने कहा "यही तो समस्या है तुम्हारी संस्था की| इतना झूठ बोलते हो की सच लगने लगता है| ना तो गांधी लड़कीबाज थे और ना ही नेहरू मुस्लिम|गांधी ने जो प्रयोग किये थे वो खुद सबके सामने खुली किताब की तरह रखे हैं जिसमें वो बताते हैं की कैसे उन्होंने ब्रहम्चर्य को परखा और जाना|जहाँ तक रही नेहरू की, तो मैं ये बता दूँ की किसी महिला से ठिठोली करते हुए फोटो से ये बात नहीं कही जा सकती की वो लड़कीबाज है और मैं ये फोटो वाली बात इसलिए कह रहा हूँ कि तुम्हारी संस्था के पास नेहरू के खिलाफ़ फ़ोटो के अलावा और कुछ भी नहीं है लड़कीबाज वाले लेबल के लिए|अब बात कर लेते हैं नेहरू के मुसलमान होने की तो मैं ये बता दूँ की तुम्हारी संस्था के पास एक भी ऐसा सबूत नहीं है जिससे यह पता चल सके की नेहरू मुसलमान थे|चलो मैं ये बात एक बार मान भी लूँ की गांधी लड़कीबाज थे और नेहरू मुसलमान थे तो भी तुम्हारी संस्था अपना अलग आंदोलन कर सकती थी जैसे सुभाष चंद्र बोस ने कर रखा था,लेकिन सच तो ये है कि तुम्हारी संस्था के लोगों ने अंग्रेज़ों से करार कर रखा था की तुम भारत के किसी भी स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में भाग नहीं लोगे|गद्दारी करके खुद को राष्ट्रवादी कैसे कह सकते हो? तुम्हारी संस्था का एक भी व्यक्ति आज़ादी की लड़ाई में ना तो जेल गया ना ही शहीद हुआ|ऊपर से,खुद को मुसलमान विरोधी बोलते हो और खुद ही अपने उस परममित्र संगठन का समर्थन करते हो जिसने सिंध प्रांत में 1939 मेंमें सरकार बना ली थी मुस्लिम लीग के समर्थन से जिसका भी कोई नहीं गया जेल और ना शहीद हुआ|सच तो ये है कि तुम्हारी संस्था और मुस्लिम लीग एक ही जैसे लोगों से भरी हुई थी,बस पंथ अलग थे|जो नफ़रत वो मदरसों में सिखाते थे,तुम लाठी पकड़ाकर गली कूचों में सिखाते थे|और एक बात, तुम्हारी संस्था के
परममित्र संगठन के अध्यक्ष साहब अंग्रेज़ों से चार बार माफीनामा लिख कर जेल से छूटे थे और बाहर आकर साठ रुपये महीने की पगार पर अंग्रेज़ों के लिए मुखबिरी करते थे|अब और क्या बोलूँ, तुम्हारी संस्था तो तिरंगे को भी आत्मसात नहीं कर पाई तो फिर इस देश की आत्मा को समझना तो बहुत दूर की बात है|"

मेरे मित्र ने कहा "यार तू भी मुसलमान बन गया है क्या जो उन लोगों की तरह बात कर रहा है? या फिर किसी इस्लाम परस्त गुट ने तुझे बरगला दिया है? देशभक्त बनो ना कि गद्दार| जब ये लोग तुझे मारने आयेंगे तब हम ही बचाने आयेंगे| ये लोग किसी के सगे नहीं हैं|" मैंने कहा "यार, तू तो बिल्कुल रेडियो की तरह बोल रहा है|मैंने जो इतना सब कुछ बोला तेरी संस्था की गद्दारी के लिए, उसको तो तूने हवा में उड़ा दिया और ले-दे कर मुसलमानों पर आ गया| मेरी मुसलमानों से कोई यारी वगैरह नहीं है और इस्लाम को मैं एक विध्वंसक पंथ मानता हूँ जिसने तबाही के सिवाय कुछ नहीं किया लेकिन इसका मतलब ये बिल्कुल भी नहीं है कि मैं तुम्हारी संस्था के झूठ और मक्कारी भरे कामों को सही ठहरा दूँ|तुम लोग दरअसल सनातन धर्म को समझ ही नहीं पाए और हिंदू राष्ट्रावाद का राग अलापने लगे|जैसे मदरसे इस्लामी राष्ट्रावाद पढ़ाते हैं जिसमें वो बच्चों को भारत को एक इस्लामी राष्ट्र में तब्दील करने के लिए उकसाते हैं वैसे ही तुम्हारी संस्था हिंदू राष्ट्रावाद पढ़ाती है जिसमें भारत को हिंदू राष्ट्र में परिवर्तित करने की बात करते हो|"

मेरे मित्र ने कहा" यार, जब तू खुद इस्लाम को विध्वंसक मानता है तो फिर दिक्कत कहाँ है भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने में?" मैंने कहा " देख भाई, तुम लोगों ने सनातन धर्म को एक साँचे में ढालने की कोशीश की है जो कि बिल्कुल ग़लत है|सनातन धर्म कई शताब्दियों से बदलता रहा है और हर बदलाव को आत्मसात् करता आया है|हमने खुद को किसी भी ग्रंथ में बांध कर नहीं रखा और खुले विचारों से दर्शन करते रहे फिर चाहे वो महावीर के विचार हों, बुद्ध के हों या गुरु नानक के|कोई भगवान को मानता है तो कोई नहीं मानता|कोई, शिव को मानता तो कोई विष्णु को तो कोई उनके अवतारों को लेकिन कभी भी किसी को जबरदस्ती नहीं मनवाया|सनातन धर्म का मतलब ही अनादि -अनन्त है और आप लोग इसका आदि- अंत अपने मतलब के अनुसार परिभाषित करते हो|हिंदू एक भौगोलिक स्थिति पर आधारित नाम है जो पूरे सनातन धर्म के लिए अपूर्ण है|आपके हिंदुत्व की परिभाषा मुसलमानों के आक्रमण से शुरू होती है और उनके पतन के साथ समाप्त हो जाती है| मैं इस्लामी चश्मे से सनातन धर्म को नहीं देखता इसीलिए मैं आपकी संस्था से नहीं जुड़ता|तुम्हारी संस्था वर्ण-व्यवस्था की हितैषी है इसलिए सामाजिक स्थिरता कभी नहीं हो पायेगी| तुम्हारी संस्था वापस दो हज़ार साल पीछे चले जाना चाहती है जब स्कूल नहीं आश्रम होते थे, जब मोटर वाहन नहीं बल्कि बैलगाड़ी होती थी, जब लोकतंत्र नहीं बल्कि राजशाही होती थी और जब औरतें घर और खेतों तक ही सीमित थी|"

मेरे मित्र ने कहा"भाई, तू नक्सली हो गया है और इसीलिए देशद्रोह करने पर आमादा है| अभी भी समय रहते आजा हमारे साथ|" मैंने कहा "तुम्हारी संस्था को बुनियादी सोच बदलनी होगी अगर मुझे अपने साथ जोड़ना है तो वरना जो है सो है|" मित्र ने कहा "भाई, खतना मुबारक हो| जय हिंद,जय भारत|" इतना कह कर हमारी वीडियो वार्ता समाप्त हुई और मैं दोपहर के खाने के लिए रसोई की तरफ़ बढ़ चला|

तो मित्रों, ये था मेरे एक मित्र द्वारा किया गया एक वर्णन उनके जीवन के दैनिक वृत्तांत में से एक|मैं फिर मिलूँगा आपसे एक नये वर्णन के साथ| प्रणाम|

Saturday, March 13, 2021

वृत्तांत 6 - उम्माह

नमस्कार साथियों | आज फिर मैं आपके समक्ष प्रस्तुत हूँ एक बिल्कुल अलग वृत्तांत लेकर जो आज के सामाजिक ताने बाने को दर्शाता है | यह वृत्तांत मुझे मेरे मित्र ने सुनाया जो कि अक्षरक्षः निम्नलिखित है :-
 
मैं वही एक अदना सा प्लम्बिंग एवं सैनेट्री का छोटा सा व्यापारी जो कि दिन भर मजदूरी करके अपने परिवार का पेट पाल रहा है |अन्य दिनों की तरह ही कल भी मैं दोपहर का भोजन करके अपनी कुर्सी पर ऊंघ रहा था | तभी कुछ दूर स्थित एक मस्जिद के मौलवी साहब का दुकान आना हुआ | मैं उनके आदर में उठ खड़ा हुआ और उनका हाथ जोड़कर अभिवादन किया जिसका उनकी तरफ से कोई उत्तर नहीं दिया गया | ख़ैर, मैंने उनको कुर्सी पर बैठाकर अपनी कुर्सी संभाली और उनकी खैरियत पूछी और उन्हे चाय कॉफी पूछी जिसका भी उन्होने कोई प्रत्युत्तर नहीं दिया | उन्होंने अपने आने का प्रयोजन साफ करते हुए कहा " मियाँ, हमने सुना है कि भट्टा बस्ती इलाके में आपका एक मकान है 650 गज में जो कि आप निकलना चाहते हैं |" मैंने कहा "आप ने बिल्कुल सही सुना है लेकिन उस मकान की सही कीमत नहीं मिल रही है |" मौलवी साहब बोले " मियाँ, जो मिल रहा है ले लो क्यूँकि आसपास के सारे मकान मुसलमानों के हो चुके हैं और आपका मकान भी अब कोई मुसलमान ही खरीदेगा |"

मैं थोड़ा सकुचाते हुए बोला " जनाब गुस्ताखी माफ लेकिन मैं और आप एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं और कोई भी पंथ का व्यक्ति मेरा मकान खरीदने के लिए आ सकता है |" मौलवी साहब हंसते हुए बोले "बर्खुरदार, ये सब बराबरी वाली बातें आप पर फबती हैं, हम लोग तो वहीं रहना पसंद करते हैं जहां हमारे लोग रहना पसंद करते हैं | आप अगर ये सोचते हैं कि आपकी कौम का कोई आदमी वह मकान 3 करोड़ में खरीद लेगा तो कयामत तक इंतज़ार करके देख लीजिएगा | आपको हमारे लोगों को ही अपना माल बेचना होगा| जैसे जैसे कॉलोनी के दूसरे मकान हम खरीदते जाएंगे, वैसे-वैसे आपके मकान की कीमत गिरती जाएगी |मैं आपके पास 2 करोड़ की पेशकश लाया हूँ | आधा कैश अभी तुरंत और आधा डिमांड ड्राफ्ट रजिस्ट्री के वक़्त | बोलिए |" मैंने कहा " आप तो बिल्कुल ग़ैरवाजिब कीमत लगा रहे हैं | 3 करोड़ से नीचे तो कीमत ही नहीं है उस मकान की |" मौलवी साहब बोले "जनाब आप मौके की नज़ाकत को नहीं समझ पा रहे हैं |आज मैं खुद आपके पास चलकर आया हूँ इसलिए 2 करोड़ दे रहा हूं | खुदा ना खास्ता आप आज ना कर देते हैं तो कल कम से कम 2 करोड़ तो नहीं मिलेंगे और दलाली देनी पड़ेगी सो अलग |" मैंने कहा" ये तो सरासर दादागिरी है, मेरी मर्ज़ी मैं कितने में भी बेचूं और मैं चाहूंगा तो ये कभी बिकेगा ही नहीं |" मौलवी साहब बोले" ये तो और भी अच्छा है|" मैं सकते में आ गया और बोला" आपकी कौम पहले जहां कम संख्या में होती है वहां तो अच्छा बन कर रहते हो और जहाँ तादात बढ़ जाती है वहाँ दादागिरी करने लगते हो |"

मौलवी साहब उठ खड़े हुए और बोले "हम तो रसूल के बंदे हैं, उसी की सुनते हैं और उसी के हिसाब से चलते हैं |आज यूँ ही हमारी उम्माह इतनी बड़ी नहीं हुई है | तुम्हारे मकान को तुड़वा कर वहाँ इलाके की सबसे बड़ी मस्जिद बनाएंगे और तुम नहीं बेचोगे ज़मीन तो भी मस्जिद तो वहीं बनेगी | इसलिए बेच कर पैसा ले लो वर्ना वो भी हाथ से निकल जाएगा | हम अल्लाह से डरते हैं इसलिए तुम्हें तुम्हारा हक़ दे रहे हैं लेकिन इन्तेहां होने पर तुम कुछ भी नहीं बचा पाओगे |"

इतना कह कर मौलवी साहब चले गए और मुझे उलझन में डाल गए |3 करोड़ का मकान 2 करोड़ में कैसे बेच दूँ लेकिन उनकी बात भी गौर करने लायक है क्यूँकि जो सबसे पहले मकान बिका था 700 गज का 15 साल पहले उसके 3 करोड़ रुपये की कीमत लगी थी, यानी कि 42,000/- प्रति वर्ग गज, जो कि एक मुसलमान ने खरीदा था | उसके बाद जो 500 गज का प्लॉट बिका था 40,000/- वर्ग गज के भाव से 2 करोड़ में और उसके बाद भाव नीचे ही गए हैं | पर ये सब तो मंदी के कारण भी तो हो सकता है | लेकिन मौलवी साहब इतने विश्वास से लबरेज थे कि अगर मैं मकान नहीं बेचता हूँ तो वो कब्ज़ा ही कर लेंगे | उफ्फ | ये सब चीजें मेरे साथ ही क्यों होती हैं |पता ही नहीं अब मैं क्या करूंगा | इतने में एक ग्राहक आता दिखाई दिया और मैं तैयार हो गया कुछ बेचने के लिए||

तो मित्रों, ये था मेरे एक साथी के साथ हुई एक घटना जिसके बाद मैं भी सोचने लगा कि क्या इस्लाम के पंथ में उम्माह का बड़ा होना ही एकमात्र लक्ष्य है और अगर है तो फिर सनातन धर्म के अनुयायी क्यूँ वसुधैव कुटुम्बकम का ढोल बजाते फिरते हैं जबकि एक पंथ साथ आने को तैयार ही नहीं है||ख़ैर, आज काफी समय लिया है आपका इसलिए आपको नमस्कार करते हुए आप से विदा लेता हूँ और फिर मिलने के वादे के साथ अपको अपनी कलम को विश्राम देता हूं | प्रणाम |

वृत्तांत 5 - जीवन चक्र

आप सभी बन्धु जनों को मेरा हार्दिक प्रणाम | आज बड़े दिनों बाद आपके सामने प्रस्तुत हूँ एक बिल्कुल अलग वृत्तांत लेकर जिसे मेरे एक सैनेट्री एवं प्लंबिग का काम करने वाले मित्र ने सुनाई जो कि अक्षरक्षः निम्नलिखित है :-
मैं वही अदना सा प्लम्बिंग एवं सैनेट्री का एक छोटा व्यापारी जो छोटा मोटा कुछ बेच कर अपना तथा अपने परिवार का पेट पाल रहा है | अन्य दिनों की तरह कल भी मैं समय पर अपनी दुकान मंगल कर रहा था के तभी मेरे पास स्थित एक हार्डवेयर वाले दुकानदार की पत्नी एक अन्य व्यक्ति के साथ मोटरसाइकिल पर सवार होकर कहीं जाती दिखी | मैंने सोचा कि "होगा कोई जानकार, अपने को क्या मतलब|" यह सोच कर मैं दुकान मंगल करके अपने घर को चल दिया |
घर पहुँच कर मैं हाथ - मुंह धोकर खाने की मेज पर बैठ गया | मेरी पत्नी के साथ मैं खाना खाने लगा | अयन अपने कमरे में परीक्षा की तैयारी कर रहा था क्योंकि विद्यालय आदि तो अभी भी बंद थे सो घर पर बैठ कर ही परीक्षा की तैयारी करनी पड़ रही है| खाना खाते समय भी मेरे मन में प्रतीक जी की पत्नी के किसी अन्य व्यक्ति के साथ देख कर अजीब सी उलझन हो रही थी | सो, मैंने अपनी पत्नी से सारी बात कह दी जिसे सुनकर मेरी पत्नी हंसने लगी |
मेरा अचरज भरा भाव देख कर वो खुद ही बोल पड़ी "आप तो ध्यान ही मत दिया किजिये | जो टेम्पो वाला आपके लिए माल ले कर जाता है, कुछ दिन पहले तो ये उसी टेम्पो वाले के साथ कहीं जा रही थी जब मैं तरकारी खरीदने गयी हुई थी दोपहर में| प्रतीक जी के यहां बहू ही ग़लत आ गयी है | पिछले दस वर्षों में ना जाने कितने लोगों के साथ घूमने के लिए निकल चुकी है और ना जाने कितने ही घर आ चुके हैं | आपको ध्यान है जब एक बार महेश जी का अपनी बीवी से झगड़ा हो गया था तो उनकी बीवी इसी के घर के बाहर जाकर चिल्ला कर आई थी |"
मैं हतप्रभ हो कर सब सुनता रहा | मैंने पूछा कि "महेश जी की अपनी बीवी से लड़ाई क्यूँ हुई थी? ऐसा क्या हो गया था कि वो प्रतीक जी की बीवी पर चिल्लाने चली गई थी? " तब मेरी पत्नी बोली " प्रतीक जी को आप जितना सीधा समझते हो वो अंदर से उतने ही टेढ़े हैं | दरअसल, प्रतीक जी की पत्नी ने महेश जी को अपने जाल में फंसा लिया था और उनके साथ गुलछर्रे उड़ाने लगी थी | प्रतीक जी को विरोध ना करने के एवज में महेश जी की तरफ से मदद के नाम पर पैसे मिल जाते थे और महेश जी अपने जान पहचान के लोगों को उनकी हार्डवेयर की दुकान से माल खरीदने के लिए प्रेरित करते थे | फिर एक दिन महेश जी की पत्नी ने बाज़ार में महेश जी को प्रतीक जी की पत्नी के साथ होटल में जाते देख लिया| बस फिर क्या था, घर पहुँचते ही महेश जी की बीवी सीधे प्रतीक जी के घर पहुंची और चिल्लाने लगी | बड़ा बवाल हुआ था उस दिन तो और ये सारी बात मुझे रंजीता ने बतायी जो उनके पड़ोस में ही रहती है | और आगे क्या बताऊँ आप तो सु कर न पागल ही हो जाओगे |"
मैं सचमुच पागल सा सब सुने जा रहा था | कितना कुछ होता रहा मेरे आसपास और मुझे खबर ही नहीं | मैंने कहा " अब पागल करने जैसा बाकी ही क्या है और |" तब मेरी पत्नी बोली " अब जो मैं बताने जा रही हूँ वो पागल करने जैसा ही है |" मैं ठूंठ बन कर विस्फोट का इंतजार करने लगा | मेरी बीवी बोली " ये लोग पति पत्नी की अदला बदली भी खेलते हैं और प्रतीक जी तो कभी कभी माल के पेमेंट के बदले अपनी बीवी ही पकड़ा आते हैं |"
मेरे कान से रक्त बहना चालू हो चुका था | मेरे नीचे की धरती नहीं दिख रही थी | आंखो के आगे सभी चेहरे तेज़ी से घूमने लगे जैसे कि किसी ने जीवन चक्र को एक बार के लिए रोक दिया हो और दिमाग़ को एकदम सन्न कर दिया हो | आगे और सुनने की क्षमता खत्म हो गई थी | मैं खाना पूरा करने के बाद बाहर आकर कुर्सी पर बैठ गया और जीवन दर्शन पर विचार करने लगा | कैसे एक बच्चा पैदा होकर बोलना सीखता है, चलना सीखता है, स्कूल जाता है, मित्र बनाता है, सामाजिक और व्यवहारिक ज्ञान अर्जित करता है, काम पर लगता है और फिर पैसों की जरूरत को पैसों की कमी बना कर गलती पर ग़लती करने लगता है, अपने बीवी बच्चों के लिए पैसा इकट्ठा कर के दुनिया से विदा ले लेता है और उसके आश्रित उसके पैसों पर मौज उड़ाते हैं | क्या यही जीवन का मर्म है |यही सोचते सोचते मैं कब गहन निद्रा में चला गया, मालूम ही नहीं चला |
तो मित्रों, ये था मेरे साथी द्वारा सुनाया गया एक वृत्तांत जो सच में बहुत गहराई से विचार करने के लिए बाध्य करता है | अभी आप को नमन करते हुए विदा लेता हूँ और फिर आपके समक्ष नए वृत्तांत के साथ प्रस्तुत होने का वादा करता हूं | नमस्कार |

Sunday, July 5, 2020

वृत्तांत 4 - दर्शन

साथियों नमस्कार |आज मैं आपके सामने प्रस्तुत हूँ एक बिल्कुल अद्भुत वृत्तांत लेकर जिसे सुनकर मैं बिल्कुल अचंभित रह गया था |यह वृत्तांत मेरे एक मित्र ने आज सुबह दुकान पर बुला कर सुनाया जो कि अक्षरक्षः निम्नलिखित है -

मैं वही एक साधारण सा प्लम्बिंग एवं सैनेट्री की एक छोटी सी दुकान पर बैठा छोटा सा व्यापारी जो कि हर दिन एक नयी आशा के साथ अपने घर से दुकान निकलता है और यह उम्मीद रखता है कि दिन भर में इतना तो कमा ही लेगा के घर की ज़रूरत पूरी कर लेगा और मार्केट के पेमेंट चुकता कर देगा | कल का दिन सुबह से ही खराब था क्यूंकि दुकान खोलते ही एक ग्राहक बचा हुआ माल वापस ले आया और मैंने उसके पैसे वापस दिए |दिन भर ग्राहकों का ग्रहण लगा रहा |सांझ ढल रही थी और बोहनी-बट्टे का नामोनिशान नहीं था | तभी गोधूलि बेला के समय एक बूढ़ा आदमी दुकान में आया और बोला "भगवान् की टाइल है क्या?" मैंने कहा "कौनसे भगवान् की टाइल चाहिए?" बूढ़ा बोला "हनुमान जी की, राम दरबार की और शिव जी की |" मैंने टाइलें निकाल कर वृद्ध को दिखा दी और 50 रुपये प्रति नग के हिसाब से 150/- ले लिए | वृद्ध जब जाने लगे तो मैंने उनसे यूं ही पूछा "आप शैव हैं या वैष्णव?" वृद्ध ने मेरी तरफ देखा और कहा" सड़क की तरफ देख कर बताओ कि तुम्हें क्या दिख रहा है |" मैंने सड़क की ओर देखा और कहा "मुझे तो सड़क पर वाहन और कुछ लोग आते जाते दिखाई दे रहे हैं |" वृद्ध ने कहा "आज सांझ को दुकान थोड़ा देर से बढ़ाना और ज़रा गौर से सड़क को देखना | जब कभी अपना मिलना हो तो बताना कि क्या देखा |" मैंने सोचा कि डोकरा बावला है तो मैंने आगे बात नहीं की और उन्हें जाने दिया | 

वृद्ध के जाने के बाद एक ग्राहक और आया और 10,000/- का सामान लिखवा गया जिसका भुगतान सामान पहुंचने पर टेम्पो वाले को होना था | मैंने टेम्पो से सामान भिजवा दिया और पेमेंट का इंतज़ार करने लगा | अंधेरा हो गया था तो मैं दुकान बढ़ा कर सीढ़ियों पर ही बैठ गया और टेम्पो वाले का इंतज़ार करने लगा जो कि पेमेंट लाने वाला था | सड़क सुनसान थी और सरकारी लैम्प उजाला करने की कोशिश में व्यस्त था | मैं अपने खयालों में मगन था तभी एक सफेद आकृति सड़क पर बैठी हुई दिखी | गौर से देखने पर मालूम हुआ कि ये तो और कोई नहीं स्वयं हनुमानजी हैं | मुझे विश्वास नहीं हुआ तो जब मैंने पलक झपकी तो वह आकृति गायब हो गयी थी | अब मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे और मुझे चक्कर से आने लगे थे | मेरे आगे अंधेरा हो गया था और कुछ नहीं दिख रहा था | तभी आसपास कुछ हलचल ने मेरा ध्यान आकर्षित किया | जब मैंने अपना होश संभाला तो मैं पागल सा हो गया जब मैंने देखा कि हनुमानजी मेरे पास खड़े हैं और मुझे पूछ रहे हैं "वत्स, मैं शैव हूँ या वैष्णव?" मैं मूर्छित हो कर गिर पड़ा |

जब मुझे होश आया तो मैं अपने घर पर था और आसपास मेरी पत्नी और 6 साल के बच्चे अयन के साथ-साथ 2 पड़ोसी दुकानदार भी थे | उन्होंने बताया कि टेम्पो चालक जब पेमेंट देने आया था तो उसने मुझे मूर्छित पाया और पास की दुकानों पर लिखे नंबरों पर फोन करके उन्हें बुलाया और घर लेकर आए | मैं कुछ बोल पाता इससे पहले ही मेरे साथी दुकानदार बोले "भाईसाहब, धंधे की इतनी फ़िक्र ना किया करो, अभी तो सबकी हालत पतली हो रखी है |ये तो अच्छा हुआ कि टेम्पो वाला वहां आ गया था समय पर वर्ना तो कोई भी आपका सामान और पैसा लेकर भाग जाता |" मेरी धर्मपत्नी भी बोलने लगी कि मैं सारा दिन तो धंधे का सोचता ही हूँ साथ में घर आने के बाद भी धंधे की ही बात करता रहता हूँ | मैं सब एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल रहा था क्यूंकि आज जो मैंने अनुभव किया था वो किसी को भी नहीं बता सकता था |

आह! वह असाधारण अद्वितीय अनुभूति जो इहलोक में शायद ही बिरले लोगों को होती होगी | क्या बताऊँ आपको | वह चंद्रमा सा शरीर जिस पर मोतियों और सीपीयों का हार सुसज्जित था|एक कंधे पर नाग विराजमान तो दूसरे पर कमल के फूल की माला |एक हाथ में कमण्डल तो दूसरे हाथ में शंख | एक पैर में लकड़ी की सुंदर कढा़ऊ तो दूसरे पैर में पत्तों का पदत्राण| शरीर के एक ओर राख लगी हुई तो दूसरी तरफ सिंदूर | वस्त्र भी ऐसे की किसी मशीन से ना सिले जा सकें, पूरी तरह से शीशम की छाल ओर पटसन से बना कपड़ा जो कि कोई उम्दा कारीगर ही बना सकता है | क्या था ये सब? क्या था उनके प्रश्न का मतलब? और कौन था वह वृद्ध? अब कैसा रहेगा मेरा आगे का जीवन? यह सब सोचते सोचते मैं कब सो गया मालूम ही नहीं चला |

तो साथियों, ये था वो वृत्तांत जो मेरे मित्र ने आज 
सुबह मुझे सुनाया और मैंने अपको |मैं नहीं जानता कि ये सब क्या था और क्यूं लेकिन मैं इतना जानता हूँ कि कितना कुछ हम दैनिक जीवन में अनुभव करते हैं जो कि हम किसी से साझा नहीं कर पाते हैं क्योंकि हमें मालूम है कि लोग विश्वास नहीं करेंगे| ख़ैर साथियों,अभी आपसे विदा लेता हूँ  इस वचन के साथ कि जल्द ही आपके सामने एक और नये वृत्तांत के साथ प्रस्तुत होऊंगा | मेरा प्रणाम स्वीकार करें |

Monday, May 25, 2020

Just another thought

Social measures to overcome the guilt of being the prime accused in cases of women suffrage has led men to 'look' more liberal and sensitive than to be actually one which leads to some innocents being publicly crucified so as to calm the drooling half-grown social champions of female rights while women still being treated as second grade humans in 'not so sexist' world of a Man God.

वृत्तांत 3 - कैसे कैसे लोग

साथियों, आज आपके सामने प्रस्तुत करने जा रहा हूँ एक ऐसा वृत्तांत जिसको सुनकर मैं सोच में पड़ गया कि मानव जाति में रिश्ते किस प्रकार से अपने चरम तक पहुंच कर खत्म कर दिए जाते हैं | यह वृत्तांत मुझे आज दोपहर में सुनने को मिला जो कि अक्षरक्षः तीसरी कड़ी के रूप में आपके सामने प्रस्तुत हो रही है -
मैं वही अदना सा प्लम्बिंग एवं सैनेट्री का एक छोटा व्यापारी अपनी दुकान पर बैठा हिसाब में लीन था | तभी आसपास की दुकान से लड़ाई झगड़े का शोर सुनाई दिया तो मेरा ध्यान टूटा और अपनी कुर्सी से उठ कर बाहर आया | मैंने देखा कि कुछ दूरी पर स्थित मेरे ही जैसे एक प्लम्बिंग और सैनेट्री के यहां से शोर उठ रहा था लेकिन कुछ साफ सुनाई नहीं दे रहा था | तभी वहां पर मौजूद एक पुराने मित्र को मैंने देखा तो इशारे से उन्हें बुला लिया | वो भी वहां से निकलने ही वाले थे तो मेरे यहाँ आए और उनका अभिवादन कर उन्हें अंदर ले आया | आराम से बैठकर एक दूसरे का हाल चाल पूछ कर हम उस शोर के बारे में बात करने लगे |
मैंने पूछा "वो दुकानदार तो बड़ा अच्छा व्यक्ति है फिर क्यों उसके वहां शोर मचा हुआ था?" वे बोले "अजी दिल्ली से नलों का सप्लायर आया हुआ था अपने आदमीयों के साथ पैसों की उगाही के लिए |" मैं सुनकर हतप्रभ रह गया क्यूँकि जिस दुकानदार की मैं बात कर रहा था वो तो साहूकार आदमी था जो किसी का पैसा नहीं रोकता था| मेरे मित्र आगे बोले "दरअसल इन्होने अपने लड़के के भरोसे हर चीज़ छोड़ दी थी तो उसने मस्ती काट ली | माल मंगवा कर घाटे में बेच देता था और खाते में उधार की देनदारी दिखा देता था तो पिताजी को लगता था कि उधार तो निकाल लेंगे पर निकलने के लिए किसी को उधार भी तो दे रखी होनी चाहिए|"
मैं सोचने लगा कि कोई भी व्यक्ति माल घाटे में क्यूँ बेचेगा? खरीद की दर के आसपास दाम करके ही बेच सकता था लेकिन नुकसान खाने की क्या जरूरत थी? मेरे मित्र मेरा सवाल भांप कर बोले "अजी चक्कर ये था कि उसके शौक बड़े थे| अपने पिता को भले ही कुछ नहीं दिया हो पर अपनी गर्लफ्रेंड और उसके भाई को महंगे उपहार जैसे कि हीरे की अंगूठीयां और बालियाँ, लाल आई-फोन देना, महंगे रिज़ॉर्ट में रंगरेलियां करता था, दोस्तों को महंगे होटलों में शराब पिलाता था, सट्टे में भी पैसा लगाने लगा था और भी ना जाने क्या क्या | मेरे बैंक का मैनेजर बता रहा था कि ये लड़का नीमच के एक खाते में हर शुक्रवार काफी पैसा डलवाता था जो कि किसी बृज बिहारी माहोर के नाम से है | ये बात मैंने पिछले महीने सेठ जी से कही तो वो पागल हो उठे थे | वो नीमच वाला खाता दरअसल किसी और का नहीं बल्कि लड़के के असली पिता का था|"
यह सब सुनकर मैं सन्न रह गया क्यूंकि मैं तो सेठ जी को ही उसका पिता समझता आया था | मैं पानी का घूँट पीकर फिर से तैयार था आगे की बात जानने के लिए |मेरे मित्र बोले "जब सेठ जी की आर्थिक हालत खराब थी तो उनके ससुराल से मदद आई थी जिससे उन्होंने वापस अपना साम्राज्य खड़ा किया | मदद के साथ-साथ सेठ जी को उनके घर के एक सदस्य को गोद भी लेने को कहा गया जिसकी माँ कुछ समय पहले परलोक सिधार गयी थी और पिता, जो कि एक निचली जाती से थे, लड़के को अपने ससुराल छोड़ गये थे |सेठ जी उस लड़के को गोद लेने को राज़ी हो गये | लड़का यहां आ गया और इनके साथ रह कर काम सीखने लगा | सेठ जी पूरी तरह से उसे अपना लड़का मान चुके थे और काम काज अब उसके भरोसे छोड़ने लगे | उन्होंने उसके सभी कागज़ात में पिता की जगह पर खुद का नाम दिया जिससे लड़के को शहर में ऊंची जाती के लोगों में इज़्ज़त मिलने लगी और उसका नेटवर्क बढ़ने लगा | धीरे धीरे उसके हाथ में सामान खरीदने और बेचने की भी ज़िम्मेदारी आ गयी जिससे पैसा उसके हाथ में रहने लगा | इसी दौरान उसका असली पिता से संपर्क बना रहा और वह धीरे धीरे करके पैसा दूसरी ओर सरकाने लगा | वह ग्राहकों को माल की रेट खरीद से भी कम में बता बेचता था जिससे ग्राहक तुरंत खरीद लेता था नतीजन लड़के के हाथ में अधिक से अधिक पैसा आ जाता और फिर उसी में से पैसा निकाल कर अपने पिता को देता |उदाहरण के लिए समझें कि आज उसने 1 लाख देकर खरीदा हुआ माल 90 हज़ार में ही बेच दिया 10 हज़ार का घाटा खाकर | अब उस 90 हज़ार में से 20 हज़ार और निकाले जो उसके असली पिता को बैंक में डाल दिए या इधर-उधर खर्च कर दिये यानी कुल घाटा हुआ सेठ जी को 30 हज़ार का जिसमें अगर मुनाफ़ा भी जोड़ दूँ तो घाटा और बढ़ जाएगा| अब यही 30 हज़ार की रकम कुछ मुनाफ़ा जोड़ने के बाद अपने दोस्त को उधार माल के पेटे खाते में लिख दिया जिससे यह लगे कि पैसा आना बाकी है लेकिन वो तो आने ही नहीं थे | सेठ जी अच्छा कमाए हुए थे इसलिए उन्हें लंबे समय तक इस घाटे का आभास नहीं हुआ | लड़का तब तक और लापरवाह हो गया था और सप्लायर से महंगी दर पर माल खरीदता क्यूंकि वो लड़के को मस्ती करवाते थे ताकि वो महंगा और डैड माल भी ऊंची दर पर खरीद ले | इसी तरह उसने दिल्ली से नलों का पीटा हुआ माल खरीद लिया 4 महीने की उधारी पर जो कि बिका नहीं और पेमेंट खड़ा हो गया | आज वो ही दिल्ली वाले हंगामा कर रहे थे सेठ जी की दुकान पर और लड़का शायद कहीं गुलछर्रे उड़ा रहा था |"
मेरा मुख खुला ही रह गया था काफी देर से क्यूंकि ऐसा सब कुछ मैंने जीवन में पहले कभी नहीं सुना था | मैंने होश सम्हाल कर पूछा कि अब सेठ जी क्या करेंगे तो मेरे मित्र ने कहा "पैसा चुकता करने के अलावा और कोई भी रास्ता नहीं है | लड़के को अलग कर देंगे और अब अकेले ही सम्हालेंगे सब कुछ|बाकी जो नसीब में लिखा है वही होगा | हो सकता है कि अब अपने पिता को यहीं पर बुला कर नया काम डाल ले क्यूंकि पैसा तो बना ही लिया है लड़के ने |ख़ैर, आप तो ध्यान रखें अपना और हमारे लायक कुछ काम हो तो बताना |अभी मैं इजाज़त चाहूँगा आपकी| " यह कह कर मेरे मित्र उठ गये और अपना ध्यान रखने की कह कर चल दिए |
मैं सोचता रहा कि एक भले इन्सान ने किसी को आसरा दिया, अपना नाम दिया, समाज में इज्ज़त दिलवाई और उसी ने ही उनके साथ ऐसा विश्वासघात किया | अब तो यह बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं है कि अच्छाई का बदला अच्छाई से ही मिले भले ही हम रिश्ते को कितना ही प्रगाढ़ समझते हों |
तो साथियों, आज का वृत्तांत आप को पसंद आया हो इसी कामना के साथ आपसे विदा लेता हूँ |अगली बार चौथी कड़ी के साथ आपके समक्ष फिर प्रस्तुत होऊंगा |

Sunday, May 24, 2020

वृत्तांत 2 - एक रिक्शे वाली की कहानी

साथियों, आज मैं फ़िर से आपके सामने प्रस्तुत हूँ एक और वृत्तांत लेकर जो आज दोपहर ही मुझे सुनने को मिला और उसे सुनकर मुझे लगा कि यह कहानी मुझे आपसे साझा करनी चाहिए | तो निम्नलिखित है अक्षरक्षः वृत्तांत जो मैंने सुना -
 
मैं एक साधारण सा प्लंबिंग एवँ सैनेट्री का दुकानदार जो कुछ समय पहले ही अपने बच्चे के बुखार के कारण दुनिया के कई रंग देख चुका था जिसके बारे में मैंने पिछली बैठक में आपसे अपना अनुभव साझा किया था, आज आपको एक अलग ही अनुभव बताने वाला हूँ | 

लॉक-डाउन में छूट मिलने के बाद से मैं आम दिनों की तरह ही दुकान आने लगा था सुबह 10 बजे से सांझ के 6 बजे तक | उस दिन समय था दोपहर 3 बजे का और कोई ग्राहक भी नहीं था | बाहर की खाली सड़क पर पड़ती चिलचिलाती धूप को देख कर अनायास ही मृग मरीचिका का ध्यान हो उठता था | मैं अपने खयालों में खोया हुआ था कि तभी एक रिक्शा चलाती महिला दुकान के बाहर आकर रुकी जिसमें पीछे की सीट पर दो छोटे से बच्चे, जिनमें एक लगभग 3 वर्ष की बच्ची तथा एक बच्चा 2 वर्ष का, बैठे हुए थे एक दूसरे का हाथ पकड़कर | वह रिक्शा चालक महिला, जो कि करीब 30 वर्ष की आयु के आसपास की लग रही थी, वह दोनों बच्चों के साथ मेरी दुकान में आई और मुझे नमस्ते करके मेरा अभिवादन किया | मैं बोहनी नहीं होने के कारण थोड़ा निराश सा बैठा था इसलिए मैंने महिला के अभिवादन का जवाब केवल गर्दन हिलाकर दिया और कुछ नहीं बोला|

मैं सोच रहा था कि ये ज़रुर अपने बच्चों के लिए खाने के पैसे मांगेगी क्योंकि ऐसे लोगों को मैं काफी देख चुका था जो कि सामने वाले का मन अपनी गरीबी से पिघला कर उनसे पैसे ऐंठने का प्रयास करते हैं | मेरे मन में ये बात काफ़ी समय पहले घर कर गई थी कि इस तरह के लोगों का संगठन होता है जो गुट बना कर निकलते हैं और अकेले दुकानदार को फांस लेते हैं जिनसे फिर ये पैसा निकलवाने का काम करते हैं इसीलिए मैं सचेत हो गया था | 

मैं उस महिला को बाहर निकलने के लिए कहता इतने में ही वो मेरे काउंटर के पास आई और 4,000/- रुपए रख कर बोली के "आज बाऊजी नहीं बैठे हैं?" मैं अपनी उधेड़बुन से बाहर निकलने के अथक प्रयास के दौरान बोला "कौन बाऊजी? यहां तो केवल मैं ही बैठता हूँ |" महिला ने पूछा "ये अग्रवाल जी की ही दुकान है ना? बाहर भी अग्रवाल ही लिखा है |" मैं अब तक सजग हो गया था | मैंने कहा "हाँ, ये अग्रवालों की ही दुकान है लेकिन आप किनको पूछ रही हैं और ये पैसे किसके हैं?" वह महिला अब थोड़ा रुकी और फिर बोली" भैय्या, मैं गरीबी की मार से परेशान एक विधवा 2 बच्चों की माँ हूँ जो रिक्शा चला कर अपना पेट पालती हूँ | मैं शहर के पुराने सैनैट्री बाज़ार के बाहर रिक्शा खड़ा करती थी तब एक बार एक बाऊजी मेरे रिक्शे से अपने घर तक गए थे |उतर कर उन्होंने जय सियाराम कहा तो मुझे बहुत अच्छा लगा तो मैंने उनसे पूछा के वे क्या काम करते हैं तो उन्होंने कहा कि वे कुंडीयां एवं वॉश-बेसन बेचते हैं| उन्होंने मुझे अपना कार्ड दिया और कहा कि अगर कभी ज़रूरत पड़े तो मेरे नए सैनैट्री बाज़ार स्थित प्रतिष्ठान पर आ जाना | मैंने उनसे कार्ड एवं रिक्शा का किराया लिया और चली गयी |कुछ समय बाद ही मुझे अपने किराए के घर पर कुंडी और कुछ टाइलों की ज़रूरत पड़ी तो मुझे बाऊजी का कार्ड याद आ गया जो मैंने एक आले में रख दिया था | थोड़ा ढूंढने के बाद वह कार्ड मिल गया और मैं पता ढूंढते उनकी नए सैनैट्री बाज़ार स्थित दुकान पहुँच गयी जहां बाऊजी और उनके पुत्र बैठे थे | बाऊजी मुझे देखते ही तुरंत पहचान गए और उन्होंने जय सियाराम से मेरा अभिवादन किया | मैंने उनको अपनी ज़रूरत बतायी तो उन्होंने मुझे एक कुंडी दिखायी और सुंदर सी मछली वाली चित्रकारी की टाइल दिखाई जो मुझे बहुत पसंद आई | जब बिल बना तो 4000/- का जोड़ सुनकर तो मेरी आंखो के आगे अँधेरा छा गया क्यूंकि मैं केवल 500/- रुपये लायी थी और वैसे भी इतना खर्चा मैं नहीं कर सकती थी | मैं वापस जाने लगी तब बाऊजी ने मुझे रोका और कहा" बेटी, तू ये सामान ले जा, अब ये तेरा है और तुझे ही फलेगा |पैसा जब तेरे पास आ जाये तब दे जाना और पैसा देने तब ही आना जब तेरे घर में सब बर्तन धान्य से भरपूर हो जाएँ |" इतना कह कर उन्होंने सामान मेरे रिक्शे में रखवा दिया और मुझे विदा किया |" 

उस महिला की सारी बात मैं बिना पलकें झपकाए सूखे कंठ से सब कुछ सुनता चला गया |महिला बोली "भैय्या, आज एक वर्ष बाद मेरा घर धान्य से भरपूर है और मैं 4000/- रुपए बाऊजी को देने आयी हूँ | उनका कार्ड मुझसे कहीं गिर गया और फिर नहीं मिला लेकिन मुझे इतना ध्यान था कि उनकी दुकान के बाहर अग्रवाल लिखा था और अंदर भगवान् की भी टाइलें रखी हुई थीं |" भगवान् की टाइलें सुनकर मैं समझ गया कि वह कौन सी दुकान की बात कर रही है | मैं उस महिला के सम्मान में खड़ा हुआ, उसके पैसे काउंटर से उठा कर उसे वापस दिए और बाहर जाकर उस दुकान का रास्ता दिखा दिया |वह अपने बच्चों को वापस रिक्शे में बिठाकर उस दुकान की ओर चल पड़ी जहां वह नेक व्यक्ति विराजमान थे |मैं वापस अपने काउंटर की तरफ चल पड़ा और मानव जीवन के विभिन्न रंगों में से सबसे उजले रंग को आज वास्तविकता के अनुभव से अपनी पराकाष्ठा को छूते देखकर भाव विभोर होता रहा |

तो साथियों, यह थी वृत्तांत श्रृंखला की दूसरी कड़ी जो आपने पढ़ी |इसी प्रकार से आगे भी आपको सच्चे अनुभवों पर आधारित कथाएँ आपके समक्ष प्रस्तुत करने के प्रयास के वचन के साथ आपसे विदा लेता हूँ |

Wednesday, May 20, 2020

एक छोटा सा वृत्तांत

साथियों, आज मैं आपके सम्मुख मेरे एक मित्र का वृतांत पेश कर रहा हूं जो कि उसने मुझे आज दोपहर में ही सुनाया था और मैं स्वयं को रोक नहीं पाया आपके सामने प्रस्तुत करने से |अक्षरक्षः वृतांत निम्नलिखित है - 

मैं  प्लम्बिंग एवं सैनेट्री का एक छोटा सा व्यापारी हूँ जो कि 15x25 की दुकान में अपना सामान रखता है और राजी खुशी बेचता है | लॉकडाउन के बाद एक चीज़ जो मार्केट में देखने को मिली के पैसा सब कुछ नहीं है बल्कि व्यवहार ज़्यादा महत्वपूर्ण है| मेरे साथ घटी एक घटना आपको सुनाना चाहूँगा | लॉकडाउन के समय मुझे 3 लोगों को पेमेंट चुकाना था जो कि नहीं चुके क्यूंकि सब कुछ बंद कर दिया गया था |दो मेरे घनिष्ठ से थे और एक से साधारण व्यवहार था |उनमें से साधारण व्यवहार वाले सप्लायर ने 12 अप्रैल को मुझसे संपर्क किया और कहा कि पैसों की सख्त जरूरत है इसलिए पेमेंट करवा दीजिए सो मैंने उनको सुबह जल्दी ही 5 बजे बुलाया और चुकावणा करके रवाना किया | 

जब 14 मई को प्लम्बिंग की दुकान खोल लेने का आदेश आया तो मैंने अपनी भी दुकान खोल ली और सीमित समय के लिए खोलने लगा | अगले दिन सुबह मेरे 6 साल के बच्चे अयन के बुखार आया तो घर में हड़कंप मच गया | हमें कुछ समझ नहीं आ रहा था | मैंने अपने पड़ोसी को बुलाया तो वह आने से मना कर दिए |मेरे परिजन ख़ास दोस्त भी दूर रहने के कारण नहीं आ सकते थे | मुझे कुछ भी नहीं सूझ रहा था तो मैंने अपने 2 सप्लायर्स को फ़ोन लगा दिया जिनको पेमेंट भी करना था | उनमें से एक तुरंत घर के बाहर आ गए और मुझे बाहर बुलाया| मैं गया तो उन्होंने कहा कि पेमेंट चाहिए |मैं हक्का बक्का रह गया | वो मेरा चेहरा पढ़ कर बोले कि सेठ जी जीवन का कोई भरोसा नहीं है और बुरा मत मानना ऊपरवाला ना करे के आपके यहां किसी को भी कोरोना की बीमारी लगे लेकिन अगर हो गयी तो मेरा पेमेंट तो गया, इसलिए आप मेरा चुकावणा करके मुझे मुक्त किजिए | मैं चुपचाप अंदर गया और अलमारी की ओर बढ़ा |मैं जानता था कि मेरे पास इतना ही है कि मैं उसका पेमेंट कर सकूं | मैंने पैसे लिए और उस सप्लायर को सौंप दिए | गिनने के बाद मेरी पर्चियां मुझे सौंप कर स्कूटर चालू करके वो बोला कि सेठ जी अब माल कैश में मिलेगा और वो चल दिया | 

मैं कुछ समझ पाता इतने में मुझे मेरे दूसरे सप्लायर आते दिखे तो मैं सोचने लगा कि इनके लिए तो पेमेंट है ही नहीं और कहीं से व्यवस्था भी नहीं हो सकती है अभी तो | इतना सोचते सोचते वो मेरे नज़दीक आ गये और अपना स्कूटर रोक कर सीधे मुझे अंदर चलने को बोले | मैं उन्हें अंदर ले गया और जब मैं उनसे कहने ही वाला था कि आज पेमेंट नहीं हो पाएगा तो उन्होनें कहा कि अयन कहाँ है? मैं उन्हें अयन के पास ले गया तो उन्होंने व्हाट्सएप पर विडियो कॉल के ज़रिए अपने मित्र डॉक्टर को संपर्क करके यथास्थिति बताई | डॉक्टर ने कहा कि घबराने की जरूरत नहीं है, लक्षण साधारण वायरल फीवर के लग रहे हैं इसलिए आप पास की किसी भी मेडिकल की दुकान पर जाकर मेरी बात करवा दीजिए | हम भागे भागे मुख्य सड़क पर स्थित मेडिकल दुकान पर पहुचे और डॉक्टर से बात करवायी | तब तक डॉक्टर ने दवाइयाँ अपनी अस्पताल की पर्ची पर लिख कर व्हाट्सएप पर भेज दी थी | पर्ची देख कर और डॉक्टर से बात करके केमिस्ट ने दवा दे दी और हम तुरंत घर पहुंच के सीधे अयन के पास गए और उसे दवा दी | 

मेरे सप्लायर बाहर ही थे और मेरा इंतज़ार कर रहे थे | दवा देकर मैं बाहर आया तो मेरे कहने से पहले ही उन्होने कहा कि अगर कोई इमर्जेंसी पड़े तो तुरंत याद करना और ये कहकर उन्होने 50,000/- रुपये निकाल कर मेरे शर्ट की ऊपर की जेब में रख दिये | मैंने कहा कि इसकी ज़रूरत नहीं है, मेरे पास हैं पैसे | उन्होंने कहा कि जब मैं आपके यहां आ रहा था तब वो दूसरा सप्लायर जाते हुए मुझे स्कूटर से ही बोल रहा था कि निकाल लो अपना पैसा, ये तो भागेगा | इतना सुन कर मैं अवाक् रह गया | मेरे सप्लायर बोले "वो आदमी तो मार्केट में आपके बारे ये ही बोलता रहा था हमेशा लेकिन मैंने कभी उसकी बात से स्वयं को प्रभावित नहीं होने दिया | ऐसे लोगों से आप भी मित्रता ना रखें क्यूंकि ये आप की दुकान से जलते हैं और सोचते हैं कि ये माल तो हम से उठाता है और दुनिया के सामने सेठ बन जाता है | ऐसे व्यक्ति का पगफेरा दुकान और घर दोनों के लिए घातक हो सकता है क्यूंकि ये लोग मौका लगने पर आपके घर की भी बुराई करने से नहीं चूकते |अगर मेरी बातें आप को अजीब लग रहीं हैं तो 20 साल रुक जाइये, जब आपका लड़का शादी के लायक हो जाएगा तब ये ही आदमी आपके बच्चे के लिए मार्केट में चुपके से अफ़वाहें फैलाने लगेगा कि लड़का तो ऐबी है, जुआरी है, लड़कीबाज है, शादी करते ही दुकान छोड़ कर भागेगा, 1 करोड़ की डिमांड है, दारूबाज़ है और ना जाने क्या क्या |सेठ जी, मैं ये सब भोग चुका हूं इसलिए आप को सावधान कर रहा हूं| ये लोग अपना काम तो अपने गोदाम पर शांतिपूर्वक निपटा लेते हैं और फिर आपकी दुकान पर बैठ कर आपके काम पर नज़र रखते हैं | आपके सामने मीठी बातें करके आपके राज़ जानने लगते हैं और दूसरों को आपकी बातें बताकर अपने आपको आपका करीबी बताने की चेष्टा करते हैं और कालांतर में आपको नुकसान पहुंचाते हैं |जब मैंने उसे स्कूटर पर जाते देखा तभी मैं ये समझ गया था कि आपने इसको अपना समझ कर फोन कर दिया होगा और ये अपनी छोटी बुद्धि का परिचय देते हुए पेमेंट मांगने आया होगा |सेठ जी, ऐसे लोग इंसान के रूप में नीम के पेड़ के नीचे नाचने वाली भूतनीयों के समान होते हैं जो ना इस धरती की हो पाती हैं और ना ही यमपुरी की | ये श्वानपुत्र दुकान के बाहर ही ठीक होते हैं ना कि दुकान के अंदर | आप इनसे काम तो कर लीजिए लेकिन इनको पेमेंट इनके गोदाम पर ही भिजवा दिया करें और कभी भी कोई निजी बात इनको ना बतायें|अब आप देखियेगा कि 3-4 दिन बाद ये ही व्यक्ति मार्केट में बोलता फिरेगा कि आपके बच्चे को बुखार आया था और वह आपके साथ अस्पताल गया था |" 

इतना सब सुनकर मेरे तो दिमाग को चक्कर आने लगा था लेकिन तभी मेरे सप्लायर का फ़ोन बज उठा जो कि उनके घर से था |उन्हें अब जाना था |आज मेरे अंदर एक नई चेतना का संचार कर उन्होंने एक नया आयाम दिया था मेरे जीवन को | उन्हें विदा करके मैं अंदर अयन के पास आया और उसे चैन से सोता देख अपने खयालों में खो गया |

आज 1 महीने बाद मैं अपनी दुकान पर बैठा हूँ और पूर्णतः कर्जमुक्त हूँ | मेरे सप्लायर के 50,000/- समेत पुराना पेमेंट भी मैं चुका चुका हूं और नीम के पेड़ के नीचे नाचने वाली भूतनियों से आवश्यक दूरी भी बना चुका हूँ | 

तो साथियों, ये था एक छोटा सा वृत्तांत |अभी आज के लिए कहानीयों की श्रृंखला की पहली कड़ी को यहीं पर विराम देता हूँ और नये अनुभवों के साथ फिर आपके समक्ष आने के वादे के साथ आपसे विदा लेता हूँ |

Saturday, March 28, 2020

Oh Dear Camilla

A sour hearted soul, 
a human with bitter tongue, 
swollen brass eyed purple minded
blood sucking saber toothed vampire, 
at the footsteps of whose
bats screech and hyenas laugh, 
and
Only Camilla knows it
Only Camilla wants it
Only Camilla likes it
Only Camilla loves it
Only Camilla spreads it
Only Camilla can cure it
Oh dear Camilla, 
you dark filthy infected soul, 
Why did you come to life?
Why did you play with phlegm?
Why did you made me think I am reborn?
Oh dear Camilla, 
I was good in the well, 
I was good with that stench, 
I was good upside down, 
I did not want to screach, 
I did not want to bite, 
I did not want thy soul, 
but you played the song of devil, 
brought me to the footsteps of him, 
that sour hearted soul, 
he lured me, 
took my teeth, 
extracted the virus in me.
Oh dear Camilla, 
he laughed raucously,
he synthesized it,
remixed it, 
injected into that mellow eyed chef
and she carried it to her hotel,
cooked and served,
infected others.
Oh dear Camilla, 
.... and what a pity that nobody knows
..... and what a pity they have no cure
..... and what a pity that they suffer badly
.....and what a pity that cure is in their kitchen
Oh dear Camilla, 
let their suffering come to a halt,
let them know the values you want them to know,
let your pledge to the vampire complete it session,
but make it quick Camilla, 
I have a burden on me, 
release that from me, 
I am always yours, 
and I will come back again whenever you want, 
but I want you to free the world from it, 
they have had enough, 
put me to sleep my dear Camilla, 
Oh dear camilla, 
put the Saber toothed vampire to sleep, 
Oh dear Camilla, 
Oh dear.... 
Oh... 
... 

Thursday, July 11, 2019

Just a thought

Intolerable bearing of certified dungcakes in the vultural committee of half-born full-grown brown calfs unjutifiably wandering in the intellectually arrested barren fields of extravagent tramp loving cheap misers exuding the antique rogueness eaten out of sagacious nomads of the past.

Saturday, January 14, 2017

May or May Not

To see you on the top,
I may or may not be there,
To put my hand on your shoulder,
I may or may not be there,
To be the witness of your richest laugh,
I may or may not be there,
To stop you from falling,
I may or may not be there,
To make you feel good when you fall sick,
I may or may not be there,
To bring food to your bed,
I may or may not be there,
Because,
I am old, son,
I feel tired,
My skin has wrinkles,
It says to me I have lived long,
I know I haven't,
I still feel I am awesome,
Handsome,
Smart,
Charming,
Adorable,
Lovable tall guy your mother married,
I think of you and jane,
The two people I loved the most,
To fulfil the needs I tried my best,
Worked all day, overtimed,
I may not have been the best
But I did my best.
But today,
I think I am falling apart son,
I know your shoulders are strong
But I use walker instead, son,
I could use some fun time
But I keep staring from window son,
After jane died
I am all alone, son,
I won't complain if you watch tv loud,
I wouldn't mind if you play games on my cellphone,
I wouldn't mind if you go out and play all day,
Just come home for one day,
Just have fun for one day,
Just make me laugh one day,
Just be my son one day,
Just my lovely kid,
My blood,
My life.
To see me again,
To walk me again,
To love me again,
To feed me again,
To stop me from falling,
To see me laugh again,
The time may or may not be there,
To receive my best gift,
I may or may not be there.

Sunday, February 28, 2016

This Awkward Silence

This awkwrd silence in the streets,

this continuous stare
on the pavement and staircase,

this unwanted sight of mirage nearby,

closed shutters and reflecting glasses,

the sound of metro whistle,

it comes near and it increases,

it's not soothing,

it's not relaxing,

it's not heavy,

it's just some noise
of an empty vessel,

wirh nothing meaningful in it,

it's getting away now,

And then,

the awkward silence strikes back,

the scorching wind
takes its course,

the solitude street
reaps what was sown,

the life of concrete
searches for its shadow,

a shadow fathom away
and nobody can catch it,

a white swan
dancing in the sunlight,

a dark shark
widening her teeth,

a one eyed eagle
looking for a prey

a tired dog passing by,

the wrinkled face of the guard,

the hopeless walk of the sweeper,

this stare on pavement,

this stare on the staircase,

this awkward silence in the streets.

Sunday, August 31, 2014

August Last





Date of Shooting: 31st August,2014
(4 Photos)

Saturday, August 30, 2014

Evening Today


Date of Shooting: 30th August, 2014
(1 Photo)

Monday, June 2, 2014

Evening Again



Date of Shooting: 1st June, 2014
(2 Photos)

Sunday, April 27, 2014

Terrace, Terrace






Date of shooting: 26th April, 2014
(5 photos)

The Broom Show

I was standing on my terrace looking for something to shoot when I saw a broom lying in desolation and counting its final days and I thought why not give this broom a good show in its end time.


 
Alone on the terrace

    Got some companions 

Till death do us part

Date of shooting: 26th April, 2014
(3 photos)

Thursday, March 27, 2014

Evening after Hailstorm in Jaipur




Date of Shooting: 24th March, 2014
(3 Photos)

Saturday, March 22, 2014

A Room at Old Jaipur City


Date of Shooting: 26th May, 2012
(1 Photo)

Wednesday, February 12, 2014

About the Music I Listen


Music is an important part of life and helps many people in getting rid (forgetting at least for sometime) of the daily tensions that unease the flow of smooth life. I listen to music to relax and give my brain some break from routines. My taste in music is limited to some artists but I don’t mind listening to various other artists every now and then for a change.

Mostly I listen to instrumental music out of which the work of Gheorghe Zamfir, Richard Clayderman and Yanni are my favorite. Gheorghe Zamfir’s Pan Flute and Richard Clayderman’s Piano albums are unparallel to anything that I have ever come across. They are soothing, relaxing, entertaining and touches the deepest point of my consciousness. Zamfir’s ‘Claire de Lune’ and ‘Don’t cry for me Argentina’ makes me feel like I am alone in my room with dusty wind blowing outside in a temperature of 45 degrees centigrade and trees are just trying to contain their leaves so that they don’t get blown away.

Apart from instrumental, I listen to Dash Berlin’s music work when I am in party mood. Berlin’s music is something that won’t let you sit still and would fill you with all the enthusiasm and vigour needed to live a life. It boosts the confidence level in me and relaxes my muscles in its own mysterious and peculiar way. David Guetta’s electronic music work is also worth mentioning in party music section.

In Indian music, I like A.R. Rehman’s work very much. He uses the instruments in such a way that no other Indian movie musician does (Indian movies are a big source of music in India). There is classical Indian music too that I don’t listen on regular basis but whenever I listen to that work, I feel the cultural roots inside me taking shape in the form of a musical ocean and pouring of sounds from different rivers of instruments.

So, this was my music exposure, what about yours? I will be glad to learn about your taste in music.

Tuesday, January 28, 2014

Nahargarh Fort - Jaipur


















Date of Shooting: 24th January, 2014
(17 Photos)

Saturday, January 25, 2014

Mansagar Lake - Jaipur




Date of Shooting: 9th January, 2014
(3 Photos)